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भाई साब! जरा एक अच्छा सा पीस तो भिजवा दीजिए। बस जरा शब्द सीमा का ध्यान रखिएगा। स्पेस का तो आपको पता ही है ज्यादा नहीं है।

स्पेस का झंझट है! हर कहीं।

अखबारों में, मैगजीन में, रिश्तों और जिंदगी में तो खैर है ही, शाश्वत समस्या की तरह।
हालांकि यहां बात लेखन-विचारों के लिए अखबारों में उचित स्पेस न मिलने की हो रही है।
अखबारों में बड़ी फिक्स सी जगह होती है, अपनी बात कहने के लिए। यानी स्पेस का ताबूत पहले से बना होता है अब विचारों का मुर्दा इसी साइज में चाहिए।

न लंबा!
न छोटा!
बिलकुल फिट साइज का।

ऐसा न हो तो विचारों की उन्मुक्त उड़ान को स्पेस की कैंची मारकर धड़ाम से जमीन पर गिरा दिया जाता है। फिर बेचारा घायल विचार फड़फड़ाता रहता है। कोई ध्यान नहीं देता। घायल विचार किसी का ध्यान खींच पाते हैं भला! पूरी सोसाइटी ही इन घायल विचारों के कारण दिशाशून्य सी हो रही है। किसी का घायल विचार-दूसरे किसी के जख्मी विचार सोच को कोई साबुत दिशा नहीं दे पाते हैं।

कई बार इधर आपने विचार लिया। उसे धीरे-धीरे दिमाग की देग में पकाना शुरू ही किया था कि पता चला शब्द सीमा समाप्त।
 विचार असमय ही दिवंगत।
क्या अच्छे भले थे एकाएक हॉर्टअटैक आया।
 नहीं रहे।
‘स्पेस’ की कमी से जाम हो गईं धमनियां।
 नीला पड़ गया मुंह।
 ठंडा पड़ गया शरीर।
 कालजयी दिशा में जाता एक विचार स्मृति शेष हो गया।

  स्पेस का दबाव ही ऐसा है। मितव्ययिता चाहिए सोचने में। विस्तार का तंबू मत तानिए। सीधे अपनी बात कह दीजिए। वरना फिर टांगे छांटनी पड़ेंगी। तब फिट हो पाएगा ताबूत में, हो सकता है बाल भी उड़ाना पड़ें। भले ही कटी-फटी शक्ल निकले, विषय भी पहचानने में न आए!

और अलंकार! अनुप्रास! शब्द सामथ्र्य! भाषा सौष्ठव! भाड़ में जाने दीजिए।

टुंडा विचार भी चलेगा!
मिसाल भैंगी हो रही है जनाब।
कोई बात नहीं भैंगी ही चलेगी!
अरे भाई अभी तो माहौल ही नहीं खेंच पाए थे।
मट्टी डालिए माहौल पर आप तो सीधे-सीधे द एंड पर पहुंच जाइए!
पाठक समझदार हैं, बीच का माहौल खुद ही बना लेंगे। उसके पास भी पढ़ने का स्पेस कम है।

अभी तो पार्क में छोरा-छोरी मिले ही थे। प्यार की पींगे बढ़ा ही रहे थे कि स्पेस के विलेन ने झाड़ियों से लात मार दी। औंधे मुंह गिर पड़े कालजयी रचना के विचार!

सो अब हर तरह का लेखक माहौल नहीं खेंच पा रहा है। जल्दी में सब निपटा देता है।
लेखन में दम नहीं बचा है? सुनने में आ रहा है। इन दिनों। इसलिएं? क्योंकि!
विचारों का अधकच्च फल लद्द से गिरता है। जमीन पर। नौसिखुआ सा कोई आलोचक इसी के आधार पर लेखक की सात पुश्तों को कोस डालता है।

उधर, लेखक पर भी स्पेस का दबाव था। विचार कृत्रिम तरीके से पकाना पड़ा। अधकच्च ही मार्केट में चला दिया। रंग-रूप-स्वाद-पुरानी बात नहीं रही जैसी शिकायतें आने लगती हैं।
स्वाद कहां से आएगा!
स्पेस का दबाव रहा विचारों का नवजात अठमासा ही बाहर आ गया।
कई बीमारियां लेकर।
रचना के बाप और साख दोनों पर भी अलग ही संकट खड़ा कर गया।
हैं! बहन जै का भया है?
ऐसी आवाजें प्रसूति की कमजोरी झेल रहे लेखक का मनोबल और तोड़ देती हैं। फिर लेखक हिम्मत नहीं जुटा पाता है अपना जाया देखने की। दूसरे लेखक का जाया यूं भी कोई लेखक देखता नहीं है।
तो फिर ?
वही टुंडा विचार!
सोसाइटी में दिशाशून्यता! बौरायापन!

हालांकि लेखन ही क्यों हर जगह स्पेस में कमी आ रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। दायरे सिकुड़ रहे हैं। रिश्ते सिमट से गए हैं। हम-तुम के स्पेस में मां-बाप तक नहीं समा पा रहे हैं। यहीं देख लीजिए अपनी बात कहने का ढंग से माहौल भी नहीं बना पाया कि लीजिए खर्च हो गई जगह। स्पेस की कमी की बात भी मुंह की मुंह में रह गई।
हां उम्मीद के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं...
वो दिन कभी तो आएगा,  जब हम खाल में रहना। स्पेस में कहना सीख पाएंगे।
शायद आएगा...!
आमीन।

हैं तो वे मूलत: हमारे पुराने मित्र। ऊपर से संवेदनशील हैं। स्वाभाविक है इंसान हैं तो होंगे ही.. जब-तब भावनाओं में बह जाते हैं। हर राष्ट्रीय मुद्दे पर उद्वेलित हो जाते हैं। कांपने लगते हैं। ज्यादा गुस्सा हो जाते हैं तो खांसने भी लगते हैं। ‘हैं जी! क्यों होगा जी! देश गर्त में न गिर जाए जी!’ टाइप की पितातुल्य बातें करते हैं। 



फिर मुद्दों और समस्याओं को काफी गहराई में झांककर भी देखने लगते हैं। कई बार तो इतना नीचे तक झांक लेते हैं कि उसी में गिर जाते हैं। फिर मुद्दे में ही डूबने-उतराने लगते हैं। हां, बीच में सांस लेने के लिए मुंडी मुद्दे से ऊपर निकालते रहते हैं। रिटायरमेंट के बाद से ही देश चिंतन का फुलटाइम जॉब कर रहे हैं। गर्त और देश के बीच दीवार बनने को प्रयासरत हैं।


‘अजी, ये डेमोक्रेसी देश को कहीं का नहीं छोड़ेगी। 50 पार्टियां हैं। 500 नेता हैं। पांच हजार को लालबत्ती चाहिए। देश की किसी को भी परवाह नहीं है। गर्त..’‘देश तो चल रहा है और माशाल्लाह क्या खूब तरक्की कर रहा है!’ किसी ने याद दिलाया।


‘हें!’ उन्होंेने ऐसे आंखें फैलाईं, जैसे किसी दूसरे देश का जिक्र किया जा रहा हो। सामने क्या चल रहा है, इसे भर देखते हैं। उसी पर विचार भी रखते हैं। अगला मुद्दा हाथ आते ही पिछले को पराए लड़के की तरह अनाथ छोड़ देते हैं। ठाठ से जीते हैं, ठप्पे से मुद्दों पर राय प्रकट करते हैं। अभी पिछले दिनों ही क्रिकेट टीम के सीनियरों पर भड़क रहे थे।


‘संन्यास दिलाओ भई इन्हें! कब तक बोझ बने रहेंगे। जोंक हो गए ये तो.. चिपके ही रहना चाहते हैं देश की टीम से।’फिर किसी ने उन्हें याद कराया। अभी पिछले टूर में ही तो सीनियरों ने इज्जत बचाई थी। नए लड़के तो कुछ नहीं कर पाए थे।


‘कब!’ झट्टदेनी से आंखें फैला दीं। 2-जी, 3-जी कोई-सा भी जी हो, लगातार भड़कते हैं। भारी ऊर्जा के साथ ‘क्यों जी!’ ‘हें जी!’ ‘लो जी!’ से ‘क्या होगा जी!’ के दो पाटों के बीच हर भ्रष्टाचार को कुचल डालते हैं। मुद्दा कराहता-सा पड़ा रहता है। वे संतुष्टि के साथ दूसरे मुद्दे को ‘क्यों जी!’ के दो पाटों तले रौंदने के लिए निकल चुके होते हैं। एकदम फिक्स रूटीन है उनका। सुबह नाश्ता, दोपहर को भरपूर नींद.. शाम को मुद्दों पर घनघोर प्रवचन.. रात को देशहित के सपनों भरी परिपक्व नींद। एक क्षण के लिए भी देश को अकेला नहीं छोड़ना चाहते हैं।


कहते हैं देश की फिकर हम नहीं करेंगे तो वह तो गर्त में गिर ही जाएगा। कोई और तो सोच नहीं रहा है। मैं तो हॉर्ट पेशेंट हूं, फिर भी देश के लिए दिन-रात चिंता किए बैठा रहता हूं।


किसी मुद्दे पर बहस करने को आ जाएं तो न जगह देखते हैं, न समय की परवाह करते हैं। जब धाराप्रवाह बोलते हैं तो उनकी लगन देखने लायक होती है।


अभ्यास! रियाज! तेज नजरें! विश्लेषण की अद्भुत क्षमता! उपयुक्त शब्दावली! वॉइस मॉड्यूलेशन! पूरी बारीकी और सारे तर्को सहित वे खांसते-खांसते अपनी बात पूरी करके ही मानते हैं।


पिछले कई सालों से वे अपने दिल की बीमारी सहित देश और गर्त के बीच दीवार बने हुए हैं। विडंबना देखिए, देश में किसी को उनकी परवाह ही नहीं है। यूं तो उन्हें भी किसी की परवाह नहीं है। रिटायर हैं। टाइम पर पेंशन मिल जाती है। दोपहर को भरपूर नींद लेते हैं। शाम को अफरा मिटाने के लिए कुछ तो चाहिए न..




अपनी ही लिखी किताबों के ऊपर खड़े होकर उनका कद ऊंचा हो गया। स्टूल की जरूरत ही नहीं पड़ी!
कुछ लेखक ऐसे ही कद बढ़ाते हैं। माने एकदम कंडम किताबों की थप्पी पर खड़े होकर। उनकी औसत लंबाई को किताबों की ईंटें काफी ऊंचाई प्रदान कर देती हैं। लगभग पर्याप्त मात्रा में ऊंचा उठा देती हैं।
 ऐसे लेखक इफरात में नजर आते हैं, बस उनकी किताबें ही नजर नहीं आतीं! साहित्य में घुसे ऐसे अतिक्रमणकारी दंद-फंद से काफी स्पेस हथिया लेते हैं। साहित्यिक खेतों को बंजर बनाने में जुटे ये परिश्रमी चेहरे इन दिनों काफी मात्रा में दिखाई देने लगे हैं।

बड़े पुस्तकशील होते हैं ये!
अनंत ज्ञान भरा होता है इनके दिमाग में!
बात-बात पर पुस्तक फेंकने की कूबत रखते हैं!
यहां-वहां से कट-पेस्ट इनके सबसे बड़े लेखकीय हथियार होते हैं?
इतने मेहनती होते हैं सालों की कौन कहे, महीनों और सप्ताहों में भी किताब फेंक सकते हैं!

पहले लेखक एक किताब लिखकर सैकड़ों सालों के लिए अमर हो जाता था, अब सैकड़ों लिखकर एक वर्ष की गारंटी नहीं बैठती है। क्यों लिखते हैं ये किताबें? कभी आपने विचार किया। या इस पर यूं भी सोचा जा सकता है आपके दिमाग में किताब लिखने का ख्याल क्यों नहीं आया। आया भी तो आपने इस विचार को ज्यादा लिफ्ट क्यों नहीं मारी।
शायद,  हर आदमी अपनी सीमाएं जानता है?
अपनी क्षमताओं से भली-भांति वाफिक होता है?
पर इनकी सीमाएं तो अनंत हैं !
ब्रह्मांण भी इनके दायरे में नहीं समा सकता है!

इनकी क्षमताएं भी इतनी भयंकर हैं कि तुलसीदास-वाल्मीकि तक के लेखन में कमियां निकाल दें। यहां तक की इन कमियों को लेकर ही रामाय़ण-महाभारत से बड़ा ग्रंथ भी लिख सकते हैं।

  ये लेखक होना चाहते हैं। समाज को ज्ञान औऱ दिशा देने वाले साहित्यकार कहलाना चाहते हैं। हर तरह के शार्टकट से इतिहास में अपना नाम लिखवाना चाहते हैं। खुद ही मानते हैं कि राष्ट्र को सीधे रास्ते पर ले जाने की जिम्मेदारी ससुरी हमारे ही माथे है। हमई अलसा गए तो लुटिया डूबते देर न लगेगी।

  लुटिया की चिंता है इन्हें..!
  राष्ट्र को दिशा देना चाहते हैं!
  लाइट हाउस भी बनना चाहते हैं ताकि देश को अपनी प्रखरता के बलबूते भटकने से बचा सकें।

  इतने पावन उद्देश्य की दिशा में भारी तादाद में ज्ञानदान भी करना चाहते हैं ताकि बुद्धिजीवी भी कहला सकें।
 काफी छपे हैं, यह जानकारी प्रतिष्ठित करवा देती है। क्या लिखा है, इसे देखने-पढ़ने की जहमत कौन उठाता है।
 
    इसलिए कोई रोकता भी नहीं है। रोकने के लिए कमियां बताना जरूरी होता है। आईना दिखाना पड़ता है। कमियां या आईना तभी दिखाया जा सकता है जब संबंधितों को पढ़ा गया हो। एक तो ये तो खुद अपना लिखा नहीं पढ़ते।

दूसरा, लोग भी नहीं पढ़ते। पढ़ना आज कोई चाहता नहीं है। पढ़ने से कहीं सैटिंग लगाने की कला सीखी जा सकती है भला..।

किसी बड़े स्कूल में बच्चे के एडमिशन की व्यवस्था जमाई जा सकती है..।
बॉस को पटाया जा सकता है..।
नहीं न..।
ये सब तो साला जिंदगी आजकल सड़क चलते ही सिखाने लगी है। फिर क्यों पढ़ें किताबें..? क्या दे पाएंगी किताबें.?
सो लोगों को प्राप्त इतने ब्रह्म ज्ञान बदौलत ये लिखे जा रहे हैं। इतने आगे निकल चुके हैं कि इन्हें अब रोका भी नहीं जा सकता है।
रोका तो इन्हें पहले भी नहीं जा सकता था। बचपन से ही बिगड़ गए थे।
अब तो इनके बाप भी इन्हें रोकने में सक्षम नहीं हो पाएंगे।

  ये ज्ञान देकर रहेंगे। ये ज्ञान कहीं से भी ला सकते हैं। समाज को दिशा भी दिखाएंगे। दिशा किसी भी तरफ की दिखा सकते हैं।
ये कुछ भी देंगे, राष्ट्र को उसे ज्ञान मानना ही होगा। नहीं लेगा राष्ट्र ससुरा, तो उसके मुंह में घुसेड़ देंगे।
 सही रास्ते पर चलने के लिए हमारे दिए ज्ञान को ही पथ प्रदर्शक टाइप का मानना ही होगा। जो दिशा दिखाई है राष्ट्र को सीधे-सीधे उस पर चलना ही होगा। बिना न-नुकुर किए।
 इसलिए ये लिखना चाहते हैं। किताबें लाना चाहते हैं। लाइब्रेरी सजाना चाहते हैं। किताबों के ऊपर किताबें जमाना चाहते हैं।
 लेखकीय ऊंचाई बढ़ाना चाहते हैं।
इन्हें लगता है ये ऊंचे कद के लेखक हैं। अपनी किताबों पर खड़े होकर..!  बिना स्टूल के.!    


