<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491</id><updated>2012-03-14T21:17:50.407+05:30</updated><category term='hashya vyang'/><title type='text'>शब्द-योग</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>98</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-1129972447157715820</id><published>2012-03-08T11:31:00.005+05:30</published><updated>2012-03-08T11:37:42.787+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hashya vyang'/><title type='text'>गिले-शिकवे भूलकर हो गया ‘इंतजाम’ का जुगाड़.</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-qtQafT-bHe0/T1hMZSEKxkI/AAAAAAAAAWU/FhlJOFvK5yc/s1600/Holi-8.jpg" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="291" width="320" src="http://2.bp.blogspot.com/-qtQafT-bHe0/T1hMZSEKxkI/AAAAAAAAAWU/FhlJOFvK5yc/s320/Holi-8.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं.. ’, गिले-शिकवे भूलकर दोस्तो, दुश्मन भी गले मिल जाते हैं.’ ठेले पर डेक रखा है। फुल वॉल्यूम में गाना बज रहा था। ठेले के आगे-आगे हुरियारों की टोली पूरे मोहल्ले में घूम-घूमकर होली मना रही है। हर घर के सामने रुकती, रंग लगाती, गले मिलती। फिर झूमती गाती आगे बढ़ जाती। कुछ ज्यादा ही जोश का समां बना हुआ है। बड़े-बूढ़ों-बच्चों सभी को रंग लगाया जा रहा है। एकाएक टोली के आगे चलता अगुवा एक घर की तरफ इशारा करके फुसफुसाया- ‘इस घर में कोई नहीं घुसेगा..ये साला वोई है जो चंदा देने के नाम पर झगड़ा कर रहा था। हमें समझा रहा था कि चंदा करो और गरीबों में कपड़ा-खाना-रंग बांट दो..., इसे तो मनाने दो उन्हीं के साथ होली। इसके घर में तो एक बूंद रंग भी नहीं गिरना चाहिए, आगे बढ़ाओ रे ठेला..।’ कहकर झूमते हुए आगे बढ़ गया..। बाकी हुरियारे भी घर की तरफ नफरत के साथ देखते हुए आगे बढ़ लिए। पीछे से गाना अभी भी फुल वॉल्यूम में दहाड़ रहा है, गिले-शिकवे भूलकर, दुश्मन भी..!’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(2) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-4eBB8_RwIu8/T1hMiqw4jqI/AAAAAAAAAWg/9dk-RuJRGi0/s1600/Holi-2.jpg" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="291" width="320" src="http://1.bp.blogspot.com/-4eBB8_RwIu8/T1hMiqw4jqI/AAAAAAAAAWg/9dk-RuJRGi0/s320/Holi-2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;‘इस बार को होली ऐसी जलनी चाहिए कि पूरा शहर दंग रह जाए..सबसे ऊंची होली होना चाहिए हमारी..’ होली मनाने के लिए मोहल्ला कमेटी की गंभीर मंत्रणा चल रही है। हर कोई एक से बढ़कर एक आइडिये फेंक रहा है। ‘कंजूस हो गए हैं लोग, चंदा तो देते नहीं हैं’ पहला विचार आया। ‘लकड़ियां भी तो देखो साली सोने के भाव बिकने लगी हैं’ दूसरा विचार प्रकट हुआ। ‘अरे यार सारा चंदा लकड़ियां खरीदने में ही लगा देंगे तो बाकी ‘इंतजाम’ का पैसा कहां से आएगा.’ एक चिंतित सी व्यावहारिक आवाज आई। चिंता का पल आया। वातावरण गंभीर सा हो गया। ‘अपने पास है गुरु इंतजाम, बस थोड़ी हिम्मत दिखानी होगी’, एक भाई ने मुंह खोला। तत्काल ही छंट गया दबाव। वातावरण में पुरानी ऊर्जा फिर लौट आई। &lt;br /&gt;‘जुगाड़ है तो बताओ न, और हम काहे के लिए यहां माथाफोड़ी कर रहे हैं कमेटी की एकजुटता भरी आवाज आई। ‘वो जो झुग्गीवाला इलाका है न उसमें मंगलू की झोपड़ी में लगी हैं अच्छी खासी लकड़ियां, छप्पर पर भी ढेर सारी लकड़ियां पटक रखी है साले ने.. ’ ‘और मंगलू?’ ‘वो तो गांव गया है मैंने अपनी आंखों से जाते देखा है.. ’ ‘नहीं यार, गरीब की झोपड़ी.! कुछ दबी-दबी सी आवाजें निकलीं। फिर बहस हुई औऱ प्लान बन गया। आखिर में ‘इंतजाम’ के लिए ‘जुगाड़’ कर लिया गया। होली जमकर मनीं।&lt;br /&gt;(3) &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-sHli7bCp5tE/T1hMpxEUB8I/AAAAAAAAAWs/nK8aiwfZnzA/s1600/Holi51.jpg" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="291" width="320" src="http://2.bp.blogspot.com/-sHli7bCp5tE/T1hMpxEUB8I/AAAAAAAAAWs/nK8aiwfZnzA/s320/Holi51.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;‘और बता यार तेरा होली का क्या प्रोग्राम है..’ एक ने दूसरे से पूछा। दोनों दोस्त थे। एक पुलिया से दूसरा कार से टिककर खड़ा था। ‘बस, यार कुछ नहीं..बस टीवी के सामने बैठूंगा। कुछ नेट पर जमकर चैट-शैट करूंगा। फिर बस लंबी तान कर सोऊंगा।’ ‘तू रंग नहीं खेलेगा क्या? ’ ‘बोरिंग यार, क्या त्योहार है। मैं नहीं खेलता। बच्चों को भी मैंने मना किया हुआ है। क्या गिचपिच, हुडदंग होता है। कलर्स में भी कितने केमिकल मिलने लगे हैं पूरी स्किन खराब हो जाती है। तमाशा है यार, रंग खेल फिर पूरे दिन छुड़ाते रहो।’ ‘यू आर राइट..बड़ा डर्टी सा लगता है। मैं भी दो डीवीडी लाया हूं जमकर पिक्चर देखूंगा, चल निकलते हैं। ओके बॉय!’ सड़क के दूसरी तरफ कुछ बच्चों एक दूसरे पर पानी फेंक रहे हैं। धूल उड़ा रहे हैं। हाथों से एक दूसरे के चेहरों पर रंग मल रहे हैं। उनका उत्साह देखकर लगता है कि उनकी होली तो अभी से ही शुरू हो गई है। कम से कम दो-तीन दिन चलेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-1129972447157715820?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/1129972447157715820/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=1129972447157715820' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/1129972447157715820'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/1129972447157715820'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2012/03/blog-post_08.html' title='गिले-शिकवे भूलकर हो गया ‘इंतजाम’ का जुगाड़.'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-qtQafT-bHe0/T1hMZSEKxkI/AAAAAAAAAWU/FhlJOFvK5yc/s72-c/Holi-8.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-1958677953204632931</id><published>2012-03-03T20:03:00.000+05:30</published><updated>2012-03-03T20:03:12.536+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hashya vyang'/><title type='text'>अजब प्रेम की गजब कहानी उर्फ मिलिए मॉडर्न हीरोइन से....</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://shafali.files.wordpress.com/2010/08/caricature-cartoon-kareena-kapoor-bebo-bollywood-heroine-portrait-drawing-sketch-size-0-zero.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://shafali.files.wordpress.com/2010/08/caricature-cartoon-kareena-kapoor-bebo-bollywood-heroine-portrait-drawing-sketch-size-0-zero.jpg" width="259" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;जमाने के हर क्षेत्र में बदलाव आ रहा है। नायिकाओं का व्यक्तित्व तक बदलाहटों के दौर से गुजर रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो ऊपर की थीम के साथ अपने इस लेख की नायिका को मान लीजिए किसी कॉलेज में हिन्दी साहित्य की छात्रा। &amp;nbsp;अब इसके परिवर्तित होते व्यक्तित्व पर एक नजर डालते हैं.. अब वे वर्तमान प्रेमी से प्राप्त लेटर को सीने से चिपकाए सपने में गाना गाने के स्थान पर अशुध्दियों में गोले लगा-लगाकर वापस भेज देती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यावहारिक हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;जो सही भाषा नहीं लिख सकता वो प्यार क्या करेगा, की &amp;nbsp;फीलिंग रखती हैं। इस तरह अपनी इस नायिका का यह प्यार चल रहा था। वे गोले लगे लेटर को बड़ी मेहनत से वापस लिखकर भेजते थे जिसे वे फिर से नए शब्दों में गोले लगाकर भेज देती थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे निरंतर लेटर लिख-लिखकर इस विधा में विशेषज्ञ हो रहे थे। वे भाषा में अशुध्दियों के दूर करने का अपना अभ्यास करतीं, प्रेम मूल कर्म के अलावा दीगर कामोंे में उपयोगी है। सो वे इसी बहाने अपना भाषा ज्ञान भी ठीक कर लेतीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;नायक-नायिका के प्यार के लिए नई परिस्थितियों के बारे में तो सोचना ही होगा न भाई। तो लेटर आ रहे थे, लेटर जा रहे थे। प्यार परवान चढ़ रहा था। अभ्यास जमकर सध रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;दोनों तरफ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;ये भाषाविद वे साहित्यिक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्य में गलतियां जरूरी तभी बड़े साहित्यकार बनने का की गुंजाइश। क्लासिकल रचनाकार कहलाए जाने की संभावना छुपी थी। मेहनत से नए शब्द लाते, वे उतने ही परिश्रम से गोले लगाने का श्रम करतीं। ये साहित्य की बगिया से शब्द चुगते, वे शब्दों में से गलतियां चुनती थीं।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;चुनने के मामले में बचपन से ही तीक्ष्ण थीं। हर चीज में से अच्छा बेहिचक चुन लेती थीं। खराब चीज बहनों के हिस्से आएं तो आएं। भाई रूठे तो रूठे। पिताजी स्वार्थी कहें तो कहें। वे पुराने जमाने की नायिका नहीं हैें कि जो मिला उसे नियती मान चुपचाप सहन कर लिया। अब वे हर चीज में से बेहतर चुनने के प्रति प्रतिबध्द हैं। आप थोड़ी देर के लिए नायिका के आदर्शवाद को मोड़कर स्टूल पर रख दें तो बेहतर होगा, मित्र।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;चुनने के मामले में इतनी अनुशासित थीं कि दो प्रेमी अध्दवार्षिक परीक्षा से आगे नहीं बढ़ पाए थे। एक वार्षिक परीक्षा तक आ भी गया था तो सप्लीमेंट्री क्लियर नहीं कर पाया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरा प्रेमी उनको जमा था। लिखता बहुत अच्छा था। चुटके बहुत अच्छे बनाता था। हैंडराइटिंग सुंदर थी। बड़ा घर-छोटा परिवार था। सोफा पर्दे से मैचिंग का था। उनकी मम्मी का मुंह मोहल्ले की आंटियों में सबसे डरावना था। पापा बोलते कम सोते ज्यादा थे। उनकी बहन पढ़ने-लिखने वाली थी। ऊंची तालिम के लिए विदेश जाने वाली थी। घर में कुत्ता एक गाड़ियां तीन थीं। एक नौकर तीन बाइयां थीं। घर में सबको बाजार का बना अचार ही अच्छा लगता था। होटलों में खाने के भारी शौकीन थे। मम्मी से मोहल्ला डरता था तो पिताजी से रिश्तेदार चिढ़ते थे। कुत्ता इतना ट्रेंड था कि केवल परिचितों पर ही भौंकता था। बाइयां इतनी सीधी थीं कि दूसरों के घरों में ही चोरी कर संतोष कर लेती थीं। नौकर इतना जाहिल था कि सौदे में ढंग से पैसे तक नहीं मार पाता था। वे नालायक थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरा परिवार चुना हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;छांट-छांटकर एक से एक नगीने एकट्ठा किया हुआ था। और जैसा कि बताया गया है कि वे चुनने के मामले में बचपन से ही तीक्ष्ण थीं। नियती से लड़ना जानती थीं। पुराने जमाने की मासूम नायिका नहीं थीं।