(1)
‘मम्मी! पिछले एक महीने से पापा का नेचर कितना बदल गया है। अब वो ज्यादा डांटते भी नहीं हैं, भैइया के दोस्तों से भी कितने अच्छे से बिहेव करते हैं।’ नाश्ते की टेबल पर बैठी मीनू ने मम्मी से कहा।
‘हां! मम्मी अब देखो फोन पर भी चिल्ला-चिल्लाकर बात नहीं करते हैं। पप्पू ने भी अपनी बहन की बात का पुरजोर तरीके से समर्थन किया।’
‘पापा कितने अच्छे हो गए हैं न मम्मी!’
‘बेवकूफ! तेरे पापा रिटायर हो गए हैं।’ मम्मी ने पापा के कमरे की तरफ झांकते हुए दबे स्वर में जवाब दिया।
(2)
‘सुनो! लौटते समय पप्पी को कॉलेज से लेते आना। और हां, शाम को पप्पू को गाड़ी से ट्यूशन भिजवाने की याद रखना।’ पत्नी ने घर से निकलते श्रीवास्तव जी को याद दिलाया।
‘बस से नहीं नहीं आ सकती वो, और हां पप्पू के दोस्त भी तो जाते हैं ट्यूशन, उनके साथ बाइक पर क्यों नहीं चला जाता?’ श्रीवास्तव जी को फट से गुस्सा आ गया।
‘लेकिन वो तो आज तक बस से नहीं आई है और पप्पू के दोस्त भी तो हमारी ही गाड़ी से ट्यूशन जाते हैं?’ पत्नी ने समझाइश दी।
‘आज तक नहीं आई है तो अब आ जाएगी और पप्पू भी कोई लाडसाब है क्या, आज तक नहीं गया है तो अब जाएगा,’ समझाओ उसे’ श्रीवास्तव जी का पारा काफी ऊपर।
‘मैं तो नहीं समझा पाऊंगी आप ही समझाइए बच्चों को।’
‘बेवकूफ! समझाना तो पड़ेगा ही, अब हम रिटायर हो चुके हैं भई’ दर्द में डूबी एक विनम्र सी आवाज आई।
(3)
‘कम से कम अपने कमरे के पंखे-लाइटें तो बंद कर दिया करो, जानें कब सीखेंगे फिजूल खर्चो से बचना’ शर्मा जी अपने बच्चों पर चिल्ला रहे थे। हाल में रिटायर होकर अपने घर में शिफ्ट हुए हैं। अब दिन-रात घर की साज-संभाल में जुटे रहते हैं। बच्चों को उनकी हरदम की टोका-टाकी अच्छी नहीं लगती है। लेकिन शर्माजी ठहरे पुराने घाघ अफसर। मुंह चलाने में किसी की परवाह नहीं करते। रोज-रोज की झनक-पटक से तंग आकर एक दिन बड़े लड़के ने पूछ ही लिया, ‘पापा! पहले तो आप कभी लाइट-बिजली की परवाह नहीं करते थे। यहां तक कि खाली कमरों तक में एसी चलता रहता था।’
‘बेवकूफ! तब हम सरकारी घर में रहते थे, बिल जेब से भरते थे क्या?’
(4)
‘रोज-रोज सब्जी ढोकर लाना अपने बस की बात नहीं है। एक बार में क्यों नहीं सप्ताह भर की मंगा लेतीं! ’ सब्जी का थैला पटककर वर्मा जी पत्नी पर भुनभुनाए।
‘लेकिन पहले तो तुम रोज ही ताजा तरकारी खाने की जिद करते थे। एक दिन पुरानी सब्जी भी तुम्हारे गले के नीचे नहीं उतरती थी। रोज ही तो बाजार से फ्रेश सब्जी मंगवाती थी। अब क्या हुआ?’
‘बेवकूफ! तब हम सरकारी अधिकारी थे, सब्जी क्या हम लाते थे?’