   हमारे एक मित्र हैं। स्वाभाविक है लेखक भी हैं। ऊपर बताई गई परंपरा के प्रतिनिधि भी हैं। एक दिन घर आए बोले--यार, ये स्वात घाटी कहां है बताओ?

 अपनी मासूम जिज्ञासा के तहत हमने उनसे इसका कारण जानना चाहा। बोले- भई, तालिबान के बारे में बड़ी भ्रांतियां फैली हुई हैं। उसी को लेकर एक प्रामाणिक किताब लिखना चाहता हूं। ताकि लोग वहां के बारे में अललटप्पू न बकें। बोलने से पहले एक बार वहां के बारे में बेसिक जानकारी तो प्राप्त कर लें। पिछली बार भी खाड़ी देशों में हुई जनक्रांति के बारे में जो जिसके मन में आया सूतने में लगा था। कई तो ऐसे फेंकू मिले जैसे बरसों वहीं गुजारे हों। फिर बवासीर के बावजूद भी दो महीने लगाकर हमें वहां की स्थिति को साफ करने के लिए दो किताबें फेंकना पड़ीं।

  अर्ज किया-आप कितना बार गए हैं? तो जानकारी मिली कि अभी तो पासपोर्ट भी नहीं बनवाया है।
लेकिन भड़क इतनी ही पूछताछ से गए। भिनकते सी आवाज में बोले- यार, उलझाओ मत, स्वात घाटी की लोकेशन बताओ?

पूरी किताब ही इस घाटी पर लिख रहा हूं। अमेरिकी कार्रवाई, आईएसआई, तालिबानी, स्थानीय निवासी, परंपराओं की बात लड़ाई की एक सच्ची कहानी के थ्रू बता रहा हूं। कश्मीर से स्वात तक का एरिया कवर करूंगा। छोरा कश्मीर का है। लड़ स्वात में रहा है। रोज खबरों में जिक्र सुनता हूं बड़ा फैसिनेट करता है स्वात नाम..। सो एक प्रामाणिक किताब लाने का संकल्प कर ही लिया। फिर कश्मीर औऱ स्वात नाम भी बराबर वजन पर बैठ रहे हैं। सो दोनों का मेलजोल बैठा दिया है। 140-150 पेज भी लिख मारे हैं।

 हमने जरा विनम्रता से जानना चाहा कि इन पेजों में क्या फटकार दिया है?

बोले- कोई बता रहा था कि कई बॉलीवुड फिल्मों की वहां शूटिंग हुई है वहां.., सो उसका जिक्र, स्वात घाटी की सुंदरता.., कश्मीर औऱ स्वात के बीच के रास्ते-पगडंडियों की बात.., तालिबानियों का जिक्र एवं चरित्र चित्रण..,बकरियों के झुंड का किस्सा..,वहां के पत्थरों की किस्में..,वनस्पतियों के नाम.., अमेरिकी कार्रवाई .., वहां की मिठाइयों के नाम!

निवेदन किया कि इस प्रयास में प्रामाणिकता नामक कोई चीज कहीं दिखाई नहीं दे रही है..?

 बोले- बस, तुम अफगानिस्तान की स्वात घाटी का जरा जुगराफिया भर बता दो। प्रामाणिकता भी बस डाली ही डाली समझो..।

 150 पेज लिख चुके हैं स्वात घाटी को अफगानिस्तान में फिट कर रखा है? इनके ऐसे कठिन परिश्रम पर भले ही पाकिस्तानी पीओके में स्थित स्वात घाटी अपनी स्थिति पर शर्मिंदा हो जाए, इन्हें क्या? ये तो ऐसी ही प्रामाणिकता से राष्ट्र को दिशा देते जाएंगे। किताब खत्म होगी तो 1200-1500 पेजों में जाएगी ही जाएगी। प्रामाणिकता के अलावा सब कवर कर लिया है। ऊपर से कवर पेज भी मोटी दफ्ती से बनवाएंगे।
 प्रामाणिक हो न हो..मोटी जरूर होना चाहिए किताब..!


लेखक को उस पर खड़ा होकर अपना कद जो ऊंचा करना है। कवर भी मोटी दफ्ती का रखेंगे ताकि जूते सहित खड़े होने पर किताबें लेखक का बोझ झेल सकें।

यही भी हो सकता है कल को विषय विशेषज्ञ ही हो जाएं। हर जगह तालिबान, आतंकवाद, घाटियों का जिक्र आने पर विशेषज्ञ मार्गदर्शन के लिए बुलाए जाएं।
प्रामाणिकता के साथ सुना हुआ ‘सुना’ दें.., दोनों जेबों से निकाल कर ज्ञान और दिशा चहूंदिशाओं उछाल दें। लो, लपक लो।

 भले ही स्वात घाटी का जुगराफिया क्लियर न हो..!  क्या जाता है महान किताब है। महान लेखक हैं। ज्ञान देना जरूरी है। किताबों की मोटाई ज्यादा मायने रखती है। उसी पर खड़े होकर तो अपना कद बढ़ाना है।

तो ऐसी ही किताबें लेखक का कद बढ़ाने का भ्रम देती हैं। बिना स्टूल के..! आपको नहीं लगता इस पूरे प्रयास में बढ़ती तो मात्रा ऊंचाई है, कद तो सौ फीसदी घटता ही है। पर इसकी परवाह है किसी को!






टेबल पर भुने हुए काजू रखे हैं। तीन जोड़ी टांगें और चार नग कुहनियां भी उसी पर टिकी हैं।

‘‘ये पूंजीपति सदियों से गरीबों को मूर्ख बना रहे हैं। घोर अराजकता है। सब अन्याय के आदी हो गए हैं, सुविधाभोगी हो गए हैं सब। खून पानी हो गया है।’’ पहली टांग गरजी।

‘‘आहो..!’’ दूसरी टांग का स्वर। फिर गिलास गटकने की आवाज।  

‘‘कोई विचारधारा काम की नहीं है। सब रक्तपिपासु हैं हरामखोरùù..रक्तपिपासु के सु में छोटे ऊ की मात्रा की बड़े ऊ की, जल्दी बताओ बे’’ एक कोहनी की कुछ नशीली सी आवाज निकली।

‘‘आहो..! आहो..!’’ फिर वही दूसरी टांग। गिलास भी दूसरा ही। स्वर में भारी तादाद में ऊर्जा।

‘‘सब साले लुटेरे हैं। पार्टियां-सरकारें सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं’’ दूसरी कोहनी का फरमान फच्च से आया। फिर मुट्ठी भर काजू मुंह में भरे। हाथ में लगा नमक पर्दे से पोंछा। एक कड़वा काजू बाजू में थूका। दिमाग प्रचुर मात्रा में सक्रिय है। तर माल की आड़ में कुछ भी नहीं खिलाया जा सकता है। अंदर आक्रोश है, इसका मतलब ये नहीं कि स्वाद से समझौता कर लें।

तीसरी टांग धकाधक पैग बनाने में लगी है। 


पांचों बड़े क्रांतिकारी हैं। लगभग रोज ही क्लब में मिलते हैं। हर विचारधारा की पूरी मालूमात रखते हैं। इतने ज्ञानी हैं कि संबंधित विचारधारा के मूल प्रवर्तक तक को उसी की विचारधारा के बारे में इतनी शिद्दत से समझा दें कि उसका मुंह खुला का खुला रह जाए। ये भी उसके खुले हुए मुंह में मु्ट्ठीभर काजू रखकर ही लौटें।
मानते भी हैं कि भूने हुए काजुओं से क्रांति को वांछित ताकत मिलती है। ठीक-ठाक बर्फ मिले दो पैग मिल जाएं तो क्रांति की अनुकूल परिस्थितियां प्रकट होते देर नहीं लगती है।
जानते हैं क्रांति में चीजों का अनुपात सही होना जरूरी है। जब सारी परिस्थितियां सही अनुपात में एकट्ठी हो जाती हैं तो एक बुद्धिजीवी इस बारूद में तीली लगा देता है। फिर सुलग उठती है क्रांति। बदल जाती हैं व्यवस्थाएं। सैलाब उमड़ता है तो भ्रष्ट व्यवस्थाओं की चूलें हिल जाती हैं।

फिर गिरता है सड़ा हुआ तंत्र, धड़ाम से। 


(नोट: किसी शरीफ से देश में क्रांति के लगभग इसी तरह के लच्छन होते हैं)
विचार की ताकत से ही सुलगती है क्रांति की मशाल। ध्वस्त हो जाती है तानाशाही।

ताकत! ताकत!! क्रांति की ताकत!!! 


काजू से आती है ताकत। काजू भुने हों। ठीक-ठाक मात्रा में गिलास भरा हो। शाम से रात की तरफ निकलता सा समय हो। तो हो जाती है क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार,

इन इनग्रेडिएंट्स के साथ.. 


एक नग टेबल! 4 से 6 नग गिलास ! १क्क् ग्राम भुने काजू! कंडीशन में धुंधलके की रिक्वायरमेंट! घूंट-दर-घूंट पिए जाने वाले परिपक्व विचार! चबाने के लिए दो चम्मच तला हुआ आक्रोश! प्लेटभर मानवता के प्रति चिंता! तेज क्रांति दृव्य खरीदने लायक जेब! पर्याप्त मोटाई लिए खाए-अघाए पेट! एक आवाज पर प्लेट लिए दौड़ने वाला एक अदद बैरा! कीमती अंगूठियों से भरी भींचने लायक मुट्ठियां! मुलायम चर्बीयुक्त पटकने लायक हथेली! और ..

वाल्टेयर-रूसो-कामू-मार्क्‍स- चे-माओ की प्रसिद्ध लाइनें! 


परिस्थितियों के अनुसार लिंकन-वाशिंगटन गेटे-वर्जिल-दांते-गार्सिया आदि के भी के सरल अंग्रेजी में बोले जा सकने वाले उदाहरण। और बिना फफूंद लगे लगभग 500 ग्राम क्रांतिवीर!
(नोट: मात्रा सुविधानुसार परिवर्तनीय है। क्षमता अनुसार ही करें। क्रांति बड़ा कठिन काम है भई)
फिर इन अवयवों को ठीक-ठाक अनुपात में आपस में घुलाया मिलाया जाए तो धधक
उठती है क्रांति की ज्वाला।

तीसरी प्लेट और तीसरे दौर के बाद! बस क्रांति का लक्ष्य स्पष्ट नहीं होता है?


लक्ष्य की चिंता में क्रांति रोकी नहीं जा सकती है। टांगों और कुहनियों का स्पष्ट मत है। मत बिलकुल उसी धुंधलके के समान स्पष्ट है, जिसमें इस क्रांति को परवान चढ़ाया जा रहा है।
लगभग रोज ही घंटे दो घंटे में वो निर्णायक क्षण आ जाता है। जब रात घिरने लगती है। क्लब में मनुष्यों की मात्रा बढ़ने लगती है। टेबल पर बर्फ की मात्रा कम होने लगती है। सप्लाई अनिश्चित होने लगती है। आवाज असर खोने लगती है। क्रांति का संवाहक बैरा पलटकर हुंकार नहीं भरता है। आक्रोश आंखों-गुस्सा, नसों में दौड़ने लगता है।
तब आ जाता है क्रांति का निर्णायक क्षण! फिर किसी दिशा से कड़कती है बिजली।

‘काजू की प्लेट-रसद का रास्ता काटने के लिए प्रतिगामी ताकतें सक्रिय हो गईं हैं मित्रो!
बुजरुओं को महत्व मिलने लगा है। सर्वहारा बेसहारा हो रहा है। हथियार उठाओ बंधुओ! मदद का मुंह मत देखो! सहायता की बाट मत जोहो! खुद के बाजुओं पर भरोसा करो!’


एक हुंकार से पट से क्रांति सभी के शरीर में चकाचक हिलोरे लेने लगती है। टांगें उत्तेजना में कांपने लगती हैं। कुहनियां मुट्ठियों के रूप में टेबल पर पटकी जाने लगती हैं। क्रांति की ज्वाला प्रचंड पर पहुंचने लगती है।
आ जाता है महासमर का निर्णायक समय। तभी एकाएक बज उठता है यलगार का बिगुल, मोबाइल के रूप में। कोई एक क्रांतिवीर कानों से लगा लेता है।

आ गया महाप्रयाण का अंतिम आदेश। जीवन का लक्ष्य। जिंदगी की सार्थकता।

‘‘हां.. हां.. बस.. मतलब .. मैं.., कह रहा.. सुनो..अरे भई..’’

टांगों की उत्तेजना थम सी गई है। उस क्रांतिवीर के जवाबों पर है सबकी नजर। हेडक्वाटर से क्या कोई नया आदेश। आंखें एक-दूसरे को देख रही हैं। घड़ी पर भी नजर है। क्रांति का निर्णायक क्षण गुजर न जाए। क्रांतिवीर की आवाज संजीदा है। कारूणीय लाचारी की तरफ बढ़ रही है।

‘‘नहीं बस.. वो नहीं हैं.., हां निकलता हूं.., कह तो रहा हूं वो नहीं हैं.. बस 15 मिनट में निकलता हूं.., सुनो..! अरे..! भई..’’