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;एक बार तो दुपट्टे की दुकान पर उन्होंने इतनी देर तक दुपट्टे निकलवाए थे कि दुकान पर झंझावात आ गया था। बाकियों को छोड़कर सभी उन्हें ही दिखाने में लग गए थे। शुरू में मालिक हर दुपट्टे की तारीफ कर उन्हें दिखा रहा था। बाद में केवल रंग बताने पर उतारू हो गया। हालांकि जब वे और दिखाओ, और दिखाओ की रट लगाने लगीं तो वो उन्हें लट्ठे और लुंगी के कपड़े तक दिखाने लगा था। इससे भी उनका मन नहीं भरा तो दुकानदार की ओर से उनसे विशेष विनती की गई कि इनमें से कोई भी कपड़ा फ्री में उठा लें और भविष्य में यहां पधारने के बजाए सामनेवाले दुकानदारों को भी अपनी सेवा का मौका दें। बल्कि उसने तो दो-तीन दुकानों के मोबाइल नंबर तक उन्हें लिखवा दिए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाते-जाते दुकानदार को वे कह भी गईं थीं कि भैइया आपकी दुकान पर रेंज बहुत ही कम है। उनके जाते ही दुकानदार ने उनके चरणों की धूली ली थी, नौकरों को ऐसे ग्राहक को सामान दिखाने पर भयंकर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी थी। चुनने के मामले में वे ऐसी ही थीं जो नहीं भाता था उसे नजरों से उतार फेंकती थीं। और जैसा कि बताया जा रहा है वे नियती से लड़ना चाहती थीं। मासूम नहीं थीं आदि-आदि।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;उनका बस चलता तो वे अपने माता-पिता से लेकर पैदा होने तक का अस्पताल खुद ही चुन लेतीं। आज भी जब उन्हें बताया जाता कि कैसे उनके पैदा होने पर सरकारी अस्पताल में मिठाई बांटी गई थीं तो वे मनमसोस कर रह केवल इतना ही बोलती थी कि - एक्चुअली गवर्मेंट हास्पिटल क्राउडेड होते हैं इसलिए पापा के 1000 रुपए खर्च हो गए थे। अंग्रेजी स्कूुल के सामने से गुजरते समय उन्हें अपनी सरकार ड्रेस पर कोफ्त आती थी। तो पिताजी पर इतना गुस्सा आता था कि स्कूल से स्कूटी लेकर निकलती किसी लड़की की गाड़ी लेकर उन्हें कुचल ही डालतीं।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; बचपन में भी उन्होंने सहेलियों के चयन में भारी सतर्कता बरती थी। पक्की सहेली उसी को बनाया था जो टिफन वजनी लाती थी। घर में इमली के पेड़ थे। पिताजी सरकारी नौकर ते। घर में सहेली को बेटी जैसा मानने का रिवाज था। सहेलियों का अदला-बदली कर कपड़े पहनने को प्यार माना जाता था। बाहर से लौटने पर सहेली के लिए भी उपहार लाने बुरी आदतें थीं। सहेली के घर पर फरमाइश कर मनचाहा पकवा लेने जैसी छूट थी। उनकी दूसरी सहेली के घर किराने की दुकान थी। बिस्कुट नमकीन का आसरा था। दुकान से सामान उठाकर खाने को ‘बच्चे है’ं जैसा माना जाता था। पेन-पेंसिल-टॉफिया चुराने जैसी सहूलियतें थीं। कभी-कभार किराने ढोने वाली गाड़ी में बैठकर स्कूल आने का जुगाड़ था। उनके घर में इधर-उधर पड़ी चिल्लर उठाने की अतिरिक्त सुविधा थी। इन दो सहेलियों के अलावा उनकी तीसरी पक्की सहेली की एकमात्र योज्यता उसका सगा भाई था। जिसके माध्यम से लव लेटर जैसा कस्बाई प्रेम करने का शौक पूरा करती थीं।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;इस तरह जैसा कि ऊपर निवेदन किया जा रहा है कि वे चयन करने में अत्यंत तीक्ष्ण थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपर की छोटी-छोटी कहानी तो ट्रेलर हैं कि &amp;nbsp;आधुनिक नायिकाएं वह नहीं है जिसे आप पहले किसी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म में या पुरानी फिल्मों में देखते थे। अब नायिकाएं विचारवान हैं। बुध्दिमान हैं। जमाने की समझ रखने वाली हैं। चुपचाप सहन करने वाली नहीं बल्कि जमाने से लड़ने वाली हैं। कुल मिलाकर वो नहीं जिसे आप पेड़ के इर्द-गिर्द नाचते देखते थे। बलिदान देते देखते थे। नायिका के संपूर्ण व्यक्तित्व में परिवर्तन आ चुका है। आप भी सभी गलतफहमियां दिल से निकाल दीजिए इसी में भला है, मित्र।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अस्तु।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-1958677953204632931?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/1958677953204632931/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=1958677953204632931' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/1958677953204632931'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/1958677953204632931'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2012/03/blog-post_3237.html' title='अजब प्रेम की गजब कहानी उर्फ मिलिए मॉडर्न हीरोइन से....'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-7784717253141383031</id><published>2012-03-03T19:52:00.000+05:30</published><updated>2012-03-03T19:52:23.200+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hashya vyang'/><title type='text'>तमगे बांटू समाज..</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://diskordchicago.com/wp-content/uploads/2011/04/politician-cartoon-in-india.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="261" src="http://diskordchicago.com/wp-content/uploads/2011/04/politician-cartoon-in-india.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;तमगे बांटता है हमारा समाज। उम्रभर के लिए। सच्चे-झूठे। अच्चे-बुरे। बेहिचक।&lt;br /&gt;एक बार तमगा मिला सो खाल के साथ बदन से चिपट जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फलां बहुत ही पाजी है! &lt;br /&gt;अय्याश हैं बै,एक नंबर के!&lt;br /&gt;रिश्वत मत देना, बहुत ईमानदार है पकड़वा देगा!&lt;br /&gt;गऊटाइप हैं भाई साब तो!&lt;br /&gt;लुक्का है घर में मती आन दीज्यो!&lt;br /&gt;भरोसा मत करियो, गंदा खून है, औकात दिखाएगा!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह के तमगे बेहिचक बांट देता है। तमगे देता भर है समाज, वापस नहीं लेता है। जान भले ही चली जाए, किसी का दोबारा मूल्यांकन नहीं करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाचा के साथ यही हुआ था। चाचा के पूरे प्रयासों के बाद भी समाज ने अपने विचारों के तमगे नहीं बदले, जाया हो गई एक जिंदगी बेहतर सलूक की उम्मीद लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनाथ थे वे, मोहल्ले वाले उन्हें चाचा कहते थे। चाचा मोहल्ले से प्यार पाना चाहते थे। इतना प्यारा पाना चाहते थे अनाथ होने का सारा गम खत्म हो जाए। सगे बनना चाहते थे मोहल्ले के। घर-घर में प्यार ढूंढ रहे थे। पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा कहां होता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज तो सगों के बीच तो प्यार है नहीं, बेगानों में कौन प्यार बांटता.. !&lt;br /&gt;चाचा प्यार पाना चाहते थे, मोहल्ला उन्हें तमगे देता रहा। झूठे-बुरे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां आदमियों पर से भरोसा उठ चुका हो? वहां कोई अकेले आदमी पर तो कतई भरोसा नहीं करता।&lt;br /&gt;मोहल्ला प्रैक्टिकल था, चाचा प्रेमिल थे। आज प्रैक्टिकल होना गलत है या प्रेमिल होना?&lt;br /&gt;समय इन पचड़ों में कभी नहीं पड़ता। बस, गुजर जाता है सब देखते हुए। मुस्कुरा कर। मुस्कुराहटें मुद्दे उड़ा सकती हैं, हल नहीं बता सकती हैं। इस मुस्कुराहट में चाचा का दर्द छिपा था। बेहतर मूल्यांकन की उम्मीद का दर्द।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइए, पहले चाचा के जीवन चरित्र के बारे में सुन लेते हैं, मोहल्ले से ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाचा बचपन से ही अनाथ या शायद पैदा होते ही अनाथ कर दिए गए थे या शायद अनाथ ही मिले थे। कोई नहीं जानता। कहलाते चाचा थे। जगत् चाचा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वनामधन्य थे वे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाम तो खैर अभी आपको बताया ही कहां है? वैसे भी उनका नाम रखता ही कौन? यूं भी देखिए तो अनाथों के नाम और आवारा कुत्तों के नामों में ज्यादा अंतर नहीं होता है। मोती, कालू जैसा कुछ। चाचा का कुछ रखा नहीं गया तो ये उस जलालत से बचे रह गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोहल्ले चाचा के बारे में कुछ यूं विचार रखता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका व्यक्तित्व बेहद लीचड़। कृतित्व भयंकर। एक नंबर के भिनकू। गालियों का ओजमयी प्रवाह। बेहद नीचता से ओतप्रोत। उनके प्रारंभिक जीवन के बारे में जितनी जानकारी मिलती है उसके आधार पर उनका जन्म भी कभी शिशु के रूप में ही हुआ होगा। बताया जाता है कि जब उनका जन्म हुआ था तो वे अन्य नवजातों के समान रोए भी थे, अन्यथा तो उनके संपूर्ण प्रयास दूसरों के आंसू ही निकालते रहे। कालांतर में उनके बाल्यकाल और जीवन के बारे में अनगिनित मुंह से बेहद धिक्कार भरी कहानियां प्रचलित हुईं।&lt;br /&gt;मोहल्ले के अनुसार, बचपन से ही वे सभी आवारा बच्चों के आदर्श बन गए थे। उनकी आवारागिर्दी इतनी ऊंचाई पर थी कि सारे बच्चों के बराबर हरकतें वे अकेले कर सकते थे। स्कूल से जन्म-जन्मांतरों की दुश्मनी थी। हालांकि उनका स्कूल में एडमिशन भी तो कौन करवाता। सो इस झंझट से मुक्ति पाकर उनका ये समय भी आवारगिर्दी में जाता था। बचपन में उनका अधिकांश समय किसी न किसी घर का काम करते बीता। किसी भी घर का झूठा खाकर किसी भी दालान में रात गुजरते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े होने पर उनके बारे में बताया गया कि वे मोहल्ले की विधवा पर नजर रखते थे। चाचा बेहिचक दिन में उस विधवा के घर पाए जाते थे। उसके घरवालों में से कोई मदद को आता नहीं था। चाचा बेधड़क हैं सो हर कभी उसकी मदद को पहुंच जाते हैं। बाकी भी मदद तो करना चाहते हैं लेकिन.।