(5)
‘सुनो जी! मुन्ना से कहो इस बार अपना बर्थ-डे घर पर ही सेलीब्रेट कर ले’ उन्होंने अपनी पत्नी से फुसफुसाते हुए कहा।
क्यों? पत्नी ने प्रश्न उछाला।
‘अरे भई, साहबजादे अपने 15-20 दोस्तों को भी पकड़ लाएंगे। फालतू में ही 20-25 हजार की दच्च लग जाएगी।’
‘तो क्या हुआ हमारा एक ही तो बेटा है, उसकी खुशी के लिए इतना नहीं कर सकते हैं क्या? वैसे भी हर साल तो आपने मनाया ही है न उसका जन्मदिन बड़े धूमधाम से..आप तो खुद ही बड़े-बड़े होटलों में हम सभी को लेकर गए हैं। कैसे बढ़ चढ़कर आप उसके सारे कार्यक्रमों में भाग लेते थे अब ऐसी कंजूसी क्यों?’
‘बेवकूफ! तब हम नौकरी में थे, किसी अफसर के बेटे का बिल उसका बाप भरता है क्या?
(6)
‘पापा इस बार भी हम गर्मियों की छुट्टियों में किसी बढ़िया हिल स्टेशन पर चलेंगे। इस बार कहां ले जाएंगे।’ पप्पू ने चैनल बदलते हुए पापा से पूछा।
‘इस बार हम कहीं नहीं जाएंगे।’ पापा रौबीली सी आवाज आई।
‘क्यों पापा। हर बार तो आप समर में कहीं न कहीं का प्लान बना ही लेते थे। कभी शिमला कभी कश्मीर , अब क्या हो गया है?’ पप्पू पापा का जवाब सुनकर चैनल बदलना भूल गया।
‘बेवकूफ! तब हम हिल स्टेशन नहीं सरकारी टूर पर जाते थे’
(7)
‘पापा, मेरी पॉकेट मनी बढ़ा दीजिए। पेटोल बहुत महंगा हो गया है’ दीपू पापा के सामने मचल रहा था।
‘अजी सुनती हो..साहबजादे क्या कह रहे हैं। इनकी पॉकेट मनी बढ़ा दो और बहाना सुनो जनाब का, पेटोल महंगा हो गया है अजी कब से हो गया है महंगा?, इसे समझाओ भई’
‘बेवकूफ! कोई और रीजन बता! पापा को क्या पता पेटोल के रेट.., अभी तो उन्हें रिटायर हुए एक वीक भी तो नहीं हुआ है।’ मम्मी ने एक पल में दीपू को समझा दिया।
(8)
‘डॉक साब! क्या बताऊं कभी बीमार नहीं पड़े। हमेशा भले चंगे रहे। मजाल है जो कभी बुखार तक भी आया हो। सर्दी, सिरदर्द जैसी मामूली बीमारियां तक कभी नहीं हुई हैं इन्हें..। भगवान नजर न लगाए लोग तो इनकी सेहत की मिसालें दिया करते थे और देखिए रिटायरमेंट के पहले ही महीने में बिस्तर पकड़ लिया है..। सबको दिखा चुके हैं बस, आप आपका ही सहारा है। रुपए-पैसे की चिंता मत कीजिए , इनकी बीमारी दूर कर दीजिए..’ शर्मा साहब की पत्नी डॉक्टर के सामने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना सी कर रही थीं।
‘कुछ सिम्टम्स तो बताइए..’ डॉक्टर साब ने पूछा।
‘क्या बताऊं डॉक साब, ठीक-ठाक से थे। फिर गुमसुम से रहने लगे। घंटी बजती है तो गौर से दरवाजे की तरफ देखते हैं फिर निराश हो जाते हैं’
‘और..?’
‘बार-बार फोन उठाते हैं फिर रख देते हैं फिर निराश हो जाते हैं..’पूरा घर परेशान है। डॉक साब कुछ कीजिए। शर्माइन ने फिर चिंता जताई।
‘ओहो ये बात है। बस, मैडम एक काम कीजिए। सारी दवाइयां बंद कर दीजिए। किसी एक आदमी की डच्यूटी लगा दीजिए जो इन्हें हर घंटे में साहब-साहब कहता रहे और हर बीस मिनट बाद फोन उठाकर बोलता रहे, बाद में कीजिए कॉल साहब बिजी हैं।’ तीन दिन में सुधार न हो तो साहब की जगह सर-सर बुलवाना शुरू करवाइए और इससे भी काम न चले तो ‘जी सर हो जाएगा..’ का प्रयोग करें। एक वीक में शर्मा जी चुस्त-दुरस्त हो जाएंगे।’
‘पर डाक साब इन्हें बीमारी क्या हुई है?’