हेडक्वाटर संक्षिप्त में अपनी बात कहने का आदी है। कई बार नीचे दिए गए कोडवर्ड में क्रांति को दिशा दे देता है।
‘‘फिर उन लोगों के साथ बैठे होगे.., वे आवारा तुम्हें कहीं का नहीं छोड़ेंगे.. कहां तक समझाऊं..  समय हो गया है.. सुबह पप्पू को स्कूल छोड़ने जाना है कि नहीं.. दोबारा फोन न करना पड़े..हां, सुनो आते समय 2 किलो आलू लेते आना..कभी तो घर का भी  काम कर दिया करो..तुम भी पता नहीं कब सुधरोगे..’’
क्रांतिवीर पट से उठ गया। खट से फटाक से बाहर की तरफ निकल गया। इशारों-इशारों में मैसेज चहुंओर फैल गया है। क्रांति बचाए रखने के लिए कोडवर्ड सीखना जरूरी है। संकेतों का संदेश समझ में आना ही चाहिए। बची हुई टांगें, कोहनियां भी निराशा में उठ गईं। हेडक्वाटर का आदेश टाला नहीं जा सकता है।

कुछ ही पलों में टेबल वीरान हो गई। बादल गरजने लगे। बिजली कड़कने लगी। बची हुई भावनाएं अंधियारे आकाश के सीने में घुमड़ने लगी हैं। इधर, स्थिति वीरान है। त्रासदी के निशां बिखरे हैं। चित्त पड़ी टेबल पर भुने काजू के कुछ टुकड़े पड़े हैं।

अधजली सिगरेटें बिखरी हैं। खाली गिलास औंधे पड़े हैं। रात निराश है, और अलसभोर की दिशा में अकेले ही निकल ली है। टेबल पर बची बर्फ की अधगली डली के सामान क्रांति की संभावनाएं पिघलने की कगार पर हैं।

रोज की तरह ..! 



वैसे एक फिजूल-सी सोच है ये, लगभग बकवास ही मान लें..एक पेड़ था, नन्हा-सा! आलीशान घरों की उस कॉलोनी में तन्हा-सा रहता था। बौरा जाता तो यूं ही डालें फड़फड़ाने लगता था। सबसे ऊपर वाली टहनी उठाकर दूर-दूर तक झांकता। नजदीकी घरों में गमलों में लगे पौधों, दीवार से चिपटी बेलों के अलावा कुछ न दिखता था उसे। निराशा में ढेर होता तो पस्त पड़ जाता। घंटों तक कोई शाखा तक न हिलती। मजाल कि पत्तियां तक हवा में डोल जाएं। दिन यूं ही बीत रहे थे उसके।

वैसे तो जब रोपा गया था, राजी-खुशी था। टाइम पर खाद-पानी। सुबह-शाम झारे भरकर पानी देने वाला नौकर। बड़े सुख से बीता बचपन। जड़ों के पास भी दो बित्ता छोड़कर बढ़िया टाइल्स लगीं। सुरक्षा के लिए लोहे की जाली लगी। पेंट भी समय-समय पर होता। तब तो पेड़ अपनी ही डालों से बतियाता। रश्क करता था अपनी जिंदगी पर। दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ा। कॉलोनी भी इसी रफ्तार से फैली। पौधे से जल्दी ही कुछ बढ़कर पेड़ बन गया, नन्हा-सा! कॉलोनी भी कांक्रीट के जंगल में बदल गई। अब पूरी कॉलोनी में अकेला पेड़ था। कहने को साथी थे कुछ पौधे।


यूं तो सुन रखे थे उसने किस्से, बड़े पेड़ों के, फलदार वृक्षों के, 500-500 साल जीने वाले वटवृक्षों के, पक्षियों की चहचहाट से भरे रहने वाले नीमों के, हरे-भरे जंगलों के। घोंसलों से भरे रहने वाले घने पेड़ों की कहानियां भी उसे पता थीं। पेड़ के नीचे बैठकर चाय पीने, दिनभर बच्चों के खेलने के किस्से भी सुन रखे थे उसने। आत्मीयता के सब किस्से आस-पड़ोस के पेड़ों ने उसे सुनाए थे। बचपन की मस्ती में उसे ख्याल तक न आया। कब ये पेड़ भी बढ़ती कॉलोनी की भेंट चढ़ गए।

अहसास तो तब हुआ जब खुद बना पेड़, नन्हा सा! तब आसपास नजर दौड़ाई तो पड़ोसी थे गमलों में लगे विचित्र-से नामों वाले कुछ पौधे। प्लास्टिक के-से लगते थे फूल। सांस खींचता तो सिर भन्ना जाता। गम और अकेलापन सताता। किससे बतियाता!

चिड़ियां तो पॉश कॉलोनियों में घुसती नहीं। आ भी जातीं तो बिजली के तारों पर बैठे-बैठे उड़ जातीं। मायूस-सा ताकता था उन्हें। प्रकृति ने जिम्मेदारी दी थी तो अंदर भरी ऑक्सीजन दूर-दूर तक फेंकता। बदले में कड़वी गैस का रेला पूरे शरीर में समा जाता।



ऐसे मौकों पर किसके कंधे पर सिर टिकाता। किसके साथ अपना गम बांटता। न आसपास खेलने वाले बच्चे दिखते, न चिड़ियां घोसला बनातीं। घरवाले भी कब आते, कब चले जाते, पता न चलता। बस गाड़ियां आते-जाते दिखतीं। इसी घर के बच्चे कभी उसके आस-पड़ोस के पेड़ों के नीचे खेले थे।


गप्प-सी लगती थीं, उसे अब ये सारी बातें। अपरिचित-सा ही रहा नन्हा-सा पेड़ घर के लोगों से। फिर धीरे-धीरे जवानी में ही पीला पड़ने लगा। एक दिन हजारों ख्वाहिशें लिए सूख गया। ठूंठ हुआ, तब भी किसी का ध्यान नहीं खींच पाया। बाद में भी कट-कटू के नौकरों के लिए आग तापने के ही काम आया। घरवालों का तो कभी ध्यान भी नहीं गया। जाता तो भी किसे फुर्सत थी, सोचने की कि क्यों मुर्झा गया?

और मान लो सोचते भी तो विचार कर पाते.., पेड़ से अपने रिश्ते, पेड़ से पक्षियों के नाते?

विकास के नाम पर बेरहमी से अपने पर्यावरण को ही कुर्बान कर देने की दूरदृष्टि रखने वाली पीढ़ी..एक पेड़ का दर्द सोच पाती?

शायद नहीं! इसीलिए तो.., कुछ पेड़ आजकल यूं ही नहीं मुर्झा रहे हैं दोस्त!

 

लव का लोचा...

Posted by अनुज खरे Tuesday, April 17, 2012


प्यार बड़ी अजीब शै है! बड़ा भयंकर लोचा है! आजकल।

दिमाग के बीकर में दो अंजाने केमिकल मिले। घुले। खदबदाए। लोचा हो गया। कोई मिल गया। दिल खिल गया। क्या बताऊं यारों मैं तो हिल गया। हिल ही गयाùù। 

दिल खिला और दिमाग हिल गया। क्यों हिला पता नहीं चल रहा। पर सिम्टम्स तो खतरनाक हैं। लक्षण भैरंट हैं। दीवानापन हावी हो जाता है। होशोहवास रहते नहीं। टुन्न हो जाता है दिमाग। सुन्न हो जाता है दिल। हम रहे न हम! तुम रहे न तुम! नॉर्मल न रहे। एबनॉर्मल हो गए। प्यार एबनॉर्मेलिटी की किसी ऐसी ही अवस्था में ही तो होता है। आजकल।

कभी भी! कहीं भी! और सबसे बढ़कर किसी से भी! 

इनदिनों तो सारी बातें सौ फीसदी सच दिखाई दे रही हैं। लड़की को लड़की से प्यार हो सकता है। लड़के को लड़के से प्यार हो सकता है। कोई नहीं रोक सकता है। उनका हक है। पूर्ण अधिकार है। मुकम्मल मानवाधिकार है। एमनेस्टी का प्रश्न है। अंतरराष्ट्रीय मुद्दा है। खोपड़िया घूम जाएगी। रोक सको तो रोक लो। दुनिया थर्रा जाएगी। जाहिल देशों शटप ही रहो इस मुद्दे पर तो..समझे!

 तो इस पृष्ठभूमि में एक कहानी घट गई। 

लोचे की कहानी। आजकल की कहानी। माडर्न टाइप। यूंकै लव आजकल हो गया। 

एक लड़का था। एक लड़की थी। प्यार कर्रा था। लोचा शुरू हो गया। दुनिया जहां की दिक्कतें। प्यार रोके न रुके। हर दीवारें तोड़ दे। एक दिन शादी करके माने। प्यार उमड़ने लगा। दोनों का एक दूसरे से। बौरा से गए दोनों। प्यार में पगला गए। दिन बीतने लगा। समय गुजरने लगा। प्यार का ज्वार उतरने लगा। लड़की ने लड़के से कहा तुम मेरा ध्यान नहीं रखते। लड़के ने कहा धरता तो हूं। बस जरा भविष्य का भी ध्यान रखना चाहता हूं। लड़के के पास अब समय नहीं। बात लड़ाई पर आई। जैसे इन मामलों में आती है। आप ज्ञानी हैं आपको तो सब पता ही है। सो लड़की तनतनाई। तनहाई..

फिर कोई मिल गया!

 कोई कभी भी मिल सकता है। प्यार आदि के इतिहास में इस बात के उदाहरण प्रचुर मात्रा में हैं। इतिहास गवाह है। खुदा भी गवाह है। अमिताभजी थे दे देंगे गवाही।

तो फिलहाल कोई मिल गया। दिल हिल गया वगैरहा का विस्तार त्यागते हुए। क्योंकि आप ज्ञानी हैं। आपको पता ही है आजकल प्यार किसी भी बात पर हो सकता है। बिना बात के भी हो सकता है। लड़ाई में। तनाव में। दबाव में। अच्छे से हो सकता है। बुरे से हो सकता है। कोई न मिले तो खुद से ही हो सकता है। होना चाहिए। होने पर जोर है। होना चाहिए ज्याद दिन होए बिना दिमाग आजकल रह नहीं पाता है। सो लोचा हो गया। संक्षिप्त एवं सारगर्भित बात दो अंजाने केमिकल मिले, दिमाग के बीकर में। इंटरवल के आसपास ही और प्यार हो गया। 

एवैं ही! फटाकदेनी से!

इंटरवल के बाद अब आ गई फिल्म में तेजी..

जो मिला था वो लड़का कुंवारा। लड़की शादीशुदा। दीगर दिक्कतें।
वफादारी का प्रश्न! परंपरा का लफड़ा! उलझन! नैतिकता के संकट! पति की उपेक्षा का दंश!

पर प्यार पर किसका जोर..
लोचे ने तो कर दिया लफड़ा। और हो गया लव आजकल! लव तो आजकल यूं ही होता है। ऊपर बताया है भाई साब, सो हो गया जट्टदेनी से..। 

क्लेश कटे। मिलने लगे। दिल खिलने लगे। शुरू हो गई छुप्पन-छुपाई। विवाहेत्तर संबंध! ऊई मां! 

ढेनùùù..ट्रैननùùù..ढेननù..ढेननù..

अब इस म्यूजिक के बाद तो तीसरी क्लास का बच्च तक सब जानता है। 

‘‘आंटी एक लड़के के साथ पॉर्क में, हम नईं बताते’’ टाइप.., फिर ओए बता न..खीं-खीं टाइप की आवाजें।
लेकिन इसी बीच कहानी में आया एक भयंकर मोड़।

अब इंटरवल के बाद क्लाइमेक्स भी तो आएगा भई। सो आ गया।

लड़की के पति के ऑफिस में आया एक लड़का। लड़की के पति से हो गई उसकी दोस्ती। गहरी छनने लगी। ऑफिस में कैंटीन में दिन गुजरने लगे। उधर, विवाहेत्तर संबंध भी चलते रहे लड़की के। चुम्मा-चामी। पॉर्क। छुप्पन-छुपाई। मगर गिल्टी जाती नहीं थी लड़की की। दिन गुजरते गए। इधर, पति के लड़के से भी हो गए गहरे संबंध। प्रगाढ़ रिश्ते। एक दिन लड़की के पति को भी लड़के से हो गया लव आजकल। ऑफिस में। लड़के को भी हो गया प्यार लड़की के पति से। केमिकल ने कर डाली कमीनताईं!ं लोचा हो गया! टेस्ट बदल गया!

लड़के के प्यार में डूब गए पति महोदय। पत्नी पॉर्क में बदस्तूर मिलने जाती रही। 

लफड़ा-लफड़ा! लोचा-लोचा! लोचा-लफड़ा!

(इस बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ कहानी पर विचार करें। चाहें तो आवाज भर लें, गायक भी अपनी सुविधा का रख लें।)

एक दिन हो गया टंटा। पति ने पॉर्क में बांहों में बांहें डाले देख ही लिया पत्नी को। पत्नी ने देखा पति को। लड़के ने देखा दोनों को। आंखें 4-4 सेट में 12 हुईं। मतलब आपस में टकराईं। 

ढेनùùù..ट्रैननùùù..ढेननù..ढेननù..

पति का खून खौला-साला! इतना बड़ा धोखा। इतनी बड़ी बेवफाई। मोहब्बत दुहाई। प्यार की रुसवाई। 
हइया-हइया। हाय-हाय।

धोखा ‘पुल्लिंग’ है। बेवफाई ‘स्त्रीलिंग’ है।

पति सांसत में पड़ गया। साला किसे मारूं किसे छोड़ूं। दोनों ही ‘जान’ हैं। एक जान हैं हम टाइप (धोखा..,रुसवाई..,गिल्टी..रौतलाटाइप गाना रख लें। बाकी विवरण पीछे बताया ही है।) 
ढेनùùù..ट्रैननùùù..ढेननù..ढेननù..
पति असमंजस में पड़ गया क्या करूं?

लेखक भी असमंजस में है, कहां खत्म करूं कहानी?

आप तो असमंजस में मत पड़िए पति मार क्यों नहीं रहा है। सो सुनिए, लव ट्राइंएल गुजर जमाने की बात थी, अब चतुष्कोणीय नहीं हो सकते क्या? और पति-पत्नी में से कोई एक ही क्यों करे बेवफाई। दोनों क्यों नहीं कर सकते? डॉक्टर ने थोड़ी मना किया है। दिल भी एक ही पर आ सकता है। सो अब लड़के को लड़के से। लड़की को लड़की से होता रहा प्यार तो कसम से, इस कहानी टाइप सीन दिखाने में जान लीजिए ज्यादा देरी नहीं है। क्या समझे? हो सकता है इमरान हाशमी से आगे कि कुछ पारिवारिक फिल्में भी मेरी इस जबर्दस्त स्क्रिप्ट पर बन जाएं। नए किस्म के आपसी धोखे, रिश्तों में खतरनाक किस्म के टर्न से भरपूर। कुछ इस टाइटल के साथ..लव आजकल का लोचा। लव आजकल: लोचा कल-परसों। या सीधे-सीधे लव का लोचा।

नोट:
 इस प्रयोगवादी कहानी को पढ़कर जिन महानुभावों का असमंजस अभी भी दूर नहीं हुआ है उनके लिए हिन्ट। इस कहानी में किरदार केवल तीन ही हैं। यानी एक सरल समीकरण की तरह ए प्लस बी प्लस सी एजीकल टू ..। क्या समझे?
       
वही लव आजकल गुरु! लव आजकल का लोचा! लव का लोचा!