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सो चाचा अय्याश हैं। सही बात पर किसी से से दबते नहीं हैं। छुट्टा बोलने से बाज नहीं आते हैं। सो मुंह लगाने लायक नहीं हैं। मोहल्ले के विचार हैं कि साला! आवारा है, जुबानदराज है। भईया अपनी इज्जत अपने हाथ। सो कोई चाचा को लिफ्ट नहीं मारता था। चाचा इस तमगे के साथ खुश थे। इसी आवारगिर्द को मोहल्ले के हर कार्यक्रम में जोत दिया जाता है। शादियों में उनकी व्यस्तता और ज्यादा बढ़ जाती थी..।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाचा जरा भागकर दही तो ले आओ! चाचा जरा दो किलो आलू-एक किलो मटर तो ले आओ!&lt;br /&gt;चाचा, टेंटवाले का मामला जम नहीं रहा है!&lt;br /&gt;चाचा ये..। चाचा वो..।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और चाचा सब मामले जमाने निकल लेते हैं। फिरकी बन जाते हैं। पूरा कार्यक्रम निपटवाकर ही दम लेते हैं। बस, कार्यक्रम खत्म या शादी पूरी हुई नहीं कि उनकी बद्तमीजियों के किस्से शुरू।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाचा परवाह नहीं करते हैं। नेकी कर दरिया में डल देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विदाई के वक्त भले ही लड़की का भाई कहीं जुआ खेलने में लगा रहे चाचा दहाड़े मारकर रोते हैं। बाद में भले ही घरवाले भूल जाएं चाचा टेंट का सामान गिनवाकर वापस करवाते हैं। रिश्तेदारों को दौड़-दौड़कर बस स्टैंड तक छोड़ने जाते हैं। हर झिक-झिक के सामने खड़े नजर आते हैं। लड़की के घरवाले सबके अहसान का बदला चुकाते हैं, हर को तिलक लगाकर विदाई देते हैं। बस चाचा को भूल जाते हैं। चाचा इस व्यवहार को भूल जाते हैं। कभी राखी बांधी थी गुड्डो ने, बहन की शादी थी। ठीक से उसका सामान लद गया है कि नहीं, चाचा की इस बात की चिंता है। कोई चाचा के चेहरे पर देखे तो, बहन की शादी निपटने की असीम शांति सगे बाप से ज्यादा ही दिखाई देगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाचा प्यार पाना चाहते थे। मोहल्ले के हर घर से। इतना प्यारा पाना चाहते थे अनाथ होने का सारा गम खत्म हो जाए। सगे बनना चाहते थे मोहल्ले के। घर-घर में प्यार ढूंढ रहे थे। मोहल्ले में कई लोगों को खून देने के बावजूद भी &amp;nbsp;संबंधों को खून के रिश्तों से भी बढ़कर मानते-निभाते थे। इस नाते कोई बुलाए न बुलाए पहुंच जाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाचा मोहल्ले को सगा मानकर प्यार देते हैं मोहल्ला भी उन्हें अपना मानकर केवल दुत्कार ही देता है। न चाचा बाज आते हैं, न मोहल्ला। अपनी आदतों से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों अपनी-अपनी जगह खुश हैं। बदलता कोई नहीं। ज्यादा हुआ तो मोहल्ला चाचा की शान में एक और तमगा बढ़ा देता है। मोहल्ला मानता था कि चाचा काम के आदमी हैं लेकिन पता नहीं किसका गंदा खून हैं। सो काम भले निकाल लो लेकिन दूरी बनाए रखो। आवारा है। जुबानदराज है। काम निकालो दूरी बनाए रखो।&lt;br /&gt;गंदा खून हैं। आवारा हैं। चाचा के स्थायी तमगे थे। काम निकाल लो, दूरी बनाए रखो। मोहल्ले का स्थायी सुर था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाचा कि कहानी का अंत बड़ा मार्मिक सा हुआ। अनाथों की कहानियों के मार्मिक अंत ही होते हैं।&lt;br /&gt;हुआ कुछ यूं कि एक बार भरे बाजार में मोहल्ले की दो लड़कियों को गुंडों से बचाने में दर्जनों चाकू खा गए। अस्पताल में भी खून देने कोई पहुंचा नहीं। आवारा दोस्तों को पता चला तो सारे खून देने अस्पताल जा पहुंचे। चाचा को बचाया नहीं जा सका। मोहल्ला स्थिति पर नजर रखे रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिता को भी आग देने की हिम्मत भी मोहल्ले से कोई नहीं दिखा पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाचा के आवारा दोस्तों ने ही उन्हें मुखाज्नि दी। चंदा जोड़कर तेरहवीं का भी इंतजाम उन्हीं आवारागर्दो ने किया। मोहल्ला तेरहवीं में पहुंचा। करारी पूरियों के साथ चाचा की जन्मकुंडली के चटखारे लेता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक साधारण सी कहानी खत्म हो गई। मतलब अपने गिरे हुए-गंदे खून वाले आवारा चाचा नहीं रहे। मोहल्ला अपने रुटीन काम में लग गया। वैसे भी साधारण सी कहानियों में ज्यादा रस नहीं होता है। ज्यादा ट्विस्ट भी नहीं होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक अनाथ सी जिंदगी थी, एक बेकार सी कहानी सामने आई। कूड़ा-कंडम। डस्टबिन में डालने लायक। चाचा भी कहीं इतिहास में भी दर्ज नहीं हुए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि कुछ प्रश्न शेष रहे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके बारे में गिरा हुआ सोचने वाले कौन थे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीचता उनके विचारों में थी या मोहल्ले के ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रश्न अधूरा है ? जवाब भी कोरा..?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और वक्त हमेशा ऐसे प्रश्नों पर उत्तर देने के पचड़े में पड़ता नहीं है। कतराकर निकल जाता है। हमेशा। समाज भी कोई सबक नहीं लेता है। तमगे बांटता रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वक्त सब देखकर भी मौन रहता है। इस मुद्दे पर वक्त का एक मौन और सही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन क्या मौन वक्त किसी का सही मूल्यांकन कर पाता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी नहीं..!&lt;br /&gt;कितनी ही साधारण कहानियों के नायक बेहतर सलूक की आशा लिये गुजर गए?&lt;br /&gt;चाचा भी तो एक साधारण कहानी के साधारण से नायक थे, बेहतर सलूक के हकदार थे?&lt;br /&gt;शायद..!&lt;br /&gt;।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-7784717253141383031?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/7784717253141383031/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=7784717253141383031' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/7784717253141383031'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/7784717253141383031'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2012/03/blog-post_3658.html' title='तमगे बांटू समाज..'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-5605768524729970751</id><published>2012-03-03T19:43:00.000+05:30</published><updated>2012-03-03T19:43:09.086+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hashya vyang'/><title type='text'>कभी मंच पर उतरें  तो...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://wwwdelivery.superstock.com/WI/223/4029/PreviewComp/SuperStock_4029R-42047.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="225" src="http://wwwdelivery.superstock.com/WI/223/4029/PreviewComp/SuperStock_4029R-42047.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;i&gt;&amp;nbsp;(मंच संचालक के परिचय करवाने के पश्चात् आपको यहां से शुरू होना है।अधिकतम दो परिस्थितियां हो सकती हैं। या तो संचालक आपकी ज्यादा तारीफ करेगा या कम करेगा। )&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;धन्यवाद भाई साब..,&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;जैसी कि हमारे देश में परंपरा है मैं उम्मीद कर रहा था कि भाई साब मेरी जमकर तारीफ करेंगे, मेरी ऐसी-ऐसी खासियतों के बारे में बताएंगे जिनके बारे में मुझे भी पहली बार यहीं पता चलेगा। लेकिन भाई साब ने उतना ही बताया, जितना श्रोता झेल सकें। सो, उन्हें साधुवाद आपको धन्यवाद की आप पधारे। मैं अपनी अज्ञात विशेषताएं जानने से वंचित रह गया। खैर, भाई साब से अलग से पूछ लूंगा..।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;परिस्थिति दो के लिए ..&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;मैं फलाने-ढिकाने भाई साब को धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने मेरी कई अज्ञात विशेषताओं से मेरा आज परिचय संपन्न करवाया। वरना आप किसी से भी पूछ लीजिए मैं खुद को ज्यादा इज्जत देने के पक्ष में कतई नहीं रहा हूं। ज्यादा इज्जत दो तो व्यंज्यकार का आम इंसान में बदलते देर नहीं लगती है। और इस देश का आम इंसान सबर करने में ज्यादा भरोसा रखता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे आदेश हुआ है कि एक व्यंज्य रचना पढ़ दीजिए। मैं तो पांच-छह लाया था। ऐसा मौका और ऐसे श्रोता जाने कब मिलें। हालांकि आज एक दिक्कत हो गई है जिन दोस्तों को मैंने तालियां बजने के लिए आमंत्रित किया था, उन दुष्टों ने अंतिम मौके पर दगा दे दिया है। मैंने अपनी तरफ से काफी प्रयास किए लेकिन टाइम कम पड़ गया। नए लोगों का इंतजाम नहीं हो पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;वैसे मेरे कुछेक परिचित तो यहां आए हैं लेकिन जैसे मजबूत हाथ मेरे उन दोस्तों के हैं वैसे मैंने आजतक किसी के नहीं पाए हैं। फिर ऊपर से से सही जगह पर तालियां बजाने का उनका अभ्यास भी काफी करवा रखा है सो आज मुझे कुछ टेंशन सा लग रहा है। खैर, जाने दीजिए अब हो सकता है रचना पाठ के बीच कहीं तालियां बजें तो वो ओरिजनल ही हों। नहीं बजेंगी तो मेरी पांच-छह रचनाओं वाली बात याद रखें। बिना सुने फिर जाने नहीं दूंगा..।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;हां एक निवेदन और..,&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;रचना पाठ के बीच आप आराम से मोबाइल पर भी बातें कर सकते हैं। मैं आपके लिए वो हिस्सा रिपीट कर दूंगा। हां, आस-पड़ोस से आपको ही निपटना होगा, क्योंकि जो सज्जन एक बार ही मेरी रचना नहीं झेल पा रहे होंगे वो इस रिपीटेशन वाले अपराध के लिए आपके साथ क्या कुछ नहीं कर गुजरेंगे.., तो अभी से सारी बातें साफ कर रहा हूं। भूल-चूक, लेनी-देनी। &amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रचना पाठ के बीच में से उठकर बाहर जाएंगे तो मैं बाद में बाहर आकर सुनाऊंगा, क्योंकि आपको तो पता ही है हरेक श्रोता जरूरी होता है..