‘मैडम! इस ऐज की कॉमन बीमारी है। शर्मा जी के खून में अफसरी का प्रतिशत काफी घट गया था इसीलिए वीकनेस सी आ गई थी बस!’
(9)
‘क्योंजी, इस बार तो बिटिया की शादी में बहुत कम गिफ्ट आए हैं। कैश के लिफाफों से भी ज्यादा माल नहीं निकला है। पिछली दफे रानी की शादी में तो कैश ही इतना आ गया था कि आपने उससे बाद में फ्लैट ही खरीदकर उसे गिफ्ट कर दिया था। कितनी लकी थी न रानी? और देखिए इस बार गुड़िया की शादी के ज्यादातर गिफ्टों में भी लोगों ने वही डेढ़ सौ रुपल्ली की प्लास्टिक की घड़ियां टिका दी हैं। तब तो क्या गिफ्ट आए थे कि अगले तीन साल तक हमें किसी भी जगह देने के लिए कभी गिफ्ट खरीदना ही नहीं पड़े थे। कितनी धूम मची थी न उस शादी की..’
‘!!’
‘क्योंजी मैं आपसे कह रही हूं, चुप क्यों हैं आप..?’
‘बेवकूफ! तब हम बड़े अधिकारी थे। यहां तक की पूरे विभाग की मीटिंग ही बिटिया की शादी के एक दिन पहले ही शहर में रखवाते थे ताकी कोई न आने का बहाना न कर सके..अब क्यों आएंगे हरामखोर!’
(10)
‘ऐजी! वो सात नंबर वाले अस्थाना जी हैं न, कितना भव्य घर बनवा रहे हैं। दो मंजिल तो बन चुकी हैं। दो और बनवा रहे हैं। पड़ोस वाली मिश्रा आंटी कह रही थीं कि अस्थाना जी बेटे-बेटियों को अलग-अलग फ्लोर देंगे। कहते हैं बस, नौकरी में जितना बन पड़ा कर दिया। फर्श तक में इटैलियन मार्बल लगा रहे हैं। अस्थानाजी तो आपसे भी छोटी पोस्ट पर थे न जी!
‘हां, तो!’
‘फिर हम तो दो मंजिला मकान तक नहीं बनवा पाए। वो कैसे तान रहे हैं इतनी बड़ी कोठी?’
‘बेवकूफ! वो छोटी पोस्ट पर भले ही था लेकिन पोस्टिंग तो मलाईदार थी उसकी और फिर हमारी तरह रिटायर भी तो कहां हुआ है। कमबख्त! कई मंजिलें तो तनवाएगा ही..’
(11)
‘इस बार तो होलिका दहन के लिए क्या जबर्दस्त तैयारियां की हैं कॉलोनी वालों ने। खूब सजावट भी करवाई गई है। इस बार तो ग्राउंड पर ही डिनर का भी इंतजाम किया गया है। इस पूरे एरिये में हमारी होली ही सबसे ऊंची भी है। क्योंजी! आप तैयार नहीं हो रहे हैं। कॉलोनी का होलिका दहन 10 बजे ही हो जाएगा। हर बार की तरह होली में आग तो आप ही को लगाना है न..’ मिसेज मिश्रा ने होलिका पूजन की थाली सजाते हुए अपने पति से हड़काया।
‘हूं!’ मिश्रा जी ने बिना अखबार से नजरें उठाए हुए जवाब दिया।
‘क्या हूं! हर बरस तो आप आफिस से आने के बाद भी साढ़े नौ बजे तक ही तैयार होकर मुझ टोकना शुरू कर देते थे। अब रिटायरमेंट के बाद इस बार होली जलाने का मन नहीं है क्या?’