कोच नंबर एस-10। बर्थ नंबर- 35। भोपाल से दिल्ली। 


सीट के नीचे बैग घुसेड़कर बालों पर हाथ मार ही रहा था अपना हीरो कि नजर सामने चली गई। एक खूबसूरत लड़की बैठी थी। उमर कोई 25-26 साल के बीच। जींस-टी शर्ट। एक हाथ में चौड़ा सा बैंड। दूसरे में रुद्राक्ष के मनकों की माला लपेटे थी। सीट की पुश्तों से टिकी बैठी थी। गोद में कामू! मतलब अल्बेयर कामू का ‘द स्ट्रेंजर’ धरे। वल्र्ड फेमस लेखक। वर्ल्ड फेमस नॉवेल। ऊपर की बर्थो पर दो बुड्ढ़े। औंधे लेटे हुए। रास्ता साफ। कोई डिस्टरबेंस नहीं। जन्म-जन्मांतर के सपने कुलांचे भरने लगे। एक पल में कई फिल्मी सीन आंखों के सामने चलने लगे।

हीरो-हीरोइन। ऐसा ही कोई सफर। प्यार की पींगे। भारतीय रेल का सहय़ोग। किसी प्लेटफॉर्म पर पतली पूड़ियां-पानी वाली सब्जी के दोनो की अदला-बदली। हिरोइन स्टेशन पर। ट्रेन चल दी। हीरो का आवाज देना। चलती ट्रेन से हाथ पकड़कर ‘सिमरन’ को ऊपर खींच लेना। हिरोइन का डर के मारे हीरो के गले लग जाना। धीरे से थैंक्स कहना। अपनी बर्थ पर जाते हुए मुड़ मुड़कर देखना।
हाय!-हाय! बैकग्राउंड म्यूजिक। धिंक.. चिका.. धिंक.. हेùùùù, हेùùùù रेùùùù

कामू के सानिध्य में क्या महान घटना घटने वाली है। अपने हीरो का दिमाग ट्रेन से भी सरपट दौड़ रहा है। साला! दो बर्थ खाली हैं। कोई कमीना आ न जाए। लड़का तो कतई न हो। लड़का हो तो स्मार्ट बिल्कुल भी ना हो। प्रभु! अरज सुन ले हमारी। कभी कुछ नहीं मांगा। आज तो इतनी सुन ले। अच्छा चलो कोई लड़का ही आ जाए तो प्रभु! अंग्रेजी बोलने वाला कतई न हो। काम बिगड़ जाएगा। लड़कियां अंग्रेजी बोलने वालों पर तो मर मिटती हैं। खूबसूरत लड़की हो तो रिस्क बढ़ जाता है।

 प्रभु! प्रभु!! कुछ भी जिंदगी में कुछ भी अच्छा किया हो तो उसके बदले में ही इतना वरदान दे दो।


यूं ही बैठी रहे लड़की। काश वक्त थम जाए। बैकग्राउंड म्यूजिक चलने लगे। मैं करूं तो साला कैरेक्टर ढ़ीला है ùùù नहीं..नहीं..छी..छी..ये वाला गाना न चले बैकग्राउंड में। प्यार में गाने चुनने की तमीज ही कहां रहती है। हां-हां सही है। बस! कोई लड़का न आ जाए। लव एट फस्र्ट साइट हो रहा है। 50 फीसदी तो हो भी गया है। हाय! हाय!! क्या बाल उड़ रहे हैं इसके बिल्कुल करीना जैसे..किसी फिल्म में देखा था। गोली मारो फिल्म को, तेल लेने गई साली। साक्षात हिरोइन बैठी है सामने। करीना जैसी गोरी है कमबख्त। आंखे भी बिल्कुल उसी के जैसी। होंठ गुलाब की पंखुड़ियां। चेहरे का ग्लो ही बता रहा है कितनी इंटेलिजेंट है। तभी तो पढ़ रही है कामू। इतना खतरनाक लिखता है किसी आम लड़की को समझ में आ सकता है क्या?

सर्वहारा का सचेतक! विचारों का बादशाह! 


कामू में ताकत है। उसके विचार सम्मोहनीय हैं। समझ में आ रहा है क्यों है इतना बड़ा विचारक और दार्शनिक। आज समझ में आ रहा है कामू। खैर जाने दो, कोई लड़का ना आ जाए। साले ने कहीं से रिजर्वेशन कराकर कहीं से बोर्डिग न करा रखा हो। ये साले रेलवे वाले भी कैसे कैसे नियम बनाते हैं। कोई कहीं से भी रिजर्वेशन करा ले। कहीं से भी बैठ जाए। बकवास सुविधा है ये। वहां फिल्मों में तो रेल क्या फैंटेसी गढ़ती है। यहां वास्तविक जीवन में प्रेम को आड़े आ रही है। इन साले रेलवे वालों की तो.! दुश्मन है प्यार के..विलेन हैं साले विलेन.! सीटों में खटमल काकरोच भरे हैं। फर्श तक साफ नहीं है। इतनी गंदगी है। और देखो मांगने वाले बेखटके चले आते हैं। कोई नहीं देखता इन्हें। सब साले मिले हुए हैं। सबने मिलकर कामू के भी तो 12 बजा दिए थे। भागना पड़ा था अल्जरिया से पेरिस। बुर्जुआ ताकतों के षड्यंत्र में फंस गए थे। लेकिन अभागों-असहायों के लिए कैसे युगांतरकारी विचार दिए हैं।

 कामू जिंदाबाद! क्या गजब का हौसला था। दिमाग में कैसे पैदाकर दी थी क्रांति। 


ऐसे ही संघर्षशील लोगों को मिलता है सही जगह। अभी लड़की के गोद में बैठे है। सोते समय सीने से भी लगा लेती होगी। क्या किस्मत है। छी:छी: ऐसा नहीं सोचना चाहिए। क्या करूं दिमाग का दही हो रहा है। लड़की क्या सोच रही होगी? कनखियों से देख रही है क्या मेरी तरफ? फिल्मों में तो ऐसा ही दिखते हैं। अब यार, ये कनखियां क्या होती हैं? किससे पूछूं? बुड्ढे न उठ जाएं। साला! किसी लड़की का मोबाइल न आ जाए। ़बीच वाली खाली बर्थ पर कोई लड़का न आ जाए। इतने खतरे अलग हैं।

कहां दिमाग लगाऊं? 


घंटे भर तो हो गया। कभी तो खाएगी खाना। हमें भी तो पूछेगी। बात चल पड़ेगी। हूंùù, चलो कर लेते हैं इंतजार। कोई ब्रेकअप वगैरह तो नहीं हुआ है इसका। कैसी बुझी सी लग रही है। अपना हीरो लगातार गुंतारे लगा रहा है। खूबसूरत है..लड़के भी आजकल धोखेबाज होते हैं। किसी एक के नहीं रहते। हां सही है तभी तो आते हैं ऐसे गाने कैरेक्टर ढील टाइप के..।

अन्तर्द्बद्ब चल रहा है। मेरी तरफ क्यों नहीं देख रही? कितना पढ़ेगी? खाना क्यों नहीं खा रही? खाना नहीं डिनर! हां-हां डिनर ही बोलना है जब बातचीत शुरू हो जाएगी तो ये खाना-वाना जंचेगा नहीं।

डिनर! डिनर! नो खाना-वाना ओके। खाना खाकै तो नहीं बैठी है। बात कैसे होगी। लड़कियां इस मामले में बड़ी पकाऊ होती हैं। तड़पाने में मजा आता है इन्हें। खूबसूरत हो तो नखरे बढ़ जाते हैं इनके। कभी अपन को भी मौका
मिलेगा खूब इंतजार करवाऊंगा इसे।

गोरी कितनी है! होंठ! करीना! हाय-हाय!


 हे! प्रभु देख क्यों नहीं रहीं है। इतना धांसू सीन कहीं बेकार न चला जाए। कामू-वामू पढ़कर प्यार संवेदनाओं से भरोसा तो नहीं उठ गया है इसका?

सर्वहारा! बुर्जुआ।! क्रांति जैसे विचारों से जूझ रही है। प्यार के बारे में सोच तक नहीं रही। एक प्रेम पिपासु भैराया बैठा है। खाली पेट है या डिनर ठूस कर बैठी है। इधर आंते कुलबुलाने लगी है सर्वहारा टाइप। प्यार व्यार के चक्कर में भूख बढ़ जाती है क्या? हां, तभी तो लड़के-लड़कियां रेस्टोरेंट में ही मिलते हैं। दिमाग भिंदरयाया जा रहा है।
क्रांति और प्यार का संघर्ष क्या रंग लाता होगा। कामू का चक्कर पड़ा है इन बातों से। प्यार और क्रांति के अंतर्संबंध पर सोचा है कभी उसने। छोड़ो, अभी तो खाना खा लेते हूं। नहीं रुक ही जाता हूं। बड़े घर की लगती है। कपड़े तो ब्रांडेड दिखते हैं। बड़े घर की होती तो यहां स्लीपर क्लास में..! कामू का असर दिखता है। लड़कियां आजकल हर मामले में कितना मैच्योर होती हैं। चलो अच्छा है आगे घर-परिवार चलाने में बड़ी सुघड़ होती हैं ऐसी लड़कियां।

खूबसूरती! मेच्योरिटी! कामू! लव एट फर्स्ट साइट!


साला! कुछ हो क्यों नहीं रहा है। फिल्मों में हीरो अभी तक इम्प्रेस कर चुका होता। क्या मुश्किल है? परिस्थितियां विलेन बन रही हैं। हाय! सपने, सपने न रह जाएं? गोरी कितनी है, हाय! बाल कैर्स फर्र-फर्र हवा में उड़ रहे हैं। क्या लग रही है। दिल तो एवैंई-एवैंई लुट गया टाइप हो रहा है।

सपने! करीन! कामू! हाय-हाय!


विचार चल ही रहे थे कि इतने में लड़की किताब साइड में रखकर उठ गई। अपना हीरो सतर्क हो गया। फिर जिंदा हो गई है संभावना! बातें शुरू हो सकती हैं। मुंह बनाकर बैठना होगा।
एक्सक्यूज मी! लड़की की आवाज आई। हो गया जनम सुफल। सपने फिर जवान हो गए। भारतीय फिल्में जिन्दाबाद! ऐसे सीन लिखने वाले अमर रहें!

जी! बोलिए..हीरो ने पर्याप्त मात्रा में मोटाई भरी आवाज में। लगती है मोटाई वाली आवाज लगती है। मोटे बेस वाली आवाज को लड़कियां आजकल सेक्सी कैटेगिरी में रखती हैं। लड़कियों का भी पता नहीं काहे-काहे को सेक्सी मान लेती हैं।

‘जरा, ये बीच वाली बर्थ ऊपर कर देंगे, मुझे सोना है।’

‘आप हटिए, मैं कर देता हूं’ और सपाटे से सब कर भी दिया गया। लड़की लेट गई। लगे हाथों लाइट भी बंद कर दी उसने। रोशनी बंद हुई लेकिन अपने हीरो की आंखें चमक उठीं।

अंधेरा! संभावना! 


आंखों ही आंखों में जाएगा अब प्यार का पैगाम। सामने वाली बर्थ पर टिकटिकी लगा ली है। लेकिन कोई आंखें चमक क्यों नहीं रही हैं। सो तो नहीं गई है। दो घंटे से लगातार पढ़ रही थी बेचारी थक भी तो गई होगी।
नजरें सामने वाली बर्थ पर हैं दिमाग में गुंतारा चल रहा है। इसी बीच कब पलकें मुंदने लगीं पता ही नहीं चला। हालांकि धीमी-धीमी आवाज कानों में टकरा रही है। लड़की कहीं मोबाइल पर बातें कर रही है।

‘हां-हां, मॉर्निग में पहुंच जाऊंगी। तेरे बिना मन नहीं लगता है। लव यू.., मिस यू..। स्वीट कामू! कामू!’
साले! कोई कामू हैं इनके.., कमल कुमार या कमीने कुमार टाइप कोई होंगे.., तो यह है कामू पढ़ने का राज? उन्हीं ने दी होगी किताब और ये दो घंटे से एक ही पेज पर आंखें दताए उन्हीं के बारे में सोच रही होंगी। नाम कॉमन है इसलिए कामू भी इन्हें अच्छा लगने लगा होगा। प्यार में लड़कियों के खटकरम ऐसेई होते हैं।
हे! कामू देख लो यहां ऐसे होता है क्रांतियां का अंत?

फिर तो दिल्ली स्टेशन पर ही खुली नींद अपने हीरो की। जो पहली नजर गई तो प्लेटफॉर्म पर करीना किसी लड़के के गले से लगी दिखी।

‘भाई साब, जरा ये सूटकेस पकड़वा लीजिए।’ जिनके गले लगी थी वे पट से अंदर दाखिल हो चुके थे। मदद मांग रहे थे। उन्होंने लड़की का एक सूटकेस-बैग उठा लिया है। दूसरे अपने हीरो के हाथ में है। मिनटों में ही करीना-अपने सैफ के साथ रेलवे के ओवरब्रिज से चढ़ती दिखाई दीं। सीन फेड ऑफ होने लगा। इधर, लांग शॉट में अपना हीरो आटोवाले से घिरा दिखाई दे रहा है।

‘हम तो हर बार सौ रुपये ही देते हैं, हर बार आते हैं, चलना होतो चलो.., लूट मचा रखी है तुम लोगों ने तो..’
दिल टूटता है तो दिमाग एक पल में कितना सक्रिय हो जाता है अपने देश में..। भारतीय रेलवे के सौजन्य से कितने फिल्मी सपने फ्लॉप हो रहे हैं रोज..कोई नहीं जानता!

 हालांकि जानता तो कोई ये भी नहीं है कि खूबसूरत लड़की को देखते ही लड़के भैरा क्यों जाते हैं, आपने देश में!

बैठे-बिठाए हो जाना बुद्धिजीवी

Posted by अनुज खरे Saturday, April 14, 2012





विचार का भुर्ता बनाए सो बुद्धिजीवी। जो विचार से निकले ज्ञान को सामने वाले पर दे मारे। नहीं ले तो उसे जमकर कोसने में लग जाए। सामने वाला बिदककर भागे तो फिर उसे बिठाके दचक डाले। ज्ञान के नाखूनों से हर मनुष्य का मूं भंभोड़ दे। एक विचार की दाल न गले तो तो हार न माने, नए विचार का अचार डाल सबको नए सिरे से चटावे। इतना ज्ञानी-ध्यानी। दूसरों का भेजा खा कर अपने चेहरे पर चमक लाने वाला। दुनिया में फिलहाल बुद्धिजीवी कहलाता है। उपरोक्त अवस्था बड़ी परम होती है। समां इकदम ही मार्मिक एवं बड़ा अत्याचारी किस्म का होता है। पिछले जन्मों के कर्मों से कुछ मनुष्य बुद्धिजीवी होते हैं एवं पिछले जन्मों के कर्मों के कारण ही कुछ मनुष्य इन बुद्धिजीवियों को झेलने पर विवश होते हैं। सब अपना-अपना भाग्य है, संसार विविध है अलखनिरंजन..!, अलखनिरंजन..!