एयरटेल वाले रोज जनहित में टीवी पर बता ही रहे हैं। जनहित में जारी सभी गैर सरकारी विज्ञापनों में जबर्दस्त फैन हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंच की तरफ से आदेश हो रहा है कि टाइम मत खाओ, रचना सुनाओ, हम भी तो बैठे हैं.., तो अपनी कई रचनाओं में से छंटी हुए एक रचना आपके लिए पेश कर रहा हूं। इस रचना के बारे में भी एक-दो शब्द कहना चाहता हूं। जब लिख रहा था तो निजी तौर पर भाव-विभोर हो गया था। छपी तो पाठकों के आंसू निकल आए थे। कुछ दबंग किस्म के पाठकों ने मिलने की इच्छा भी जताई थी। वो तो अच्छा है भगवान ने छठी इंद्री इसी वक्त के लिए बनाई है। वरना इस गुमशुदा टाइप के अंग की तलाश लोग पूरी जिंदगीभर करते रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.. तो की रोजमर्रा की विषम परिस्थितियों के बीच क्रांति की संभावना को दर्शाती युगांतरकारी रचना पेश है..&lt;br /&gt;शीर्षक है ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;कबरविज्जू के कान उर्फ टेलीफोन उठाओ दादाजी.&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाठ शुरू करने से पहले दो बातें और करना चाहता हूं। मंच पर कई वरिष्ठ बैठे हैं। इनके सामने मैं तो बहुत छोटा लेखक हूं। आपके सामने पढ़ने की हिम्मत भी कर पा रहा हूं तो इनकी हौसला अफजाई का ही नतीजा है। रचना अच्छी लगे तो इन्हें धन्यवाद दीजिए। खराब लगे तो मैं तो छोटा सा लेखक हूं मुझे यहां से निकल जाने दीजिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, हाल के सारे गेट बंद करवा दिए हैं। दोबारा मुद्दे पर आ रहा हूं। सुनिए..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;कबरविज्जू के कान उर्फ टेलीफोन उठाओ दादाजी.&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;.&lt;br /&gt;(&lt;b&gt;नोट:&lt;/b&gt; समझ में आए न आए। शीर्षक ऐसे ही रखिए कोई कितना भी मना करे। इसी से तो इंप्रैशन पड़ता है भई)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंत में यह भी स्पष्ट कर दें..&lt;br /&gt;रचना बहुत छोटी सी है। लगभग 5-7 मिनट की। रचना क्या है। एक दृश्य है..लेकिन ये दृश्य काफी कुछ कहने की कोशिश कर रहा है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;धन्यवाद&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-5605768524729970751?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/5605768524729970751/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=5605768524729970751' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/5605768524729970751'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/5605768524729970751'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2012/03/blog-post_03.html' title='कभी मंच पर उतरें  तो...'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-7002912288614804912</id><published>2012-03-03T19:24:00.000+05:30</published><updated>2012-03-03T19:24:33.054+05:30</updated><title type='text'>ज्ञान की ओवरलोडिंग में दबे अज्ञानता के मजे!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://t2.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcRU66UoG_00E1H480kJ-CkkB2nXYNSSCdB2-ThvgxE4HdFtm4Zcsw" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://t2.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcRU66UoG_00E1H480kJ-CkkB2nXYNSSCdB2-ThvgxE4HdFtm4Zcsw" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;आजकल में इस बात पर सहमा-सहमा सा रहता हूं कि लोगों के पास जानकारियों के &amp;nbsp;अथाह हथियार हैं। छोटी-छोटी बातों पर बेहद गहराई में उतरकर फेंक-फेंककर मारने के लिए विश्लेषण के बम हैं। हर मुद्दे पर खूंखार तरीके से फैला लेने के लिए बहस के पंजे हैं। बस, नहीं है तो अज्ञानता के मजे! सहजता की मस्ती! विचार उल्टा जरूर है लेकिन चिंतन की मांग करता है। सो आप भी तनिक चिंतित हो लीजिए तो बात आगे बढ़ाऊं।&lt;br /&gt;अब कितना भी हटो-बचो सूचनाओं से लदे-फदे सरपट दिमाग टकरा ही जाते हैं। एनसाइक्लोपीडिया हो रहे व्यक्तित्व तो कुचलते हुए निकल जाते हैं। बस, एक मासूम सा वो आदमी कहीं कोने से भी झांकता नहीं मिल पाता जिसे कुछ नया बताने पर आश्चर्य से खुला मुंह और चौंककर फैली आंखें का मजा मिल सके।&lt;br /&gt;आखिर कहां लुप्त हो गए सब अज्ञानी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैच ही देख लीजिए टीम इंडिया क्यों हारी, तेंदुलकर खराब क्यों खेला, कोई इतनी बारीके से आपको समझा जाएगा कि इसके बाद तो आपके पास हर खिलाड़ी की तकनीकी खामी के चलते सिर धुनने का काम ही रह जाएगा। या इतने ज्यादा क्षमतावान नहीं पाए गए तो हर बॉल पर फिक्सिंग की बू तो महसूस कर ही लेंगे। इन विशेषज्ञों के बीच बॉल दर बॉल हर शाट पर लोटने वाले वो क्लासिकल खेलप्रेमी कहां गए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अखबार उठा लीजिए, सेमीनार, विशेषज्ञता लेक्चर प्रबंधन की शिक्षा दी जा रही होगी। जिंदगी की चुनौतियों से निपटने के गुर बताए जा रहे हैं। हर समस्या के साथ विशेषज्ञ मौजूद है पूरी सलाह के साथ। ज्ञान का अजीरण दिखाई दे रहा है हर तरफ। अब इसी आजीरण के चलते ही तो जिंदगी में तकलीफें हैं ये कोई नहीं बता रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले जिंदगी सजह थी। जीने का पैटर्न सीधा था। नाते सरल थे। लालच भी एक स्तर से ज्यादा लालची नहीं था। अब नॉलेज बढ़ा है। दुश्वारियां बढ़ीं हैं। कंप्लीकेशन बढ़ा है। तुर्रा देखिए हर दिशा से सरपट फेंका जा रहा नॉलेज संतोष नहीं दे रहा है, कमतरी दिखा रहा है। दिमाग सूचनाओं का स्टोररूम बना जा रहा है। किसी भी खिड़की से झांकिए फट्टदेनी से एक नॉलेज बाइट मुंह पर पड़ेगी। आप मुंह बचा भी नहीं पाएंगे उससे पहले ही दूसरी दिशा से उससे &amp;nbsp;मुंह बचाने की सलाह आ गिरेगी। पहले तो आदमी मुंह पर फट्ट से पड़ी इस अज्ञानता कल्लाता मुंह लिए मजे से बैठा रहता था। अब दर्द कम करने की जानकारी ही इस पीड़ा को असहनीय बना रही है।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; अज्ञानता के साथ तो फर-फर प्रश्न पूछने का हौसला रहता है। उधर, सूचनाओं की इफरात तो पहल करने में ही रोड़ा बन जाती हैं। जानकारी और विश्लेषण करने की क्षमता का बारीक अंतर बुद्धिमानी की गलतफहमी पैदा कर देता है। अज्ञानता सहजता लाती है, बुद्धिमानी विशिष्टता का भाव पैदा करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;पत्रकारिता में एक बड़ी बेसिक सी शिक्षा दी जाती है आपको कुछ जानना है तो अज्ञानी बन जाइए। अज्ञानता के साथ आप खाली घड़ा होते हैं जहां किसी भी तरह का नया ज्ञान भर सकते हैं। यहां तो ज्ञान के नाम पर आव्यावहारिक सी सूचनाएं भरी जा रही है दिमाग में। हक्कानी गुट की पूरी मालूमात है, तालीबानियों के मामले में पेंटागन से ज्यादा जानकारी रखते हैं लेकिन दोस्ती के लिए फेसबुक नहीं दिल चाहिए, इसकी ‘नॉलेज’ नहीं है। मूंदी चोट लगने पर संसार भर डॉक्टरों के नंबर मिल जाएंगे। लेकिन घर बैठी मां के बताए हल्दी मिले दूध पर ‘विलीव’ नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://t2.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcRU66UoG_00E1H480kJ-CkkB2nXYNSSCdB2-ThvgxE4HdFtm4Zcsw" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://t2.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcRU66UoG_00E1H480kJ-CkkB2nXYNSSCdB2-ThvgxE4HdFtm4Zcsw" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;सो, इस रेडीमेड बुद्धिमानी के लिए क्या कहें। आपको नहीं लगता इससे ज्यादा तो खालिस अज्ञानता अच्छी है जो कम से कम आपकी अपनी तो है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-7002912288614804912?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/7002912288614804912/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=7002912288614804912' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/7002912288614804912'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/7002912288614804912'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2012/03/blog-post.html' title='ज्ञान की ओवरलोडिंग में दबे अज्ञानता के मजे!'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-5081443016417113888</id><published>2012-02-29T16:53:00.000+05:30</published><updated>2012-02-29T17:15:44.522+05:30</updated><title type='text'>वसंत और बजट से बौराई एक कल्पना...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test; font-size: 16px; line-height: 19px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://i2.dainikbhaskar.com/web2images/www.bhaskar.com/2012/02/27/images/development1_f.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em; text-align: justify;"&gt;&lt;img border="0" src="http://i2.dainikbhaskar.com/web2images/www.bhaskar.com/2012/02/27/images/development1_f.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test; font-size: 16px; line-height: 19px;"&gt;विकास सशक्तीकरण हर सरकार को मांगता ही मांगता है। फरवरी वगैरह आने के बाद विकास करने की तलब खाज की तरह जानलेवा हो जाती है। हर अंग विषय की खुजलीकर प्रगति-उत्थान योजनाओं को हरसंभव तरीके से तैयार करता है। योजनाएं हर सरकार को प्रेमिका की तरह प्रिय हैं। सर्वस्व लुटा दो उस पर। मेरा-तेरा क्या सब हमारा! बजट पास होने के बाद से ही सरकार हर तरह की योजनाएं बनाने को उतारू हो जाती है। खर्चा होगा।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test; font-size: 16px; line-height: 19px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इतनी कल्पनाभर से पूरे तंत्र में मादक आवाजें आने लगती हैं। तंत्री-मंत्री सब हर्षाएंगे, राष्ट्र विकास को प्राप्त होगा। घर भरेंगे, अहा-अहा! देश को वसंत के आगमन के साथ ही योजनाओं से पाट दो। ऋतुओं के साथ ही झूमने का समय आ गया है बंधुओ! तंत्र से जुड़े घरों की नारियां गाएंगी। गलियों में.. बागन में, बगरो वसंत है। प्रकृति ने पीत वस्त्र धारण कर लिए हैं। घरों में पांच-पांच सौ के पीले-पीले नोट आएंगे। मनभावन मौसम है झूमो, प्रिय झूमो। निजी योजनाओं को अमलीजामा पहना दो। घर पर दूसरा तल्ला चढ़वा दो। वहां नई कॉलोनी में चार प्लॉट फंसा लो। कुछ सोना भी खरीद के डाल दो। तंत्र में छाई उदासी दूर! मौसम का नशा! चाल में मदमस्ती! बस, बमचक शुरू। ये दिन बार-बार आए! ये मौसम बार-बार आए! एक बार आए तो जाए ही नहीं! जैसे हमारे दिन फिरे, वैसे सबके भी फिरें! उन्हें भी लाभ..,नहीं..