‘बेवकूफ! अब कौन जलवाएगा हमसे होली। आग वही लगाता है जो सबसे ज्यादा चंदा देता है। इस बार भी जो डिनर खिला रहा है न, आग लगाने का अधिकार भी समझो वही पा रहा है..मेरी तरफ से न आने की माफी मांग लेना, समझीं!’
(12)
‘बेटा!, टेन राइट टाइम पर है। ठीक नौ बजे स्टेशन से निकल जाएगी। हमें कैसे भी करके आठ सवा आठ तक प्लेटफॉर्म पर पहुंचना ही होगा। तुम सात-साढ़े सात बजे तक घर पहुंच ही जाना’ सूटकेस को फाइनली पैक करते हुए तिवारी जी ने बेटे को मोबाइल लगाकर फरमान सुना दिया।
‘पर पापा इतनी जल्दी!’ उधर से बेटे की झुंझलाहट भरी आवाज आई।
‘क्या जल्दी, आधा घंटा तो स्टेशन तक ही पहुंचने में लग जाएगा। आजकल टैफिक भी तो कितना रहता है। तू तो बस सात बजे तक आ ही जाना!’
‘पर पापा पहले भी तो आप इसी गाड़ी से जाते थे, कभी घर से साढ़े आठ से पहले नहीं निकलते थे, अब इतनी जल्दी क्यों मचा रहे हैं?’ बेटे ने पुरजोर प्रयास करके गले से आवाज निकाली।
‘बेवकूफ! तब तो कई पहले से स्टेशन पहुंच जाते थे। कोई पानी की बोटल ले आता था। कोई मैगजीन खरीदकर रखता था। कुछ बंदे तो सीट पर बिस्तर तक बिछाकर फिट-फाट रखते थे। अरे तब तो साहब लेट हो जाएं तो कोई चैन खींचने से भी बाज नहीं आता था। अब सब खुद को ही करना है। दोबारा फोन नहीं करूंगा, तू तो बस टाइम पर आ जाना, समझे’
(13)
यार ये शमा बड़ा खाऊ आदमी है। अपने बाप तक का काम बिना पैसे लिए नहीं करता है। कैसे-कैसे आ गए हैं आफिस में। ने अपने दोस्त बाबू से कहा।
पर गुरू पहले तो तुम उसकी काफी तारीफ करते थे कि ये है आफिस की जान.। उसूलों का इतना पक्का है कि बिना पैसे लिए अपने बाप का काम तक न करे। इन्हंीं जैसे लोगों के दम पर तो आफिसों की रिश्वत लेने की हिम्मत आती है अब क्या हो गया है.।
बेवकूफ हो तुम तो यार. . हम साले हो रहे हैं रिटायर और इसके पास आएगा हमारी पेंशन का काम. .और एक रिटायर मिडिल क्लास हर महीने अपनी पेंशन निकलवाने के लिए इसे कहां से दे पाएंगे 10 परसेंट। बाबू ने अपनी चिंता प्रकट की।
(14)
‘सुनती हो! हद दर्जे की लूट मची हुई हुई है। एक-एक कॉपी तक अस्सी-अस्सी, सौ-सौ रुपए में दे रहे हैं। ऐसा ही हाल रहा तो सब अनपढ़ ही रहेंगे कहे देता हूं!’अस्थाना जी ने स्टेशनरी टेबल पर रखते हुए पत्नी को पुकारा।
‘हूं!’
‘क्या हूं, साले सड़े से कागज की कॉपियों के पचास-पचास रुपए ले रहे हैं। हम तो रोज ही चमकदार कागज की स्टेशनरी उठाकर नहीं लाते थे। हमारे बच्चों ने कभी स्कूल में खरीदी थी कॉपियां? अंधेरगर्दी देखकर तो खून खौल गया था मेरा..जरा सी गलती न की होती तो ये टुच्चे से दुकानदारों की क्या मजाल जो हमारे मुंह लगते..’
‘क्या गलती!’
‘बेवकूफ! वो मिश्रा है न हमारा पीए रिटायरमेंट के समय कह रहा था कि साब, एक-दो टक स्टेशनरी घर में डालवा देते हैं। काम आएगी’