विचार की गठान बांधने में बुद्धिजीवी सबसे निष्णात होता है। अब विचार तो किसी भी दिशा से, किसी भी कोने से निकलकर आ सकते हैं। विचार हाथ में आते ही बुद्धिजीवी काम में जुट जाता है। विचार की कच्ची मिट्टी को पुराने विचारकों के कथोप-कथनों का पानी डाल-डालकर गूंथता है। मौका आने पर पैरों से भी कूंचता है। पुराने विचार यूं ही रौंदने के लिए होते हैं जानता है बुद्धिजीवी। कूंचो। मलीदा बना दो। कुछ न हो तो कचूमर ही निकाल दो। ताकी हमारे नए विचार मार्केट में चलन में आ सकें। पुराने नहीं रौंदे जाएंगे तो नए की थोक सप्लाई कैसे होगी। व्यावसायिक गणित दिमाग में होता है, पैर इस व्यावसायिक का पालन करने में जुटते हैं। प्रेरणा लेकर कूं च देता है बुद्धिजीवी । फिर गढ़ता है नए विचार। जमाने में नए चलन के लिए। फैशनपरस्त होता है बुद्धिजीवी नित नए चलन फेंकता रहता है बाजार में।

सुधार हो ना हो नित नए विचार फेंकना जरूरी है, जानता है बुद्धिजीवी, फेंकता भी रहता है। समाज भ्रष्टाचार पर उतारू है, तो प्राचीनकालीन नैतिकता और मूल्यहीनता की कॉकटेल से गढ़ देता है नए बुद्धिबम। फिर हर जगह बरसाता है। भाषण के साथ भावों पर भी पूरा ध्यान रहता है। अनुकूल मुख-मुद्राएं बनाने में प्रवीण होता है बुद्धिजीवी। मूल्यहीनता पर उसकी आंखों में उदासी छाती है। नैतिकता विहीनता के दौरान जेब में रखा पर्स टटोलकर निश्चित होकर एक आह सी निकालता है। जमाने को ज्ञान देने से पहले पर्स टटोलना जरूरी समझता है। मंच पर बैठे अन्यों पर उसे जरा भी भरोसा नहीं है। तभी तो इस भाषण की जरूरत पड़ी, बुद्धिजीवी को पता है। पर्स टटोलने के साथ तो उसकी इच्छा अंदर के रुपए तक दोबारा गिनने की होती है, लेकिन मंचीय मर्यादा का खयालकर विचार त्याग देता है। अन्यथा तो धुक-धुकी सी लगी रहती है। किसी का भी भरोसा नहीं है भैइया। आपको पता ही है कि जमाना खराब है।

इसी के साथ उसे दूसरी कई निजी नैतिकताएं भी घेर लेती हैं। आयोजक मानदेय देंगे कि नहीं? दो घंटे से गला फाड़ रहा हूं लिफाफा तो कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। वर्मा जी ने कहा तो था कि देंगे। हो सकता है न दे। आजकल लोगों की नैतिकता का कोई भरोसा नहीं है। किसी का भी माल मारने में कोई संकोच नहीं लगता है। फिर वर्मा का पिछला रिकॉर्ड तो खराब है। पंखों की खरीद में घपला कर चुका है। बड़ा आयोजक बनाता है, भ्रष्टाचारी कहीं का, टाइप के कुछ विचार भी बह निकलते हैं। तो इस तरह कई बार बुद्धिजीवी की चिंता लोगों को तारने के स्थान पर मानदेय के मामले में अटक जाती है।

हर विषय पर चिंतित रहना, उसके लिए उपाय सोचना यही तो बुद्धिजीवी का फुल टाइम जॉब है। देश को ज्ञान की पुड़िया थमाने के धंधे में रत हैं भैइया। सब तो अपने-अपने में लगे हैं हमीं नहीं ध्यान देंगे तो गर्त में जाएगा सब गर्त में। सो चिंताएं विराट हैं बुद्धिजीवी के सामने। समय का अभाव है। एक विचार फेंक नहीं पाता है कि लो पांच और पड़े हैं। इन पर कब काम करेगा। उनका मलीदा बनाकर नई दिशा प्रदान करने का डौल भी तो बिठाना है। फिर विचार ही तो काफी नहीं। उसका छापा जाना, भाषण आदि होना भी तो जरूरी है। फिर कई निजी चिंताएं भी तो हैं। तो ऐसे में निजी और सामाजिक चिंताओं के द्वंद्व में भी घिर जाता है। द्वंद्व उसे प्रिय है। दो-चार घंटे तो इसके आसरे निकल ही जाएंगे। फिर शाम तक कोई न कोई आ ही जाएगा। फिर उसका माथा खाएंगे। जब तक विचार से ही माथा-फोड़ी चलती है।

फिर शाम को कोई दिख जाता है तो बांछें खिल जाती हैं। शिकार पर तगड़ी पकड़ रखते हैं बुद्धिजीवी। कुछ तो शारीरिक रूप से भी बलशाली होते हैं। समाज के उत्थान के धंधे में उतरे हैं कहां, कब, कैसी जरूरत पड़ जाए। सो, भैइया दंड आदि पेल रखे हैं। मुंह से काम न चला तो आड़े बखत के लिए हाथ-पांव मजबूत होना चाहिए। ससुरो को वहीं मंच पर गिरा देंगे या पब्लिक में बिछा देंगे। आजकल साली मुफ्त की सलाह भी दो तो लोग किच-किच पर उतर आते हैं। बुद्धिजीवी दूर-दृष्टि रखते हैं और चश्मा भी पहनते हैं। पता नहीं किस टाइप की दृष्टि की कब जरूरत पड़ जाए।

देश की हर समस्या पर बुद्धिजीवी विचलित हो जाता है। उसका मन खौलने लगता है। हम यहीं बैठे हैं भाषण वे कल के छोकरे दे रहे हैं। हमारी भांति-भांति के विषयों पर बरसों की साधना व्यर्थ गई। लेखक का नाम उड़ाकर किताबों-किताबों ज्ञान दिमाग में भरा था, काम ना आएगा क्या? हतभाग्य! कैसे दिन आ गए हैं बुद्धिजीवी पड़ा है नए-नकोरे देश की समस्याएं सुलझा रहे हैं। और कहीं सच में सुलझा ना लें, इसका अलग डर है। फिर हमारी प्रखरता तो धरी रह जाएगी। तपस्या निष्फल ही रहेगी क्या? ज्ञान भरा है तो मौका नहीं, मौका मिला तो दूसरे को। हे! ईश्वर न्याय कर। कहीं सारी समस्याएं न सुलझा जाएं फिर हमारे होने का क्या? प्रभु, कोई चक्कर चला। कोई गुंतारा लगा। कोई मुद्दा हमारे लिए बना। ज्ञान न देंगे तो जी ना पाएंगे। अवसर दिला, प्रभु अवसर दिला। बुद्धिजीवी का एकाकी क्रंदन धरती का सीना फाड़ देता है। पर किसी को पता नहीं चलता। आसमान से बारिश वगैरहा की संभावना बन जाती है, पर होती नहीं है। कोई बात नहीं जाने दीजिए।

फिर विषय-मुद्दे को लेकर भी ज्यादा आग्रह नहीं है उसका। कोई भी चलेगा। कैसा भी चलेगा। काम चला ही लेंगे भैइया। न्यौतने वाली संस्था की भी ज्यादा परवाह नहीं है। अरे, जमाने के उत्थान में उतरे हैं, छोटा-बड़ा क्या? फूलों की माला की मोटाई से भी ज्यादा मतलब नहीं। मुद्दा सॉलिड होना चाहिए, तभी ना भाषण पेल पाएंगे। खैर, सॉलिड ना भी हो तो हम कहै के लिए हैं सॉलिड बना देंगे। तुम बस संस्था को छेंककर ले आओ। उसे बता भर दो हमीं हैं आसपास के कई कस्बों के एकमात्र बुद्धिजीवी। आर्डर पर ज्ञान देने को तत्पर। तुरंत सप्लाई की विशेषता से युक्त। सहज। आप गाड़ी न भेजोगे तो ऑटो में बैठकर आ जाएंगे। ऑटो न होगा तो किसी से भी लिफ्ट ले के आ जाएंगे। रास्ते में उसका भी भेजा खाते रहेंगे।

सप्ताह में एकाधा भाषण हो जाए। दो-एक जगह प्रकाशन हो जाए। एक-दो संगोष्ठियों में जुगाली की व्यवस्था जम जाए। तो भैइया उस वीक का हाजमा दुरस्त रहता है। चूरन की जरूरत ही नहीं पड़ती। कब्जियत से राहत रहती है। हालांकि कब्जियत पर असाधारण ज्ञान रखते हैं बुद्धिजीवी। कई एंगलों से कई घंटों तक बोल सकते हैं। योग से दूर भगाइए कब्जियत। व्यायाम से कब्जियत पर कहर ढाइए। सुबह-सुबह तांबे के लोटे में कुएं का पानी पीजिए। अंगूठे से ठुड्डी रगड़िए। बरगद की जड़ें खाइए। फलां शहर के बालकराम वैद्य जी से दो पुड़िया बंधवा लीजिए। ढिकां शहर के फलांराम से चिरौंजी ले आइए। सुबह-शाम सैर कीजिए। बस के नीचे आ जाइए। ट्रेन से टकरा जाइए। भैसे को सिर की टक्कर मार दीजिए। वगैरहा-वगैरहा। समस्त संसार की कब्जियत छुड़ाने के सैकड़ों प्रकार के ज्ञान से युक्त होते हैं बुद्धिजीवी। बस, मौका दो, मुद्दा दो, ज्ञानगंगा में सराबोर करने को बैचेन रहते हैं बुद्धिजीवी।

ज्ञान सबसे बड़ा दान है। इस प्रकार के दान के महत्व को दुनिया में केवल बुद्धिजीवी ही जानता है। ज्ञानदान में भयंकर तौर पर लिप्त रहता है। दान दोनों हाथों से करना चाहिए, इस बात का सख्त कायल होता है। वो दोनों हाथों-पांवों, मुंह-सिर आदि जैसा उससे बन पड़ रहा है, देने में जुटा है। इस अभियान में पात्र-सुपात्र-कुपात्र आदि की परवाह भी नहीं करता है। सबको पर्याप्त मात्रा में, पर्याप्त तौर पर देता ही रहता है। आमने-सामने ले लो तो ठीक वरना, पर्याप्त मात्रा में साथ में बंधवाकर भी रवाना करना नहीं भूलता है, आए हो तो बिना लिए कहां जाओगे बच्चू।

ज्ञानदान के दौरान समाधिस्थ अवस्था में पहुंच जाता है बुद्धिजीवी। चाहो तो इस बीच उससे दो गुर्दे मांग लो मना नहीं करेगा। विश्व कल्याण की इतनी ऊंची ललक होती है बुद्धिजीवी में की देवता वरदान देने उतर आएं तो वर मांगने की बात तक ना करे विमर्श पर उतर आए। चार-छह घंटे तक देवता का भी माथा खा ले। जहां सीधे तौर पर उसे नहीं बुलाया जाता है वहां फटे में पर्याप्त मात्रा में अपनी टांग घुसेड़ने में नहीं चूकता है। ज्ञान दान के लिए 24 घंटे उपलब्ध है। जब जी चाहे टेस्ट कर लो। रात में उठा लो। न नहीं करेंगे। निराश नहीं करेंगे। हर जगह मौजूद हैं। कोई समस्या हमारे बिना न सुलझेगी। सुलझने भी ना देंगे। ऐसे ही तो परम अवस्था प्राप्त नहीं होती है। हालांकि जब कोई बुलाने नहीं आता। सब कन्नी काटने लगते हैं तो ऐसे में ये दीवारों तक से बात करते हैं। गमलों के पौधों को ढ़ंग से उगने का सलीका सिखाते हैं। शून्य में द्वंद्वात्मक विमर्श चलाते हैं। निर्वात से बतकही करते हैं। सोते समय भी विचार मंथन चलाते हैं। सपने में ही कई समस्याएं सुलझा देने का दावा करते हैं। चूंकि समस्याएं विकट हैं समय कम है जानता है बुद्धिजीवी सो 24 घंटे, सातों दिन लगा पड़ा रहता है।
बड़ी विकराल कहानी है उसकी।

वैसे मेरे बारे में आपका क्या खयाल है। पिछले 3-4 पृष्ठों में मैं भी तो विचार के रूमाल से ज्ञान का सूट सिलने में लगा हूं क्या कहते हैं आप। कहीं ऐसा तो नहीं सोच रहे हैं कि कौन मेरे.. मतलब इन बुद्धिजीवी के मुंह लगे।

गैरसरकारी नैतिक कथाएं...

Posted by अनुज खरे Thursday, April 12, 2012

(1)
‘मम्मी! पिछले एक महीने से पापा का नेचर कितना बदल गया है। अब वो ज्यादा डांटते भी नहीं हैं, भैइया के दोस्तों से भी कितने अच्छे से बिहेव करते हैं।’ नाश्ते की टेबल पर बैठी मीनू ने मम्मी से कहा।
‘हां! मम्मी अब देखो फोन पर भी चिल्ला-चिल्लाकर बात नहीं करते हैं। पप्पू ने भी अपनी बहन की बात का पुरजोर तरीके से समर्थन किया।’
‘पापा कितने अच्छे हो गए हैं न मम्मी!’
‘बेवकूफ! तेरे पापा रिटायर हो गए हैं।’ मम्मी ने पापा के कमरे की तरफ झांकते हुए दबे स्वर में जवाब दिया।


(2)
‘सुनो! लौटते समय पप्पी को कॉलेज से लेते आना। और हां, शाम को पप्पू को गाड़ी से ट्यूशन भिजवाने की याद रखना।’ पत्नी ने घर से निकलते श्रीवास्तव जी को याद दिलाया।
‘बस से नहीं नहीं आ सकती वो, और हां पप्पू के दोस्त भी तो जाते हैं ट्यूशन, उनके साथ बाइक पर क्यों नहीं चला जाता?’ श्रीवास्तव जी को फट से गुस्सा आ गया।
‘लेकिन वो तो आज तक बस से नहीं आई है और पप्पू के दोस्त भी तो हमारी ही गाड़ी से ट्यूशन जाते हैं?’ पत्नी ने समझाइश दी।
‘आज तक नहीं आई है तो अब आ जाएगी और पप्पू भी कोई लाडसाब है क्या, आज तक नहीं गया है तो अब जाएगा,’ समझाओ उसे’ श्रीवास्तव जी का पारा काफी ऊपर।
‘मैं तो नहीं समझा पाऊंगी आप ही समझाइए बच्चों को।’
‘बेवकूफ! समझाना तो पड़ेगा ही, अब हम रिटायर हो चुके हैं भई’ दर्द में डूबी एक विनम्र सी आवाज आई।


(3)
‘कम से कम अपने कमरे के पंखे-लाइटें तो बंद कर दिया करो, जानें कब सीखेंगे फिजूल खर्चो से बचना’ शर्मा जी अपने बच्चों पर चिल्ला रहे थे। हाल में रिटायर होकर अपने घर में शिफ्ट हुए हैं। अब दिन-रात घर की साज-संभाल में जुटे रहते हैं। बच्चों को उनकी हरदम की टोका-टाकी अच्छी नहीं लगती है। लेकिन शर्माजी ठहरे पुराने घाघ अफसर। मुंह चलाने में किसी की परवाह नहीं करते। रोज-रोज की झनक-पटक से तंग आकर एक दिन बड़े लड़के ने पूछ ही लिया, ‘पापा! पहले तो आप कभी लाइट-बिजली की परवाह नहीं करते थे। यहां तक कि खाली कमरों तक में एसी चलता रहता था।’
‘बेवकूफ! तब हम सरकारी घर में रहते थे, बिल जेब से भरते थे क्या?’