नहीं.. लास्ट वाला कैंसिल, केवल हमारे ही दिन फिरें। अहा!.. क्या बात है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;तो इस लिहाज से लगता है कि केवल मौसम और महीने का सम्मान रखने के लिए हर कहीं योजनाएं बनेंगी। हर दिशा में बनेंगी। हर एक के लिए बनेंगी। योजनाएं बनाने के लिए योजनाएं बनेंगी। अधूरी और पूरी हो चुकी योजनाओं के लिए भी योजनाएं बनेंगी। सरकार किसी भी अवसर को हाथ से नहीं जाने देगी। सरकार सबल है। सरकार समर्थ है। समर्थ का कर्तव्य उत्थान है। सरकार हर वक्त उत्थान पर उतारू रहती है। सशक्तीकरण के हर मौके की बाट जोहती है। विषय खत्म हो जाएं, योजनाएं खत्म नहीं होंगी। विकास खुद हाथ जोड़कर खड़ा हो जाए, सरकार नहीं रुकेगी। उसे लात मारते हुए आगे बढ़ जाएगी। प्रगति की खाट खड़ी हो जाए, सरकार बिछाकर दोबारा खड़ी करने के लिए एक और नई योजना ले आएगी। सरकार कोई मौका नहीं छोड़ती है। सरकार थकती नहीं है। सरकार थमती नहीं है। सरकार रुकती नहीं है। सरकार चल-अचल है। सरकार अविचल है। सरकार अग्निपथ है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सरकार कहीं से योजनाएं बनाने के लिए सीखकर नहीं आती है। यह विशेषता उसे जन्म के साथ ही मिल जाती है। उनके लोगों ने कमा लिया, हमारे कब कमाएंगे? तभी न, जब हम योजनाएं बनाएंगे। सो, बनती हैं। जिस देश ने योजनाएं बनाने का कौशल नहीं सीखा, उसने तो सीखा ही क्या है। उस पर तो लानत है! इसलिए तो बेटा रह जाते हो पिछड़े! फिर दूसरे देशों से गिड़गिड़ाकर मांगते हो विशेषज्ञ और पैसा। तब कर पाते हो उधारी का विकास। तब भी तुर्रा देखो, ठसक से आंखें दिखाते हो? आसपास दिख जाएंगे ऐसे आत्मघाती राष्ट्र।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अपने प्रयासों से पिछड़े रहने का स्वाभिमान तो कुछ और ही होता है। उधारी का विकास तो राष्ट्रीय शर्म की बात है। कहने का तात्पर्य ये कि स्वदेशी योजनाएं बनाओ, अपने हाथों से बनाओ, मौलिक हों न हों, लेकिन लोकल जरूर होनी चाहिए। हमारे यहां की सरकार वसंत में यही कर रही है। अपना-उनका माने घरों में पूरा जोर लगाकर वसंत भर रही है। फिलहाल वसंत की सरकारी तौर पर उपयोगिता इतनी ही खोजी जा सकी है&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-5081443016417113888?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/5081443016417113888/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=5081443016417113888' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/5081443016417113888'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/5081443016417113888'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2012/02/blog-post_151.html' title='वसंत और बजट से बौराई एक कल्पना...'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-4272162844720249025</id><published>2012-02-14T18:00:00.000+05:30</published><updated>2012-03-01T20:48:03.328+05:30</updated><title type='text'>भावनाओं की देग पर पुरामहत्व का प्यार</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://images3.bhaskar.com/web2images/www.bhaskar.com/2012/02/14/images/rajnigandha1_f.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://images3.bhaskar.com/web2images/www.bhaskar.com/2012/02/14/images/rajnigandha1_f.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="introTxt" id="print_div" style="background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test; font-size: 16px; line-height: 19px; text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;तो श्रीमान, वैलेंटाइंस डे के शुभ अवसर पर पुरातन पीढ़ी के प्रेम प्रयासों का एक पुनरावलोकन सविनय प्रस्तुत है। ऐसे मौके पर इसी तरह की बातें किए जाने की परंपरा अपने देश में पाई जाती है, ताकि सनद रहे, वर्तमान पीढ़ी प्रेरणा आदि ले सके और मुंह दाबकर यह न कह सके कि हमें तो किसी ने बताया ही नहीं.।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो जनाब, पुरानी पीढ़ी में प्रेम के सबसे मारक हथियार प्रेमपत्रों पर एक नजर। इनके सांगोपांग अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है कि उनमें शेर अत्यंत घटिया एवं भावनाओं की क्वालिटी बढ़िया पाई जाती थी। शीशी भरी गुलाब की पत्थर से तोड़ दूं.. टाइप सामग्री हर दूसरी लाइन के बाद टंकी रहती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि इस कालजयी शेर का रचयिता अज्ञात है, लिखने के बाद से ही नायिका पक्ष के मुस्टंडों से बचने के लिए अज्ञातवास में चल रहा है। इसके अलावा जियरा जलता है, दिन नहीं कटता है.. किस्म के कवित्त का जिक्र भी यत्र-तत्र पाया जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहेलियां खोजी प्रवृत्ति की, परिश्रमी एवं बाय नेचर फुरसतिया होती थीं, जो तिरछी नजर डालकर ही फ्रेंड के फेस पर दिखने वाली मनहूसियत ताड़ लेती थीं। तत्काल दर्दे दिल की दवा करने में जुट जाती थीं। संदेशों के आवागमन के ये प्रयास नारी सशक्तीकरण की दिशा में मील के पत्थर सरीखे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जालिम पिताओं, क्रूर भाइयों की सुताई संबंधी विशिष्ट योग्यता के बावजूद परिश्रमी होने के नाते वे गुरिल्ला कार्रवाई से बाज नहीं आती थीं। वाह-वाह!, ऐसी सहेलियां, धन्य-धन्य! तब का पावन वातावरण। जिसके कारण ही सहेलियों में बहनों और बाद में बच्चे वगैरह होने के पश्चात मौसियों जैसे नाते बन पाते थे। मौसाजी अक्सर इसी डाक वितरण व्यवस्था के दौरान अनायास ही प्राप्त हो जाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नायिकाएं मार्क्‍स लाने में कम, प्रेमपत्रों में गहराई लाने के लिए कड़ी मेहनत करती थीं। ‘उनके’ लिए कोई यथायोग्य संबोधन तलाशने में जमकर माथापच्ची की जाती थी। आज के जैसा नहीं कि एलओवी लिख दिया, बस हो गया काम। इसीलिए संबोधन से भी छोटे रिश्ते बनते हैं। हां, महत्वाकांक्षाएं बड़ी-बड़ी होती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले नायिका पिया के बारे में ज्यादा सोचती थी तो उसके आंसू झरते थे। अब तो पिया की हरकतों के बारे में सोचकर ही हीरोइन की आंखों से चिंगारियां निकालने लगती हैं। तब तो इन प्रेमपत्रों के रियाज के माध्यम से कई कवियों की हैसियत तक पा गए थे। कई की रस-छंद संबंधी ज्ञानेंद्रियां इन पत्रों के माध्यम से ही खुलीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ का तो मानना है कि चांद-तारे तोड़कर लाने की कसमें खाने वाले कुछ बावले सच में ही निकल लिए थे, जिस कारण आदमी के पुनीत कदम चांद पर पड़े। प्यार का इस दिशा में योगदान अविस्मरणीय है। विज्ञान के अपने लफड़े हैं, सो वो इस अहसान को मानता नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नायक-नायिका प्रेम के मामले में लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद जैसे पूर्वजों को सदैव याद रखते थे। इन कल्ट फिगर्स के चक्कर में ही प्यार का ब्याह की मंजिल तक पहुंच जाने पर कोई पक्ष कल्टी नहीं करता था। बलिदानियों को भले ही देश भुला दे, प्रेमी समाज अपने बलिदानियों को एकदम खालिस तरीके से याद रखता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजकल की पित्जा-बर्गर वाली पीढ़ी के लिए भावनाओं की देग पर पकने वाला प्यार पुरामहत्व की वस्तु में बदल चुका है। साइबर स्पेस में जीती पीढ़ी को लगता है कि मजनूं टाइप पहाड़ खोदना या फरहाद टाइप नहर निकाल देना तो फोकटिया डॉटकॉम है। अब तो वचरुअल स्पेस पर जाइए.. प्रियतमा चुनिए.. चैट कीजिए.. दिल टूट जाए तो रोता हुए आइकन लगाकर फेसबुक पर गम शेयर कीजिए और.. आंसू सूखने से पहले किसी और को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दीजिए..। इसी को तो कहते हैं वेल इन टाइम!!!&lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="background-color: white; clear: both; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; float: left; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; margin-top: 5px; width: 660px;"&gt;&lt;div class="w100p" style="width: 660px;"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="cb10" style="clear: both; font-size: 1px; height: 10px; line-height: 10px; overflow-x: hidden; overflow-y: hidden; text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-4272162844720249025?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/4272162844720249025/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=4272162844720249025' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/4272162844720249025'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/4272162844720249025'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2012/02/blog-post.html' title='भावनाओं की देग पर पुरामहत्व का प्यार'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-3936983558155023166</id><published>2012-01-06T15:41:00.001+05:30</published><updated>2012-01-06T15:41:28.910+05:30</updated><title type='text'>जमाना खराब या हम ही बेतरह डरे हुए हैं!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test; font-size: 16px; line-height: 19px;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-Lhh4qyBpXJQ/TwbItlsOzKI/AAAAAAAAAKE/d3sCa8ZZ8Ls/s1600/bbbbb.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/-Lhh4qyBpXJQ/TwbItlsOzKI/AAAAAAAAAKE/d3sCa8ZZ8Ls/s1600/bbbbb.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;बेटा ब्रेड लेने जा रहा है। मैं कई चिंताओं से घिर गया हूं। हालांकि बाजार कॉलोनी से लगा है। बच्च भी कोई छोटा नहीं है, लगभग आठ साल का है। छोटी-सी साइकिल में सरपट पैडल मारते हुए गया है। मैं आशंकाओं में डूबने-उतराने लगा हूं।