(4)
‘रोज-रोज सब्जी ढोकर लाना अपने बस की बात नहीं है। एक बार में क्यों नहीं सप्ताह भर की मंगा लेतीं! ’ सब्जी का थैला पटककर वर्मा जी पत्नी पर भुनभुनाए।
‘लेकिन पहले तो तुम रोज ही ताजा तरकारी खाने की जिद करते थे। एक दिन पुरानी सब्जी भी तुम्हारे गले के नीचे नहीं उतरती थी। रोज ही तो बाजार से फ्रेश सब्जी मंगवाती थी। अब क्या हुआ?’
‘बेवकूफ! तब हम सरकारी अधिकारी थे, सब्जी क्या हम लाते थे?’


(5)
‘सुनो जी! मुन्ना से कहो इस बार अपना बर्थ-डे घर पर ही सेलीब्रेट कर ले’ उन्होंने अपनी पत्नी से फुसफुसाते हुए कहा।
क्यों? पत्नी ने प्रश्न उछाला।
‘अरे भई, साहबजादे अपने 15-20 दोस्तों को भी पकड़ लाएंगे। फालतू में ही 20-25 हजार की दच्च लग जाएगी।’
‘तो क्या हुआ हमारा एक ही तो बेटा है, उसकी खुशी के लिए इतना नहीं कर सकते हैं क्या? वैसे भी हर साल तो आपने मनाया ही है न उसका जन्मदिन बड़े धूमधाम से..आप तो खुद ही बड़े-बड़े होटलों में हम सभी को लेकर गए हैं। कैसे बढ़ चढ़कर आप उसके सारे कार्यक्रमों में भाग लेते थे अब ऐसी कंजूसी क्यों?’
‘बेवकूफ! तब हम नौकरी में थे, किसी अफसर के बेटे का बिल उसका बाप भरता है क्या?


(6)
‘पापा इस बार भी हम गर्मियों की छुट्टियों में किसी बढ़िया हिल स्टेशन पर चलेंगे। इस बार कहां ले जाएंगे।’ पप्पू ने चैनल बदलते हुए पापा से पूछा।
‘इस बार हम कहीं नहीं जाएंगे।’ पापा रौबीली सी आवाज आई।
‘क्यों पापा। हर बार तो आप समर में कहीं न कहीं का प्लान बना ही लेते थे। कभी शिमला कभी कश्मीर , अब क्या हो गया है?’ पप्पू पापा का जवाब सुनकर चैनल बदलना भूल गया।
‘बेवकूफ! तब हम हिल स्टेशन नहीं सरकारी टूर पर जाते थे’


(7)
‘पापा, मेरी पॉकेट मनी बढ़ा दीजिए। पेटोल बहुत महंगा हो गया है’ दीपू पापा के सामने मचल रहा था।
‘अजी सुनती हो..साहबजादे क्या कह रहे हैं। इनकी पॉकेट मनी बढ़ा दो और बहाना सुनो जनाब का, पेटोल महंगा हो गया है अजी कब से हो गया है महंगा?, इसे समझाओ भई’
‘बेवकूफ! कोई और रीजन बता! पापा को क्या पता पेटोल के रेट.., अभी तो उन्हें रिटायर हुए एक वीक भी तो नहीं हुआ है।’ मम्मी ने एक पल में दीपू को समझा दिया।


(8)
‘डॉक साब! क्या बताऊं कभी बीमार नहीं पड़े। हमेशा भले चंगे रहे। मजाल है जो कभी बुखार तक भी आया हो। सर्दी, सिरदर्द जैसी मामूली बीमारियां तक कभी नहीं हुई हैं इन्हें..। भगवान नजर न लगाए लोग तो इनकी सेहत की मिसालें दिया करते थे और देखिए रिटायरमेंट के पहले ही महीने में बिस्तर पकड़ लिया है..। सबको दिखा चुके हैं बस, आप आपका ही सहारा है। रुपए-पैसे की चिंता मत कीजिए , इनकी बीमारी दूर कर दीजिए..’ शर्मा साहब की पत्नी डॉक्टर के सामने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना सी कर रही थीं।
‘कुछ सिम्टम्स तो बताइए..’ डॉक्टर साब ने पूछा।
‘क्या बताऊं डॉक साब, ठीक-ठाक से थे। फिर गुमसुम से रहने लगे। घंटी बजती है तो गौर से दरवाजे की तरफ देखते हैं फिर निराश हो जाते हैं’
‘और..?’
‘बार-बार फोन उठाते हैं फिर रख देते हैं फिर निराश हो जाते हैं..’पूरा घर परेशान है। डॉक साब कुछ कीजिए। शर्माइन ने फिर चिंता जताई।
‘ओहो ये बात है। बस, मैडम एक काम कीजिए। सारी दवाइयां बंद कर दीजिए। किसी एक आदमी की डच्यूटी लगा दीजिए जो इन्हें हर घंटे में साहब-साहब कहता रहे और हर बीस मिनट बाद फोन उठाकर बोलता रहे, बाद में कीजिए कॉल साहब बिजी हैं।’ तीन दिन में सुधार न हो तो साहब की जगह सर-सर बुलवाना शुरू करवाइए और इससे भी काम न चले तो ‘जी सर हो जाएगा..’ का प्रयोग करें। एक वीक में शर्मा जी चुस्त-दुरस्त हो जाएंगे।’
‘पर डाक साब इन्हें बीमारी क्या हुई है?’
‘मैडम! इस ऐज की कॉमन बीमारी है। शर्मा जी के खून में अफसरी का प्रतिशत काफी घट गया था इसीलिए वीकनेस सी आ गई थी बस!’


(9)
‘क्योंजी, इस बार तो बिटिया की शादी में बहुत कम गिफ्ट आए हैं। कैश के लिफाफों से भी ज्यादा माल नहीं निकला है। पिछली दफे रानी की शादी में तो कैश ही इतना आ गया था कि आपने उससे बाद में फ्लैट ही खरीदकर उसे गिफ्ट कर दिया था। कितनी लकी थी न रानी? और देखिए इस बार गुड़िया की शादी के ज्यादातर गिफ्टों में भी लोगों ने वही डेढ़ सौ रुपल्ली की प्लास्टिक की घड़ियां टिका दी हैं। तब तो क्या गिफ्ट आए थे कि अगले तीन साल तक हमें किसी भी जगह देने के लिए कभी गिफ्ट खरीदना ही नहीं पड़े थे। कितनी धूम मची थी न उस शादी की..’
‘!!’
‘क्योंजी मैं आपसे कह रही हूं, चुप क्यों हैं आप..?’
‘बेवकूफ! तब हम बड़े अधिकारी थे। यहां तक की पूरे विभाग की मीटिंग ही बिटिया की शादी के एक दिन पहले ही शहर में रखवाते थे ताकी कोई न आने का बहाना न कर सके..अब क्यों आएंगे हरामखोर!’


(10)
‘ऐजी! वो सात नंबर वाले अस्थाना जी हैं न, कितना भव्य घर बनवा रहे हैं। दो मंजिल तो बन चुकी हैं। दो और बनवा रहे हैं। पड़ोस वाली मिश्रा आंटी कह रही थीं कि अस्थाना जी बेटे-बेटियों को अलग-अलग फ्लोर देंगे। कहते हैं बस, नौकरी में जितना बन पड़ा कर दिया। फर्श तक में इटैलियन मार्बल लगा रहे हैं। अस्थानाजी तो आपसे भी छोटी पोस्ट पर थे न जी!
‘हां, तो!’
‘फिर हम तो दो मंजिला मकान तक नहीं बनवा पाए। वो कैसे तान रहे हैं इतनी बड़ी कोठी?’
‘बेवकूफ! वो छोटी पोस्ट पर भले ही था लेकिन पोस्टिंग तो मलाईदार थी उसकी और फिर हमारी तरह रिटायर भी तो कहां हुआ है। कमबख्त! कई मंजिलें तो तनवाएगा ही..’


(11)
‘इस बार तो होलिका दहन के लिए क्या जबर्दस्त तैयारियां की हैं कॉलोनी वालों ने। खूब सजावट भी करवाई गई है। इस बार तो ग्राउंड पर ही डिनर का भी इंतजाम किया गया है। इस पूरे एरिये में हमारी होली ही सबसे ऊंची भी है। क्योंजी! आप तैयार नहीं हो रहे हैं। कॉलोनी का होलिका दहन 10 बजे ही हो जाएगा। हर बार की तरह होली में आग तो आप ही को लगाना है न..’ मिसेज मिश्रा ने होलिका पूजन की थाली सजाते हुए अपने पति से हड़काया।
‘हूं!’ मिश्रा जी ने बिना अखबार से नजरें उठाए हुए जवाब दिया।
‘क्या हूं! हर बरस तो आप आफिस से आने के बाद भी साढ़े नौ बजे तक ही तैयार होकर मुझ टोकना शुरू कर देते थे। अब रिटायरमेंट के बाद इस बार होली जलाने का मन नहीं है क्या?’
‘बेवकूफ! अब कौन जलवाएगा हमसे होली। आग वही लगाता है जो सबसे ज्यादा चंदा देता है। इस बार भी जो डिनर खिला रहा है न, आग लगाने का अधिकार भी समझो वही पा रहा है..मेरी तरफ से न आने की माफी मांग लेना, समझीं!’


(12)
‘बेटा!, टेन राइट टाइम पर है। ठीक नौ बजे स्टेशन से निकल जाएगी। हमें कैसे भी करके आठ सवा आठ तक प्लेटफॉर्म पर पहुंचना ही होगा। तुम सात-साढ़े सात बजे तक घर पहुंच ही जाना’ सूटकेस को फाइनली पैक करते हुए तिवारी जी ने बेटे को मोबाइल लगाकर फरमान सुना दिया।
‘पर पापा इतनी जल्दी!’ उधर से बेटे की झुंझलाहट भरी आवाज आई।
‘क्या जल्दी, आधा घंटा तो स्टेशन तक ही पहुंचने में लग जाएगा। आजकल टैफिक भी तो कितना रहता है। तू तो बस सात बजे तक आ ही जाना!’
‘पर पापा पहले भी तो आप इसी गाड़ी से जाते थे, कभी घर से साढ़े आठ से पहले नहीं निकलते थे, अब इतनी जल्दी क्यों मचा रहे हैं?’ बेटे ने पुरजोर प्रयास करके गले से आवाज निकाली।
‘बेवकूफ! तब तो कई पहले से स्टेशन पहुंच जाते थे। कोई पानी की बोटल ले आता था। कोई मैगजीन खरीदकर रखता था। कुछ बंदे तो सीट पर बिस्तर तक बिछाकर फिट-फाट रखते थे। अरे तब तो साहब लेट हो जाएं तो कोई चैन खींचने से भी बाज नहीं आता था। अब सब खुद को ही करना है। दोबारा फोन नहीं करूंगा, तू तो बस टाइम पर आ जाना, समझे’


(13)
यार ये शमा बड़ा खाऊ आदमी है। अपने बाप तक का काम बिना पैसे लिए नहीं करता है। कैसे-कैसे आ गए हैं आफिस में। ने अपने दोस्त बाबू से कहा।
पर गुरू पहले तो तुम उसकी काफी तारीफ करते थे कि ये है आफिस की जान.। उसूलों का इतना पक्का है कि बिना पैसे लिए अपने बाप का काम तक न करे। इन्हंीं जैसे लोगों के दम पर तो आफिसों की रिश्वत लेने की हिम्मत आती है अब क्या हो गया है.।
बेवकूफ हो तुम तो यार. . हम साले हो रहे हैं रिटायर और इसके पास आएगा हमारी पेंशन का काम. .और एक रिटायर मिडिल क्लास हर महीने अपनी पेंशन निकलवाने के लिए इसे कहां से दे पाएंगे 10 परसेंट। बाबू ने अपनी चिंता प्रकट की।


(14)
‘सुनती हो! हद दर्जे की लूट मची हुई हुई है। एक-एक कॉपी तक अस्सी-अस्सी, सौ-सौ रुपए में दे रहे हैं। ऐसा ही हाल रहा तो सब अनपढ़ ही रहेंगे कहे देता हूं!’अस्थाना जी ने स्टेशनरी टेबल पर रखते हुए पत्नी को पुकारा।
‘हूं!’
‘क्या हूं, साले सड़े से कागज की कॉपियों के पचास-पचास रुपए ले रहे हैं। हम तो रोज ही चमकदार कागज की स्टेशनरी उठाकर नहीं लाते थे। हमारे बच्चों ने कभी स्कूल में खरीदी थी कॉपियां? अंधेरगर्दी देखकर तो खून खौल गया था मेरा..जरा सी गलती न की होती तो ये टुच्चे से दुकानदारों की क्या मजाल जो हमारे मुंह लगते..’
‘क्या गलती!’
‘बेवकूफ! वो मिश्रा है न हमारा पीए रिटायरमेंट के समय कह रहा था कि साब, एक-दो टक स्टेशनरी घर में डालवा देते हैं। काम आएगी’


एक नेता थे!
बचपन से ही लाभ-हानि, जरा-मरण, यश-अपयश आदि की मुकम्मल दिव्य दृष्टि संपन्न।

एक समस्या थी?
अंग्रेजी में उनका हाथ तंग था। बड़ा परेशान रहते थे बेचारे। बचपन में उनकी परीक्षाओं में एक परचा आता था। अंग्रेजी का। उनकी रूह कांपती थी इससे। पास होने के लाले थे। एक बार उन्हें एक पुराने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने गांधी जी के कामों के बारे में बताया। अंग्रेजों के कैसे छक्के छुड़ाए उसकी जानकारी दी। कैसे व्यवस्था बदल असंभव को संभव कर दिखाया। आंखें फैल गई नेताजी की। विचार में पड़ गए। ससुरे अंग्रेज और अंग्रेजी क्या अंतर। सो नेताजी ने अंग्रेजी के खिलाफ गांधीजी पर भरोसा करने की ठानी ली। किसी से गांधीजी पर निबंध लिखवाया।

‘महात्मा गांधी वॉज द ग्रेटमैन आफ इंडिया, ही वॉज द ग्रेटेस्ट लीडर आफ द वर्ल्ड, ही वॉज बॉर्न ऑन 1869 एट पोरबंदर स्टेट ऑफ गुजरात, ही वेंट टू इंज्लैंड फॉर बिकेम ए लॉ..’