&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;दुकानदार कमबख्त महंगी ही देगा ब्रेड! पूरा फायदा उठाएगा इस मौके का। हो सकता है, बचे हुए पैसे ही वापस न करे। कहीं पैसे गिर ही न जाएं। जेब भी तो कितनी छोटी है। कहीं हाथ में ही तो नहीं पकड़कर गया था रुपए। अरे यार, इनकी अम्मा भी तो बस..।&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;बच्चे को लेकर अपनी लापरवाही पर गुस्सा आ रहा है मुझे! अभी चार महीने पहले ही तो शर्माजी का लड़का पार्क से गायब हो गया था। ढूंढ़-ढूंढ़कर सब थक गए थे। क्या हंगामा बरपा था। शर्माजी तो कैसे बौराए-से घूम रहे थे। गुप्ता ने तो बताया भी था कि गिरोह घूम रहा है शहर में बच्चे उठाने वाला। लाखों मांगते हैं फिर फिरौती में। चर्चा भी चल रही थी - शर्मा तो मामूली क्लर्क है, कहां से जुगाड़ पाएगा इतनी रकम! डिमांड पूरी न हुई तो कुछ भी ऐसा-वैसा हो सकता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;पुलिस को बताना चाहिए कि नहीं, इस पर भी तो कितना चिक-चिक हुई थी। मामला बिगड़ जाता है। स्साले सब मिले होते हैं। जान है तो जहान है। इकलौता बेटा है। पैसे और बच्च दोनों ही हाथ से न निकल जाए। अपनी छतरपुर पोस्टिंग का एक उदाहरण भी ठोका था श्रीवास्तवजी ने। तब ऐसे ही किसी मामले में पुलिस ने बीच में आकर ऐसा रायता बिखेरा था कि लड़का आजतक नहीं मिला। वो व्यापारी तो पूरे पैसे देने को तैयार था। अरे कई बार तो नालायक भीख मंगवाने के लिए उठाते हैं। कुछ कहा नहीं जा सकता है, जमाना बड़ा खराब है भाई!तब घोर चिंता चल ही रही थी कि छुटकू महाशय लहराते हुए चले आए थे। पता चला कि पार्क से किसी दोस्त के घर चले गए थे। खा-पी के वहीं पसर गए थे। कैसे चूम रही थी शर्माइन बच्चे को छाती से लगाकर।&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;बावजूद इसके मेरी आशंकाएं खत्म क्यों नहीं हो रही हैं!&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;अभी बच्च ही तो है, कहीं किसी से साइकिल टकरा न जाए! गाड़ीवाले भी तो कितनी तेज रफ्तार से चलते हैं। कॉलोनी में भी ऐसा दौड़ाते हैं, जैसे रेसिंग मैदान में हों बापड़े।&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;कहीं गिर ही न पड़े! अभी ठीक से चलाते तो बनती नहीं है। शौक इतना है कि हर कहीं निकल लेते हैं साइकिल उठाकर। इनकी अम्मा को भी कितना समझाया।&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;मजाल है जो हमारी जरा-सी बातें सुनें। किसी ने झापड़ मारकर पैसे तो नहीं छीन लिए हैं! दिन-दहाड़े कितने गंजेड़ी-भंगेड़ी तो घूमते रहते हैं कॉलोनी में। नशा-पत्ती के लिए कुछ भी कर सकते हैं। कितना समझाया चौकीदार रख लो। कॉलोनी में गेट लगवा लो। सबके सब कंजूस हैं। कभी ऊंच-नीच हो गई तो अकल ठिकाने आ जाएगी।&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;विचारों की मूसलधार श्रंखला चल रही है। एक चिंता दो आशंकाओं, चार कुशंकाओं को दिमाग में ला रही है। मुझसे घर में अब रुका नहीं जा रहा है। मैं तैयार होकर बालक को ढूंढ़ने जाने ही वाला हूं कि भाई साब साइकिल पर ब्रेड झुलाते चले आ रहे हैं। मैं तत्काल उसके चेहरे पर अपनी आशंकाओं के चिह्न् ढूंढ़ने लगता हूं। हताशा! वहां तो निश्छल मुस्कान फैली है। मेरी आशंकाएं निमरूल रहीं। मैं ठगा गया हूं। या अपनी सोच पर शर्मिदा हूं। ठीक से तय नहीं कर पा रहा हूं। सचमुच जमाना इतना खराब है! या हम ही बेतरह डरे हुए हैं! पता नहीं?&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-3936983558155023166?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/3936983558155023166/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=3936983558155023166' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/3936983558155023166'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/3936983558155023166'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2012/01/blog-post_6197.html' title='जमाना खराब या हम ही बेतरह डरे हुए हैं!'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-Lhh4qyBpXJQ/TwbItlsOzKI/AAAAAAAAAKE/d3sCa8ZZ8Ls/s72-c/bbbbb.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-895221089852771966</id><published>2012-01-06T15:34:00.001+05:30</published><updated>2012-01-06T15:34:29.628+05:30</updated><title type='text'>गर्मागर्म बहस से निकलती आंच की आस में</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-2eOCHUV_OQ0/TwbHGVWHiJI/AAAAAAAAAJ8/sqhKVaK3Gcs/s1600/sa.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/-2eOCHUV_OQ0/TwbHGVWHiJI/AAAAAAAAAJ8/sqhKVaK3Gcs/s1600/sa.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test; font-size: 16px; line-height: 19px;"&gt;कभी संसद से सड़क तक चलने वाली गर्मागर्म बहस की आंच तापने का सुभीता गरीबों को हो सकता है क्या..? कल रात सड़क किनारे तुड़ी-मुड़ी-सी एक चिट्ठी पड़ी मिली है। किसी भोलू फुटपाथवाले की अपने चाचा के नाम है। जबसे पढ़ी है दिमाग इसी बात में उलझा है। आप भी इस चिट्ठी पर एक नजर डालिए न!&lt;br /&gt;‘चाचा, पाएं लागूं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘उधर आप सब राजी-खुशी होंगे, हमारी तो किस्मत ही फूट गई है। इस बरस यहां पिछले साल से भी ज्यादा ठंड पड़ी है। सर्दी ने लल्ला को बींध दिया है। रात सोते समय भी गांव में आग तापने के किस्से बड़बड़ाता रहता है। खुले में हमारी गुदड़ी ठंड से मुकाबला नहीं कर सकती है। फुटपाथ पर तो चूल्हे का जुगाड़ ही मुश्किल है, अलाव के लिए लकड़ियां कहां से लाएं? पता नहीं यहां सर्दियों में इतनी ठंड क्यों हो जाती है। गर्मियों में इतनी ठंड पड़ जाए तो पूरी रात करवटें नहीं बदलना पड़े। चाचा एक बात तो बताओ - ठंड भूखे-अधपेटे लोगों को ही ज्यादा लगती है क्या? परसों ही सामने वाली दुकान में कुछ लोग बनियान भर पहनकर आए थे। हम तो जमे जा रहे थे, वे आइसक्रीम खाकर ठंड का मजा ले रहे थे। कल सामने वाले ऑफिस के बड़े साहब आए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कह रहे थे कि इन दिनों देश में बड़ी गरमा-गरम बहस चल रही है। सरकार मान ही नहीं रही है। विपक्ष टंटे पर उतर आया है। सदन हिला जा रहा है। चाचा इस गरमा-गरम बहस की आंच तापने का सुभीता गरीबों को नहीं हो सकता है क्या? गरीबों में से भी जो फुटपाथ पर सोते हैं, उनके लिए इसका ‘रिजरवेशन’ नहीं करवाया जा सकता क्या? बहस तो ससुरी कोनऊ काम न आएगी, कम से कम आंच से काम चला लेने दें। चाचा, बहस तो हम भी पूरी रात करते हैं, उसमें से कोई आग क्यों नहीं निकलती? खाली पेट से खोखली बातें ही पैदा होती हैं क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘और क्या बताएं चाचा.., हमारा भेजा तो इस शीतलहर में जमा जा रहा है। सो ऐसी ऊटपटांग बातें निकल रही हैं वहां से..खून तो पहले कभी-कभी परिवार की दुर्दशा देखकर खौलता भी था। इस सर्दी में तो वो भी जम चुका है। विधाता कैसा खेल खेल रहा है हमारे साथ। काश! बड़ों की गरमा-गरम बहस से निकलने वाली गरमी किसी तरीके से हम लोगों तक पहुंचा सके तो बर्फीली ठंड में हमारी जान तो न जाएगी। चाचा सोच के तो देखो, कैसा होगा आंच को तापते लल्लू-मुन्ना के चेहरे का चेहरा।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, भोलू तो अपनी रौ में न जाने क्या लिख गया है। बेबस लोगों की व्यथा लाचारी ही तो होती है। इन चाक कलेजा से निकलने वाले आंसुओं को कुदरत भी शायद ओस बनाकर दुनिया में बिखेर देती होगी कि देख लो, इस खूबसूरत दुनिया के पीछे कितने दुख-दर्द हैं। छोड़िए इन बड़ी बातों को, मुझे तो भोलू की अबूझ-सी कल्पना की एक ही बात पल्ले पड़ रही है। यदि आज कोई भी बहस एक पल के लिए भी खुले आसमान के तले पड़े असहायों की ठंडक दूर कर सके तो सच मानिए उससे सार्थक बहस किसी सदन में आज तक नहीं हुई होगी! गालीभरा जोश.., दुत्कारती आवाजें.., अंगारे होती जुबानें.. कुछ ऐसा कर गुजरें तो सच में मेरा विश्वास फिर लौट आएगा। मुझे वितृष्णा नहीं होगी, नमन करने का जी चाहेगा। चीखते-चिल्लाते, मुट्ठियां लहराते, बांहें चढ़ाते, एक-दूसरे की तरफ बढ़ते उन ‘महानुभावों’ के रास्तों में फूल बिछाने का मन होगा।&lt;br /&gt;आपको लगता है कभी सच होगा भोलू की कल्पना से निकलता मेरा विश्वास!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-895221089852771966?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/895221089852771966/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=895221089852771966' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/895221089852771966'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/895221089852771966'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2012/01/blog-post_06.html' title='गर्मागर्म बहस से निकलती आंच की आस में'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-2eOCHUV_OQ0/TwbHGVWHiJI/AAAAAAAAAJ8/sqhKVaK3Gcs/s72-c/sa.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-3683334324172646758</id><published>2012-01-06T15:32:00.001+05:30</published><updated>2012-01-06T15:32:22.309+05:30</updated><title type='text'>मेरा प्रिय सीरियल मेरी राह तक रहा है!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-pb06ficYFf4/TwbGb7LAGVI/AAAAAAAAAJ0/UlyUtPVB1lU/s1600/serial.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/-pb06ficYFf4/TwbGb7LAGVI/AAAAAAAAAJ0/UlyUtPVB1lU/s320/serial.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test; font-size: 16px; line-height: 19px;"&gt;&amp;nbsp;जेठाभाई आज ज्यादा रंग नहीं जमा पाए, ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ वाले अय्यर भाई ने कसकर डायलॉग ठोक दिए। खाने का मजा खराब हो गया। कल भी ऐसा ही होते-होते बचा था, वो तो भला हो उस बंदे का, जिसने अमिताभ के टपाटप सवालों के फटाफट जवाब दे डाले थे। हाय-हाय करते हुए मेरी आंखें फैल गई थीं, कौर हाथ ही में रह गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों अपन सीरियलों के भरोसे ही खाना गले के नीचे उतार रहे हैं! दो रोटियां लीं, ‘लापतागंज’ से लगाईं, गपागप खा लीं। ब्रेक आया तो गटागट पानी पी लिया। जब सीरियलों में ‘स्वाद’ नहीं आता, तभी मुझे खाने की क्वालिटी परेशान करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाने में नमक हो न हो, ‘एफआईआर’ की मिस चौटाला की नशीली आंखें काम चला देती हैं। फलां सब्जी या ढिकां दाल का प्रश्न तभी आता है जब ‘बड़े अच्छे लगते हैं..’ की साक्षी तंवर उदास दिखाई देती है। राम कपूर से उसका पंगा अपने को नहीं जमता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार मुझे लगता है कि उबाऊ सीरियल बनना बंद हो जाएं तो महंगाई से मुकाबला किया जा सकता है। यूं भी जब बाकी तरीके काम नहीं कर रहे हों तो आटे-दाल की कीमतों पर शायद इस तरीके से काबू रखा जा सके। यानी दिन में पतली दाल बनाई, पूरे परिवार ने सीरियल के साथ खा ली। रात को फिर इसी तरह एक सब्जी बनाई और खा ली। क्या परोसा गया, कितना परोसा गया, किसे फिकर होगी? अरे भाई, उधर सगे रिश्तेदारों से ज्यादा प्रिय हमारे पात्र मुश्किल में हैं, आपको खाने की पड़ी है! दिमाग तो झन्न से खुले दरवाजे और उसे देखकर पूरे परिवार की फैली आंखों में ही उलझा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमबख्त क्लाइमैक्स तक इस तरह का बनाते हैं कि घर के कुत्ते-बिल्लियां तक दूसरे दिन सीरियल शुरू होने से पहले जगह पर जमे मिलते हैं। अब बताइए, तरीका काम कर गया तो सुबह-शाम के आधे-आधे घंटे की इस झन्नाटेदार शॉक थैरेपी से ही नहीं हो जाएगा महंगाई पर काबू!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोच के तो देखिए? है न जोरदार तरीका! मन को काबू करो। नहीं हो रहा हो तो दूसरी तरफ मोड़ दो। यानी सीरियलों की दिशा में धकेल दो। शर्त इतनी कि बस सीरियल खत्म होने से पहले खाना निपट जाए। खाना खत्म हो तो सीरियलों की चर्चा छेड़ दो। क्या बना है? पर बात ही नहीं होगी। Rकेबीसीञ्ज में क्या सटासट जवाब दे रहा था वो देहाती, इसी पर धूनी रमा लो। हम पड़े हैं, वो गंवार लाखों जीत ले गया। दिमाग दूसरे के पैसे में उलझेगा तो Rफिर वही तुरई की भाजी?&lt;br /&gt;पर विचार ही नहीं रहेगा! Rआज गोभी के पराठों का मूड हैञ्ज, जैसी फिजूल की बातें भी परेशान नहीं करेंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीरियल के पात्रों से गुप्त रिश्तेदारियां कायम कर लो। मन उनके परमार्थ में लगाओ। ‘मानव’ क्यों दुखी है? ‘बिग बॉस’ के घर में क्या घपला चल रहा है? इसी खुरपेंच में लगे रहो, फिर किसकी मजाल है सब्जी की वैरायटी पर ध्यान दे। यूं भी भैया, महंगाई तो दिनोंदिन बढ़ेगी, खर्चा भी बढ़ेगा ही, सो क्या उपाय है? होता तो लोग कर न गुजरते। तो फिर मेरा तरीका क्यों नहीं आजमाते!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे मैं पेट्रोल की बढ़ती कीमतों से निपटने के ऐसे ही किसी तरीके पर विचार कर रहा हूं। लेकिन कमबख्त भेजा सीरियलों में ही अटका है। हां, यदि आपका दिमाग इस सब में नहीं उलझा है तो आप ही विचार कर डालें। क्योंकि करना तो सब अपन को ही है। किसी और से महंगाई कम करने की आशा न लगाएं।अच्छा, अब इजाजत दीजिए। ब्रेक खत्म हो रहा है। खाना ठंडा हो रहा है। मेरा प्रिय सीरियल मेरी राह तक रहा है!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-3683334324172646758?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/3683334324172646758/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=3683334324172646758' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/3683334324172646758'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/3683334324172646758'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='मेरा प्रिय सीरियल मेरी राह तक रहा है!'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-pb06ficYFf4/TwbGb7LAGVI/AAAAAAAAAJ0/UlyUtPVB1lU/s72-c/serial.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-1417443951645872983</id><published>2011-11-10T14:03:00.000+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.592+05:30</updated><title type='text'>स्विस बैंक के जबर तोते की दास्तान</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-n8cN1aizVIE/TruMPZZixdI/AAAAAAAAAJk/zrz5Mf1ZKhg/s1600/parrot.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="201" src="http://4.bp.blogspot.com/-n8cN1aizVIE/TruMPZZixdI/AAAAAAAAAJk/zrz5Mf1ZKhg/s320/parrot.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: rgba(255, 255, 255, 0.917969); color: #222222; font-family: arial, sans-serif; font-size: 13px;"&gt;स्विस बैंक हमारे लिए फंतासी है! मिस्ट्री है! चंद्रकांता संतति है! विक्रम वेताल है! अलीबाबा चालीस चोर है! खुल जा सिमसिम है! ना जानें क्या-क्या है?&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #222222; font-family: arial, sans-serif; font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: rgba(255, 255, 255, 0.917969); color: #222222; font-family: arial, sans-serif;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="font-size: 13px;"&gt;दशकों से यह शब्द हर भारतीय को झकझोर रहा है। हमारी कल्पनाओं में इसकी भव्य इमारत विचरती रहती है। किसी अंधेरे तहखाने में करीने से लगी सोने की सिल्लियां दिखाई देती हैं। छोटी-छोटी अभेद्य गुफाओं में काले-पीले, कागजात-जेवरात-रुपए दिखाई देते हैं। इसके इतने आकर्षण का ही फल है, हमारे ढेर सारे 'महानुभावÓ इस स्थल पर अपने प्राण-धनरूपी तोता सुरक्षित रख छोड़ते हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 13px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 13px;"&gt;प्राचीन मायावी कथाओं की तरह फिर ढेर सारे महानायकों को भ्रष्टाचार के महादानव को मारने के लिए इस तोते की खोज में निकलना पड़ता है। कई अभियान होते हैं। कई साहसी रास्ते में खेत रहते हैं। कई वीर मंजिल तक पहुंचते हैं। मंजिल पर पहुंचकर भी फतह आसान नहीं होती। ये कोई ऐसा-वैसा रट्टू तोता नहीं कि सीधे-सीधे प्राण छोड़ दे, विदेशी नस्ल का अत्यंत मेधावी तोता है। हर बात में टें.. .टें.. .करता है। जमकर खबर लेता है। सैकड़ों प्रश्न पूछता है। हर सवाल के बदले सबूत मांगता है। कई वीरों की आधी-अधूरी तैयारियों की पोल इस प्रतिभाशाली तोते के सामने खुल चुकी है। कई प्रचंड योद्धा रास्ते की मुश्किलों को पार करके भी इस तोते से हार मानकर वापस लौट चुके हैं। बदले जमाने में तोते से प्राणरूपी धन हरना आसान नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 13px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 13px;"&gt;भारतवर्ष में वीरों की कमी नहीं है। हर बरस सरकार विचलित होती है। राजाज्ञा से मोटे-मोटे अभियान इस दिशा में होते हैं। महानुभावों के प्राण तोते में रखे हैं। तोता नियम-कायदों के पहरे में दशकों से निश्चिंत है। इसके निश्चिंत रहते कई परिवार आशान्वित हैं। कई पीढिय़ां प्रसन्नता में गुजर चुकी हैं। आगे भी कई आने वाली पीढिय़ों की एडवांस प्रसन्नता का राज यही निश्चिंतता है। महत्वपूर्ण बात है कि हर दो-चार बरस में नहीं तो पांच बरस में तो निश्चित ही एक अभियान इस दिशा में किया ही जाता है। ढेरों नए हथियार देकर पदाधिकारियों को राष्ट्र सम्मान की खातिर भेजा जाता है। हथियार दिखाने के लिए होते हैं, चलाने की धृष्टता में खुद अधिकारियों के लिए खतरा हो सकता है। कई युद्धों में मात्र अभियान किया जाना ही विजय है, ऐसा मानकर पराजित होकर लौटे योद्धाओं को भी पर्याप्त सम्मान के साथ महत्वपूर्ण जगहों पर प्रतिष्ठित किया जाता है। जनता को पूरे अभियान के बारे में जोशो-खरोश से बताया जाता है। बारीक विवरण दिए जाते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 13px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 13px;"&gt;&amp;nbsp;तोता&amp;nbsp;मुस्क राता रहता है। बड़े लोग भी प्रयासों को विजय मानकर मुस्कराते रहते हैं। बड़े लोग मुस्कराते हैं तो उनसे कुछ छोटों का भी मुस्क राने का कर्तव्य निकल आता है। सब मुस्कराते हैं तो अपने बदकिस्मती पर जनता रोती है, बड़े लोगों को भ्रष्टाचारी दानव के अत्याचारों के बारे में फिर से बताती है। जनता की बेहद डिमांड पर एक बार फिर अभियान करने की योजना बनती है। फिर वीरों को तिलक लगाकर 'कागजीÓ नावों में बैठाकर लक्ष्य की दिशा में रवाना किया भी जाता है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 13px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 13px;"&gt;ये वीर भी फाइलों के सारे मुग्दर देशी भूमि पर लहरा-लहराकर जनता को विश्वास दिलाते हैं कि इस बार नहीं बचेगा। जनता को अपने नायकों पर विश्वास होता है। तोते को भी अपने ऊपर विश्वास है। उसका मुस्कराना जारी रहता है। रोती फिर जनता ही है। पांच बरस ऐसे साहसी अभियानों के दौरान पूरे हो जाते हैं। इस तरह बड़े-बड़े कहानीकारों से माफी मांगते हुए यह कहना पड़ रहा है कि यह भारतीय कथा साहित्य का पहला असफल यात्रा वृतांत होगा, जिसमें भीषण कष्ट झेलकर मंजिल तक पहुंचे साहसियों से भी ज्यादा जबर यह तोता निकल आया।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-1417443951645872983?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/1417443951645872983/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=1417443951645872983' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/1417443951645872983'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/1417443951645872983'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='स्विस बैंक के जबर तोते की दास्तान'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-n8cN1aizVIE/TruMPZZixdI/AAAAAAAAAJk/zrz5Mf1ZKhg/s72-c/parrot.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-5963258841416268074</id><published>2011-09-13T14:54:00.002+05:30</published><updated>2011-09-13T14:55:52.762+05:30</updated><title type='text'>डस्टबिन से निकली एक दास्तान...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;‘‘भ्रष्टाचार करने और उस पर पलनेवाले दोनों का ही अन्जाम बुरा होता है।’’- अज्ञात &lt;/b&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-1OJLls-Kyp8/Tm8hP0geleI/AAAAAAAAAJU/C5xHVEsnbKo/s1600/kida.