घर में मैदान में चिल्ला-चिल्ला कर रटने लगे। परचे में बस अंग्रेजी निबंध का सवाल हल करने लगे। न्यूनतम अंक आने लगे। गांधीजी के जीवन और कर्म के बारे में लिख-लिखकर अंग्रेजी को रगेद दिया। छक्के छुड़ा दिए। मास्टर के बाप में दम नहीं होता था अंग्रेजी में फेल कर सकें। बरसों तक निबंध एक ही कलेवर में, एक ही तेवर में,  एक ही स्टाइल में लिखते रहे। अनुभवी मास्साब निबंध देखते ही कॉपी पर पास होने लायक नंबर चढ़ा देते। ऐसा जलजला आया कि अंग्रेजी तक इस निबंध के आगे हाथ जोड़कर खड़ी हो गई!

मास्साबों ने भी हाथ जोड़ लिए!!
पूरी शिक्षा व्यवस्था ही दंडवत हो गई!!!
भैइया कछु ग्रामर और सीख लेते?
थोड़ा अनसीन पैसेज भी दिमाग में भर लेते?
कुछ वॉकेवुलरी भी जान लो।
थोड़ी अंग्रेजी जान लोगे तो मर न जाओगे।

नेताजी ने सब अनुरोधों को लात मार दी। सब अनुनय ठुकरा दिए। अंग्रेजी के खिलाफ हिन्दी पट्टी की लड़ाई पर उसी ग्राउंड में भाषण देने की भी प्रैक्टिस करने लगे।

भाइयो.., 
जब तक स्कूलों में टाटपट्टी रहेगी, अंग्रेजी के खिलाफ हिन्दी पट्टी की लड़ाई जारी रहेगी। किसी माई के लाल में दम नहीं है कि हमें परास्त कर सके। अंग्रेजों का नास हो! अंग्रेजी रसातल में जाए! गांधी बब्बा की जय! कोर्स में अंग्रेजी का निबंध रखने वाला अमर रहे!

हमारे देश में हर भाषण देने वाले के पीछे लोग जुटने लगते हैं, तमाशबीन टाइप सो यहां भी जुटने लगे। समर्थकों की संख्या भी बढ़ाने लगी। निबंध के चक्कर में गांधीजी के बारे में मालूमात हो गई। सिद्घांतों के बारे में पता चल गया। रटाई आगे बड़ी मददगार साबित होने लगी। पढ़ा हुआ कभी बेकार नहीं जाता। बस उपयोग में लाने का हुनर आना चाहिए। रटाई उपयोग में आ गई।

बड़े हुए तो राजनीति को करियर बनाया!


बचपन से ही नेता थे। बनाना ही था। दिव्य दृष्टि थी। दिव्य मेमोरी थी। टंगड़ी भी दिव्य ही थी। गांधी जी के दिखाए रास्ते पर चलने लगे। चलना ही था। सब रट रखा था। आगे जब ब्लॉक से लेकर जिलास्तरीय, राज्यस्तरीय तक उनका कद बढ़ा तो गांधी काम आने लगे। गांधीवाद के सिद्घांतों ने बड़ी मदद की। गांधी जी महान थे। उनकी कथनी-करनी एक थी। राजनीति में पद-पैसा पाने के सख्त खिलाफ थे। देश की सेवा में जेल गए। कष्ट उठाए। यातनाएं सहन कीं। सेवा समझते थे सियासत को..। उन्होंने राजनीति के महान सिद्घांत दिए . . टाइप की बातें करने लगे। सब रटा था। रटाई काम आने लगी। राजनीति में शुचिता-नैतिकता टाइप की बातें करने वालों की कतार में दिखाई देने लगे। इन बातों से सियासत में सब डरते हैं। जैसे नंगे से खुदा डरता है, उसी टाइप। लोग बचते गए। हटते गए। जगह देते गए। नेताजी मदमस्त सांड की तरह सिद्घांतों के सींग सबको मारने लगे। काम चलता रहा। कद बढ़ता रहा। देशव्यापी हो गया। सरकार का हिस्सा हो गए। देश चलाने लगे।
अब एक दिक्कत आ गई! सिद्घांतों से जुड़ी।

विपक्ष और सड़क पर गांधीजी सरल हैं। जिम्मेदारी आते ही निभाने में कठिन।
 सो दिक्कत पेश आने लगी। सिद्घांत मुश्किल दिखाई देने लगे। सरकार का हिस्सा बनकर भी भविष्य सुरक्षित नहीं किया तो गांधी टाइप लंगोट ही रह जाएगी। लेकिन अब जिन सिद्घांत को अपनाकर यहां पहुंचे हैं उन्हें छोड़ने की बेवकूफी भी तो नहीं की जा सकती है। तो क्या करें? प्रश्न विकट था। चिंता गहन थी। दिमाग घूम गया।


फिर काम आ गई दिव्य दृष्टि! 
ऐसे ही टेढ़े बखत के लिए दृष्टि में दिव्यता भरी थी। सुकून आ गया। पढ़ाई बेकार नहीं जाती कभी! बस उपयोग का हुनर आना चाहिए।

सिद्घांतों को मॉडर्न टच तो दिया ही जा सकता है। समयानुकूल तो किया ही जा सकता है। व्यावहारिक बनाने के लिए कौन सा डॉक्टर मना कर रहा है। सिद्घांतों पर ही चलेंगे। कलेवर नया रखेंगे।

अब गांधीवादी सिद्घांतों की व्यावहारिकता कुछ यूं हो गई ..गांधीजी ने क्या किया था। हम क्या करेंगे कि व्यवस्था निर्धारित कर ली। कुछ इस तरह..


मार्च करना जरूरी है, दांडी की तरह.. तो जरूर करेंगे। चाहे स्विट्जरलैंड के किसी होटल से किसी बैंक तक ही न किया जाना हो। ससुरा जरूर करेंगे। मार्च का सम्मान होगा।

असहयोग करना जरूरी है, जरूर करेंगे। हर सही काम के प्रति यही रुख रखेंगे साला! सही काम, सही व्यवस्था, सही परिणाम दिलाते हैं भला।

क्विट इंडिया आंदोलन चलाना जरूरी है। जरूर चलाएंगे। हर सही अफसर को इस व्यवस्था से क्विट करने पर मजबूर कर डालेंगे। वैसे भी इस टाइप के लोगों का यहां क्या काम? इनकी जगह तो घर में है। वहीं रहें।
हम तो भाई पूरे मनोयोग से उनके मूल्यों को आत्मसात करेंगे। हर मामले का सही मूल्य आंकने में कोई कोताही न करेंगे। उन्होंने ट्रस्टीशिप सिद्धांत दिए हम भी अपना ट्रस्ट बनाएंगे। ट्रस्ट बनाकर बंधु-बांधवों का भी भला करेंगे।

गांधीजी ने खिलाफत की थी। हम भी जरूर करेंगे।

विपक्ष की हर बात की खिलाफत करेंगे। सही हो या गलत। खिलाफत होगी। हो के रहेगी। कोई न रोक पाएगा हमें। सरकार सुनने के लिए बनी है क्या? ज्ञान नहीं चाहिए। विपक्ष की काहै सुनें। जब ससुरे सत्ता में आएं तो कर लें मन की। जब तक हम अपने मन की करेंगे। सो, कर रहे हैं। घर भर रहे हैं। गांधी पर भरोसा है। उनके सिद्घांत रास्ता दिखाते हैं। अंधेरे में टॉर्च टाइप काम कर जाते हैं। उनके दिखाए रास्ते पर चलना है। चल रहे हैं। चलते रहेंगे। कैसी परेशानियां आएं कदम न डिगने देंगे।

सो अब बड़े नेता हैं! 
बचपन से ही थे दिव्य दृष्टि संपन्न। और खास ये कि अभी भी गांधी के दिखाए रास्ते पर चलने को हैं तत्पर..।

नागपंचमी पर दो बूढ़े सांप मिले। थे कवि। आपस में भिड़े। एक ने कहा कौन है आजकल ज्यादा खतरनाक इंसान या सांप। या इंसानी सांप। इस पर हमने कविता रची है साली कालजयी टाइप की बन पड़ी है। सुनो..तुम सुनो। बहस चल रही थी। इतने में पास में लेटे एक अजगर ने आकर दो लातें जमाईं। साले-सोने भी नहीं देते। पावभर तो बचे हैं। सांप और इंसान की बहस में लगे हैं। जब जहर था तब क्या कर लिया अब बूढ़े हो, ऊपर से कवि किसी ने सुन लिया तो फोकट में मारे जाओगे। दोनों सांप अजगर के सामने ही फिर गुत्थम-गुत्था होने लगे। तब अजगर ने एक को पूंछ में लपेटा दूसरे को मुंह में भरा। कर्रा झटका। एक-एक तरफ पटका। फिर बोला- हरामखोरो! बड़े साहित्यिक बनते हो। रचना सुनने पर लड़ते हो। साहित्यिक कायदों का तो ख्याल करो। बंद कमरों में लड़ो। पीछे से बुराई करो। जड़ें काटो। सार्वजनिक रूप से तो गले लगो। इंसानों में ही कौन से कम थे जो अब तुम लोग भी रचनाएं फुंफकारने लगे। खैर, अजगर तो सब निगल लेते हैं, उलट-पलट के सब पचा लेते हैं। हमें सुनाओ अपनी-अपनी रचना। हम बता देंगे किसकी कविता में है दम, कौन है बड़ा बम। तब पहले सांप ने गला खंखारा..थोड़ा खराशा..चश्मा ठीक किया औऱ शुरू हो गया।     
लीजिए बंधु सुनिए, शीर्षक है..
अजगर ने फिर कहा- श्रीमान् बंधु वगैरहा न कहें। हम अजगर हैं ऊपर से फिलहाल श्रोता भी हैं। कम हैं। हर कायदे से आजकल सुनने वालों का सम्मान ज्यादा है। इसलिए प्रोटोकॉल का ध्यान रखें। 
अब पहला सांप बोल ठीक है। सर सुनिए, रचना पेश है..


आस्तीन का इंसान..
प्रिय सांप..
सांप हो तो सांप बनो..
विष उगलो या केंचुली छोड़ दो..
डसो या ग्रास बनो..
इसी में तुम्हारे सांपत्व का सम्मान है..
आस्तीन का सांप बनना तो पूरी प्रजाति का अपमान है..


प्रिय सांप..
बूढ़े हो गए हो तुम..
फुंफकारना नहीं भूल रहे..
सौ-डेढ़ ग्राम जहर लेकर
धमकाना नहीं भूल रहे..
छठी का दूध याद आ जाएगा..
जब इंसान तुम्हें अपना विष दिखाएगा..


प्रिय सांप..
जमीन पर लोटना..
कुंडली मारना..
आंखों में भर लेना बदले की बात..
अभिनेता तो हो नहीं..
नेतागिरी में मारे जाओगे..
इंसानों की नकल..
गुरू, खतरनाक है तुम्हारा शगल..


प्रिय सांप..
देवताओं के काम आते हो..
विष्णु का छत्र बन जाते हो..
दर्द में दवा सा विष तुम्हारा..
परोपकारी बन जाते हो..
उधर, आस्तीन का इंसान..
आस्तीन के सांप से है खतरनाक..
इंसानों को तो है सब पता..
सांप तो भ्रम में है बेचारा..


प्रिय सांप..
दूर रहो इंसान से तो ही अच्छा..
लपलपाना, फुंफकारना, आड़े-तिरछे डोलना..
सारी सरपट चाल भुला देगा..
तुमसे.तुम्हारा मिस्टर विषधर वाला..
सरनेम तक, कल्टियों में छुड़ा लेगा..


अजगर की आंखें भर आईं। उसने उठकर सांप की पीठ थपथपाई। गालों पर दो चुम्मियां लीं। पेड़ के खोखले में पूंछ डालकर एक चूजा निकाला औऱ सांप के न्योछावर करके खा लिया। फिर भरे गले से बोला। उस्ताद क्या बात कही है। 
तुमसे.तुम्हारा मिस्टर विषधर वाला..
सरनेम तक, कल्टियों में छुड़ा लेगा..वाह, वा..वाह, वा..। 
कुछ कहने सुनने को नहीं रह गया है। कविता खुद बोलती है। सब बयान कर देती है। कवि बूढ़ा जरूर है कविता में धार है, जाति की चिंता समाई है इसमें..। सांप प्रजाति का राष्ट्रीय कवि होने की योग्यता रखता है रे तू तो। जय हो। यशस्वी हो। इतन कहकर अजगर ने फिर पेड़ के खोखले में पूंछ डालकर एक चूजा निकाला औऱ सांप के न्योछावर करके खा लिया। एक डकार ली। फिर दूसरे सांप की तरह मुंह करके बोला। हां बे अब तू सुना..। देखें तेरी कविता में कितना दम है। दूसरा सांप थोड़ा लोटा-कुछ पोटा। कुछ पीछे हटा। फिर स्टार्ट लेकर शुरू हो गया।   
सुनिए जनाब, मुलाहिजा फरमाइए मतला पेश है.., हुजूर को जमेगा। आप खानदानी हैं। रसिया हैं। आपके बाप-दादों ने कई कलमनवीसों को इज्जत बख्शी है। हुजूर भी दाद..!
इतने में अजगर ने उसे रोका। फिर टोका। मिस्टर! कलाम सुनाइए। जानवरों के साहित्य में इंसानी  तौर-तरीके और चमचागिरी मत लाइए। 
दूसरे सांप ने सिर झुकाया। आदाब बजाया। और शुरू हो गया। 




इंसान की केंचुली..
सबसे खतरनाक होता है आस्तीन का इंसां होना..
डसता नहीं छुऱा भोंकता है पीठ में..
कांटे बिछाता है रास्ते में..शबनम की आड़ में..
बांहों में फलता-फूलता है..अमरबेल की तरह
दरख्त को ही खोखला कर देता है एक दिन..
जड़ों में डालता है मट्ठा..धीमे जहर सा..
और कभी सींचता है तेजाबी जहर से..
बुनियादें हिलाने तक रहता है आस्तीन में..
ढहती है जब कोई मीनार..तभी खिसकता है..
नए शिकार की खोज में..खूंखार पंजे लेकर..
उमर भर की परेशानी होती है रुखसत तभी ..
जब खुद की सोच का जहर कर देता है बदन नीला..
या कभी, 
कभी खुद की आस्तीन से ही निकल आता है इंसां..
तब जाती है जान..होता है फरामोशी का इल्जाम..
सबसे खतरनाक होता है आस्तीन का इंसान..


अजगर ने रूमाल से आंखें पोंछी। उसने उठकर सांप की पीठ पर दाद की पूंछ फिराई। गालों पर चार चुम्मियां लीं। तीसरी बार पेड़ के खोखले में पूंछ डालकर एक चूजा निकाला औऱ सांप के न्योछावर करके खा लिया। फिर भरे गले से बोला। उस्ताद क्या बात कही है। 


कभी खुद की आस्तीन से ही निकल आता है इंसान..
तब जाती है जान.. होता है फरामोशी का इल्जाम..वाह, वा..वाह, वा..। 
कुछ कहने सुनने को नहीं रह गया है। कविता खुद बोलती है। सब बयान कर देती है। कवि बूढ़ा जरूर है लेकिन वाणी में ओज है। चिंतन में भयानकता है। जाति की चिंता को स्वर दे डाला है इसने। तू भी सांप प्रजाति का राष्ट्रीय कवि होने की योग्यता रखता है। जय हो। तू भी यशस्वी हो। तमाम औपचारिक क्रियाकलापों के पश्चात अब अजगर ने पूछा- बेटा! जरा ये तो बताओ। दोनों की कविताओं में इतनी गहरी बात। दर्द की इतनी गहन भावना। यथार्थ का इतना अद्बुत संसार कैसे रचा है तुम दोनों ने..शरमाओ नहीं खुलकर जरा बताओ। इस बुढ़ापे में भी कहां से रिचार्ज करवाया है अपने अंदर का जहर..।


तब दोनों सांपों ने श्रृद्धेय की चरणधूलि ली..उनकी सीनियोरिटी के सलाम किया। बात को ताड़ लेने की काबिलियत पर तारीफ का छोटा-मोटा कलमा पढ़ा। फिर रूंधे गले से बताया। सर.., इस जहर के पीछे राज है गहरा। कुछ समय हम रहे इंसानों के संग। पिटारी में पड़े भोगते रहे कष्ट औऱ गम। सुनते रहे इंसानी बातें..। उनकी हरकतें औऱ जबानी जहर देखकर भूल गए अपना जहर। जब तक उनकी कैद में रहे दहशत के मारे कांपते रहे। जब से छूटे हैं अपनी खैर मनाते हैं। हमारे काटे का फिर भी इलाज है, इंसानी जहर तो दादा, लाइलाज है।



हो जाएगा आप बेफिकर रओ भाई साब! 
ऐसी आवाजें तो आपने सुनी होंगी। इन आवाजों को निकालने वाले ऐसे मनुष्य भी आपने देखें ही होंगे।
हर तरह के भाई साब की चिंता ओढ़कर उन्हें निश्चिंत करने वाली यह प्रजाति मनुष्य के जन्म के साथ ही धरती पर चली आ रही है। आपके आस-पड़ोस में काफी मात्रा में इस प्रजाति के परभक्षी मंडराते पाए जाएंगे।

कैसा भी काम हो? कोईसा भी काम हो? सब करवा देने का दावा। तारणहार टाइप की फीलिंग रखते हैं। किसी के भी बाजू में जहां जरा सी भी जगह मिली झाड़-झंखाड़ टाइप उग ही आते हैं।
जबानी जमाखर्च के विशेषज्ञ होते हैं ये! काम होगा नहीं, भाई साब भी जीवनभर निश्चिंत रहेंगे। बैलेंसिंग प्रतिभा होती है इनके अंदर। स्प्रिंग के साथ मनुष्य जाति का निकट का रिश्ता जोड़ दिया है इन्होंने! हो जाएगा की स्प्रिंग पूरी ताकत के साथ पिचकती है, नहीं होगा की शक्ति से वापस अपना आकार ले लेती है। यंत्र और मानव का अनूठा गठजोड़ कर डाला है इन्होंने।

हर असंभव काम के लिए इस प्रजाति का चमत्कारिक वाक्य एक ही है-हो जाएगा भाई साब! साला हो कैसे जाएगा इसकी टेंशन भी भाई साब को नहीं लेने देते हैं। होते-होते भाई साब जवानी से बुढ़ापे की दिशा में निकलने लगते हैं। दिया गया काम वहीं रहता है, ‘हो जाएगा प्रजाति’ काफी आगे निकल जाती है।
काफी आगे निकलना ही इस ‘हो जाएगा प्रजाति’ का लक्ष्य है।

अंतिम लक्ष्य! जीवन का उद्देश्य!
अपने जीवन के लक्ष्यों को लेकर यह ‘हो जाएगा प्रजाति’बड़ी सजग रहती है। जिन हथियारों से ये भाई साब किस्म के जीवों को भरमाए रहती है उन्हीं का प्रयोग खुद के ऊपर न होने देने के लिए अडिग रहती है। इसलिए सफल है।

वैसे बड़ी परोपकारी होती है ये प्रजाति। खासी वफादार। भाई साब का सारा तनाव अपने सिर ले लेती है। भाई साब को डाइबिटीज, ट्यूमर, कैंसर, टीबी जैसी बीमारियों से दूर रखती है। काम न होने जब कभी सीधे हॉर्टअटैक की स्थिति बन जाती है, तभी ये नया भाई साब तलाशती है।
मजबूरी में!
‘हो जाएगा’ की खातिर!
जीवन का लक्ष्य साधने की चिंता में!

नया भाई साब मिलते ही अपना चमत्कारिक वाक्य जपने में जुट जाती है।
‘हो जाएगा भाई साब आप बेफिकर रओ।’

कम्युनिकेशन की मास्टर होती है प्रजाति। संचार की भारी विशेषज्ञता रखती है। दिलासे का ऐसा संचारण करती है कि संबंधित चिता पर लेटे-लेटे एक हाथ उठाकर आशीर्वाद दे दे। ये तब भी बाज नहीं आते।
हो जाएगा भाई साब आप सुकून से जलोगे! लकड़ियां चंदन की लगवाईं हैं। तीन दिन तक तो सिर्फ धूप में ही सुखवाई हैं। चिता के नीचे गोबर भी शुद्ध क्वालिटी का लिपवाया है। सूचना भी पूरे शहर को करवा दी है। सब आ गए हैं।
हां, भाई साब आप बस थोड़ा से ठहर जाते अपना काम भी बस होने ही वाला था, फाइल भी निकलने ही वाली थी। श्मशान में भी इनकी मुस्तैदी देखते ही बनती है। सक्रिय रहते हैं हर वक्त।
इतने कि, चिता जलने से पहले ही नए भाई साब का ‘हो जाएगा’ देखने निकल चुके होते हैं।
भयंकर कर्मठता से ओतप्रोत होते हैं ये। भयानक संकल्प शक्ति के धनी होते हैं ये।
अपने मामले में!

भाई साब के मामले में तो उनकी संकल्प शक्ति का भीषण इम्तिहान ले लेते हैं।
हर तरह के भाई साहबों को हर प्रकार की सहनशीलता सीखा देते हैं ये।
भाई साब लगे हैं, दो-चार दिन में काम हो जाएगा!
एक बार साला फंदे में आया कि काम हुआ ही समझो!
बै ज्यादा भाव खा रहे हैं! जुगाड़ नई मिल रई कौनऊ!
बस भाई साब, कल सुबै से साले की खोपड़ी पे बैठ जाऊंगा, कैसे नईं करेगा काम!
हमने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं! साले की चड़्डी का रंग तक जानते हैं नाड़ा खींच देंगे होशियारी धरी रह जाएगी।
काम तो होके रहेगा। आप बेफिकर रओ।

आश्वासनों के अचूक हथियार हैं इनके पास। विविधता इतनी की कोई काट नहीं सकता है। इनका काटा वैसे भी पानी नहीं मांगता है। मांगेगा तो ये उसे कुंआ खुदवाने का आश्वासन देकर निकल लेंगे। जरूरी हुआ तो पानी की पाइप लाइन भी अपने घर की दिशा में ही बिछवाएंगे। ज्यादा हुआ तो बांध बनवाने का आश्वासन देने लगेंगे। आश्वासन हैं, आश्वासनों का क्या? इसी भरोसे दुकानदारी चल रही है। ग्राहक बिचकना नहीं चाहिए। सब तरफ नजर रहती है इनकी।

आधुनिकता से भी लबालब होते हैं ये। देसी से काम न चले तो आश्वासनों के कई हथियारों का बाहर से भी आयात कर लेते हैं। जोर इस बात पर है कि कोई वार खाली न जाए।

कहीं गलती से कोई काम हो गया तो उसे दिशा से भटकी मिसाइल मानते हैं। प्रजाति पर कलंक लग गया। प्रतिभा कुंठित तो नहीं हो गई, टाइप विचारने लगते हैं। संकल्प लेकर फिर मैदान में जुट जाते हैं।
फायर एंड फॉरगेट इनके प्रेरक वाक्य हैं!
‘भाई साब का हो जाएगा’ का फायर करके लक्ष्य फॉरगेट कर देते हैं। भाड़ में जाए मिसाइल। झील में डूबे या किसी की खोपड़ी में गिरे, अपने बाप का क्या? या बाप की ही खोपड़ी में ही गिरे तब भी अपने बाप का क्या? हालांकि इनके बाप तो पहले ही इनके आश्वासनों की गोलियां खा-खाकर गोलोकवासी हो चुके होते हैं, सो मिसाइल वगैरहा की भी ज्यादा चिंता नहीं करते हैं। कहीं गिरे। किसी पे गिरे। न गिरे। चलनी जरूर चाहिए। चलती दिखनी जरूर चाहिए।

फिर लक्ष्य हांसिल हो न हो फायर की प्रक्रिया इतने खूबसूरत ढंग से बताते हैं कि भाई साब को उसी में लक्ष्य प्राप्ति का आनंद प्राप्त करवा देते हैं। काम हो जाने की अनुभूति से सराबोर कर देते हैं। ऊर्जा से भर देते हैं। पूरा वातावरण ही नई उमंग से खलबला उठाता है।

किसी कथावाचक के साक्षात अवतार हो जाते हैं!

पंडाल भी तालियों से गूंज उठता है। जयकारे लगने लगते हैं चहुंओर। हरे-हरे गूंजने लगता है हर कहीं..। काम हो न हो। मोक्ष मिले न मिले। कथा तो सरस है। प्रक्रिया तो सहज है। टकटकी लगा लेते हैं श्रृद्घालुजन। आंखों से टपाटप आंसू गिरते हैं फिर। भाव-विभोर हो जाते हैं भाई साब। मंजिल किसने देखी है रास्ते का विवरण तो जोरदार है। श्रृद्घा से नत है देश। भाई साब भी बलि-बलि जाते हैं। ‘हो जाएगा’ प्रजाति का संचारण ऐसा ही सम्मोहनीय होता है।
वैराज्य दिलवाते है, माया-मोह से। संसार नश्वर है। दुनिया फानी है। क्या लेके जाओगे। बिना प्रवचन झाड़े ही भाई साब को मोक्ष के पथ पर रवाना कर देते हैं। मोक्ष की दिशा में मिसाइल छोड़ दी है। आपकी सीट भी रिजर्व करवा दी है। काम हुआ नहीं। भाई साब निश्चिंत हैं। संचार के भारी विशेषज्ञ होते हैं न ये! श्रोताओं को फुल आनंद की प्राप्ति करवा देते हैं, जबानी जमाखर्च के बलबूते ही। काम साला भाड़ में जाए.. क्या साथ लेके जाओगे? खाली हाथ आए थे साला, भर के ले जाने की कुकर्मी भावना रखते हो।
ज्ञानी मनुष्य तो तत्काल सब सीख लेता है। संसार में उलझना छोड़ देता है। हालांकि ये उसे उलझने लायक रहने ही नहीं देते हैं। अज्ञानी जरूर संसार में उलझा रहता है। हमारा काम कब तक होगा की रट लगाए रहता है। तब ये ‘भाई साब हो जाएगा आप बेफिर रओ’ का डोज बढ़ाकर उसे अज्ञानता के दलदल से खींचने का भरपूर प्रयास करते हैं।

मधुर वाणी-खूबसूरत भावभंगिमाए!
सहनशीलता का अद्भुत इम्तिहान!
मुर्दो तक की आंखें खोल देता है। भाई साब भी एक दिन सीख ही जाते हैं। माटी की देह माटी में मिलेगी। क्या लेकर आए थे, क्या ले जाना है। दुनिया आनी-जानी है। ऊपर से फानी भी है।

संक्षेप में संसार नश्वर है!
‘हो जाएगा’ अमर है।

सो, एक दिन उसके सारे क्लेश कट जाते हैं। मनुष्य निर्विकार भाव को प्राप्त हो जाता है। बचा रहा तो..।
वैसे कई बार तो मुझे लगता है कि देश के नेता इसी ‘भाई साब का हो जाएगा’ प्रजाति से प्रताड़ित होकर ही तो इस धंधे में नहीं उतरे हैं। ताकि आश्वासनों की खुंदक और काम न होने के व्यक्तिगत तौर पर हुए जुल्मों का बदला सामूहिक तौर पर राष्ट्र से ले सकें। कुछ इस तरह?

हो जाएगा देशवासियों!
धैर्य धरें! कई स्तरों पर बात चल रही है! हमारे सहनशक्ति की परीक्षा न लें! हम कड़ी कार्रवाई करेंगे! अबकी बार ये अंतिम चेतावनी हैं!

आतंकी आते हैं वारदात करके निकल जाते हैं। घोटाले होते रहते हैं। योजनाएं आगे नहीं खिसकतीं। राष्ट्र विकास पथ पर अड़ियल टट्टू बना खड़ा रहता है।

और देश भी कुछ हो जाएगा.., कुछ अच्छा हो जाएगा.. साला हो ही जाएगा.. का धैर्य धरे बैठा है..भाई साब की तरह..। प्रतीक्षारत..।
अन्यथा अगर नेताओं को बदला नहीं भांजना है तो फिर और क्या कारण हो सकता है हर मामले में हमारी राष्ट्रीय लाचारी का..।

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पिताजी का सरकारी नौकरी में होने के कारण निरंतर ट्रांसफर। घाट-घाट का पानी पीया। समस्त स्थलों से ज्ञान प्राप्त किया। ज्ञान देने का मौका आने पर मनुष्य प्रजाति ने लेने से इनकार किया तो इस तरह के व्यंग्यों के रूप में कसर निकाली। कहीं जाते समय ऑटो पंक्चर हुआ तो उतरकर जिस सद्भावना के साथ उसके ड्राइवर के गुणों का विश्लेषण और महिमामंडन किया उसे लोगों ने कलांतर में व्यंग्य के रूप में पहचाना। व्यंग्य अव्यवस्था के खिलाफ इसी ड्राइवरीय सद्भावना की पारी को आगे बढ़ाने का जरिया। अपने बल्ले के बल पर जबर्दस्ती टीम में घुसकर क्रिकेट खेलने के शौकीन। फिल्मी क्षेत्र की थोड़ी-बहुत जानकारी रखने की गलतफहमी। कुल मिलाकर जो हैं वो नहीं होते तो अद्भुत प्रतिभाशाली होने का दावा। तो इतने भीषण हालात में एक व्यंग्यकार का जन्म हुआ। अभी तक खुद की खोज 200 किलोमीटर तक पहुंची और 300 किलोमीटर बाकी है।

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