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="283" src="http://1.bp.blogspot.com/-1OJLls-Kyp8/Tm8hP0geleI/AAAAAAAAAJU/C5xHVEsnbKo/s320/kida.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;(वैसे मैं आज तक नहीं जान पाया हूं कि इस अज्ञात नाम से ये कोट लिखता कौन है, अज्ञेय टाइप कोई है या सच में ही इस तरह के कोट के लेखक अज्ञात होते हंै, फिर यदि ये सच में ही अज्ञात होते हंै तो इनकी बातें सुनकर कौन सा महापुरुष प्रकाशन के लिए पहुंचाता हैं। या सच में ही ज्ञान की बात करने वाले को जान का खतरा बना रहता है। जिस कारण वो अज्ञातवास में ही रहना चाहते हंै। या सच सचमुच में ही अज्ञात रहना चाहता है। सबकुछ बड़ा अज्ञात सा ही है।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर मूल बात पर आएं...&lt;br /&gt;&lt;b&gt;एक कीड़ा था!&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;कीड़े जैसा ही। एकदम बजबजाती नाली में रहता था। खूब मेहनत करता था लेकिन गुजारे लायक फिर भी नहीं होता था। दुखी था अपने जीवन से। नाली का कीड़ा हाय, बेकार जवानी..., गंदा जीवन, गंदी कहानी टाइप दुखी। सुख-सुविधाएं भोगना चाहता था। इस चक्कर में एक बार पहुंच गया एक भ्रष्टाचारी के डस्टबिन में। वैसे लालच में कौन नहीं पड़ता आजकल। आदमी हो या कीड़ा। फिर ये बिचारा तो अभी तक आर्डिनरी नालियों में पला था। बुजुर्गों की सीख पर चलता था। कम पर ही संतोष करने को मजबूर था। कुल मिलाकर अभावग्रस्त सा था। सो, बस सुख-सुविधाओं के चक्कर में पड़ गया। पैर फिसल गया!&lt;br /&gt;तो जब एक मेहनतकश कीड़ा भ्रष्टाचार के तर माल पर पलने की सोचता है तो क्या होता है? उसकी दास्तान है ये, डस्टबिन से निकली हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो कीड़े की यहां तक की कहानी तो बड़ी साधारण है, कुछ नहीं धरा है उसमें...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;एक दिन उसके सीधे-सादे जीवन में आ गया एक भूचाल!&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;यूं भी भूचालों को झेल पाना अच्छे-अच्छों के बस की बात नहीं है। कीड़ों के जीवन में आए भूचाल की तो बात ही कुछ और होती है।&lt;br /&gt;नालियां हिल जाती हैं! पानी उबलने लगता है!&lt;br /&gt;किनारे तोडक़र सडक़ों पर बहने लगता है पानी! बह जाते हैं सारे सिद्धांत!&lt;br /&gt;सतह पर आ जाती है सारी गंदगी। बाढ़ सा हो जाता है सारा दृश्य। बाढ़ आती है तो विस्थापन भी तो साथ लाती है। यूं तो विस्थापन से आदमी ही कहां उबर पाया है आजतक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे कई बार बाढ़ लोभ-लालच की भी तो होती है। विस्थापन सिद्धांतों से भी तो होता है। आदर्शों के ध्वंस, सिद्धांतहीनता की कीचड़... जीवन में भ्रष्टाचार की विभीषिका सा दृश्य तब भी रचती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो कीड़े के जीवन में आया था एक भूचाल। भारी बारिश हुई तो बाढ़ जैसी गंदगी के साथ हो गया विस्थापित। सुध-बुध न रही। बहकर पहुंच गया एक वीवीआईपी एरिये में। बेहोशी टूटी तो उसे अद्भुत लगा सब। बड़े-बड़े घर। बड़ी-गाडिय़ां। चौड़़े-चौड़े नाले। नालियां तक अपने स्तर पर स्वच्छ। कीड़े को तो स्वर्ग सा लगा सब। सपने हो गए साकार। बौराया सा घूमने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(&lt;b&gt;नोट:&lt;/b&gt; जिस वातावरण में पैर फिसलता है उसकी तासीर इसी तरह की होती है। कीड़े को हटाकर किसी को भी रख लें पैर फिसलना कॉमन रहेगा।) घूमते-टहलते एक बड़े साहब के बंगले में घुस गया। जितना बड़ा बंगला-उतना ही बड़ा डस्टबिन। बांछें खिल गईं कीड़े की। वेज-नॉनवेज जूठन से भरा पड़ा था मिठाई के भरे-खाली डिब्बे पड़े थे। सबकुछ इफरात में था। कीड़ा भैरा गया। यहां इतना खाना, वहां नाली में पड़े-पड़े कैसे दिन गुजर रहे थे। कैसा गंदा खा रहे थे। खुद पर ही घिन आने लगी कीड़े को। हाय-हाय, विधि का कैसा खेल।&lt;br /&gt;खैर, भगवान तेरा लाख-लाख धन्यवाद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किस्मत पलट गई। दिन बहुर गए। एक पल में।&lt;br /&gt;कहां लोअल क्लास मोहल्ले की थर्ड क्लास नाली में पड़े थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वर्ग जैसा लगने लगा सब। वास्तव में कीड़े-मकोड़े से लगने लगे दूसरे कीड़े। मारे खुशी के कीड़ा बुजुर्गों की सीख भूल गया। संतोषी परमसुखी। मेहनत की रोटी ही बरकत देती है। ज्याद मिठास खतरनाक होती है, चाहे जबान में हो या जीवन में। एक मिनट में कीड़ेपंती पर उतर आया। झपाझप सब खाने लगा। खाके वहीं मिठाई के डिब्बे में औंधा हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े साहब का घर था। रोज कोई न कोई चला आता था कुछ लेके। डिब्बे-खोके। डस्टबिन में लेटे-लेटे कीड़ा रोज ही देखता था ये दृश्य। पड़े-पड़े मिलने लगा तो चौकड़ी भूल गया। साहब के घर से गरूर से जूठी मिठाई फिंकती थी सो खाकर कीड़े को भी पोजिशन का घमंड आने लगा। कीड़ा अब छोटा-मोटा कीड़ा नहीं रहा। बड़े साहब, पोजिशन वाले साहब के डस्टबिन का विशिष्ट कीड़ा हो गया। साहब जैसा ही ठसकेदार। उनका अन्न खाता था उनके जैसी ही आदतें भी आने लगीं। बुजुर्गों को भी आंखें दिखाने लगा। रिश्तेदार आते तो उन्हें दूर से ही भगा देता। भ्रष्टाचार से मिलने वाले अन्न में गलतफहमी के विटामिन भी शामिल होते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब एक दिन तो भ्रष्टाचार का घड़ा भरता ही है। भर गया। साहब के घर पड़ गया छापा। मच गई अफरा-तफरी। काला धन दबाना हो गया मुश्किल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर कीड़ा भी देख रहा था कई लोगों को अंदर आते। बड़ा खुश था आज भी आएंगे तर माल के डिब्बे। दावत छनेगी आज भी। टांग पर टांग धरे इंतजार में बैठ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी भटाक-भटाक से सिर पर गिरी दो गड्डियां। जैसे-तैसे आंखें खोलकर देख पाया। छापे में काला धन छुपाने के लिए साहब की पत्नी नोटों की गड्डियां फेंके जा रही थीं डस्टबिन में। चार गड्डियां ही भारी पड़ गईं। अधमरा सा हो गया कीड़ा। कीड़ों वाली चौकड़ी मारना तो पहले ही भूल गया था। बच भी नहीं पाया। एक टांग जाती रही। आंखों के पास भी लगी चोट तो भ्रम के पर्दे भी खुल गए। साफ-साफ दिखने लगा।&lt;br /&gt;भ्रष्टाचार का नतीजा। साहब तो नपे ही, साख भी गई और लगे हाथों डस्टबिन भी जप्त हो गई। खुद भी हो गया अधमरा। आसारा छिना, विस्थापित हुआ तो याद आ गई नाली। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;दिमाग पर पड़ी चोट तो एक मिनट में हो गया दिव्य ज्ञान।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;गुरू खतरा है भ्रष्टाचार के डस्टबिन में खतरा है। भ्रष्टाचार का पैसा किसी को नहीं फलता। लेने वाले और उस पर पलने वाले दोनों की खटिया खड़ी कर देता है। कभी न कभी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधमरा सा कीड़ा वापस नाली की तरफ निकल लिया। लंगड़ाकर भले ही चल रहा था लेकिन दिमाग सरपट दौडऩे लगा था। फोकट में सुख-सुविधाएं पाने का हश्र देख लिया। अपनी नाली में ही मजा है। भ्रष्टाचार की बरकत से नाली की सूखी रोटी ही भली है। जान है तो जहान है। आज नहीं तो कल सबको हो जाएगा इसका परम ज्ञान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;भ्रष्टाचार के डस्टबिन में तो कीड़े भी नहीं पनप सकते।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-5963258841416268074?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/5963258841416268074/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=5963258841416268074' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/5963258841416268074'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/5963258841416268074'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/09/blog-post_13.html' title='डस्टबिन से निकली एक दास्तान...'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-1OJLls-Kyp8/Tm8hP0geleI/AAAAAAAAAJU/C5xHVEsnbKo/s72-c/kida.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-3262966671211978649</id><published>2011-08-16T18:13:00.001+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.593+05:30</updated><title type='text'>बेशर्मो! हारा कौन? हमने तो किया है त्याग..</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;टीम इंडिया की शर्मनाक हार! साख गई!! गंवाई बादशाहत!!!&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-P8wFBeZ3dKE/Tyo_T9qRW_I/AAAAAAAAAKY/kv1HfEFx4CI/s1600/cri.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/-P8wFBeZ3dKE/Tyo_T9qRW_I/AAAAAAAAAKY/kv1HfEFx4CI/s320/cri.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इंग्लैंड ने टेस्ट सीरिज जीत ली। टेस्ट किक्रेट का नया सरताज बन गया। टेस्ट रैंकिंग में एक नंबर पर जा पहुंचा। हमारी हार पर बल्ले-बल्ले करने वालो, जरा रुको। इंडियन ड्रेसिंग रूम के विश्वसनीय सूत्र से मिली इस जानकारी पर तो गौर कर लो। आप भले ही कितनी गोपनीयता की दुहाई दीजिए में रुक नहीं पाऊंगा। कसम वगैरहा भी दी होती तो उसे भी तोड़कर आपको जरूर बताऊंगा कि हम क्यों हारे? इस हार के पीछे क्या राज है? ये हार नहीं रणनीतिक पराजय है बंधुओ! ये हार नहीं महान त्याग है भाइयो! दंगों से झुलसते एक देश के जख्मों पर मरहम लगाने वाला। वरना विश्व चैंपियन। टेस्ट के टाइकून नंबर वन। नवें नंबर तक बल्लेबाजों से भरे। एक पिद्दू सी टीम से हारते क्या? खुद ही सोचिए जरा? ये षडच्यंत्र है हमारी साख खराब करने का। हमने सोचा, दो साल से टेस्ट में नंबर वन हैं। विश्वकप विजेता हैं। सबको हराते घूम रहे हैं। हमारे आईपीएल के अलग चरचराटे मचे हैं। बाकी टीमों के लिए अब बचा ही क्या? कहीं खेलना और न बंद कर दें। फिर हम हराएंगे किन्हें? सो हम हार गए। त्याग और स्वार्थ दोनों ही एक साथ सध गए। इस नजरिए से तो सोचिए जरा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;महान त्याग! अटैचमेंट में व्यावहारिकता भी जुड़ी है।&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इकदम हमारी संस्कृति के अनुकूल। महान देश की उदार छवि को पुष्ट करता हुआ।&lt;br /&gt;और ठसियलपन देखिए उनका। हम जरा हार क्या गए बल्लियां उछलने लगे इंग्लैंडवाले। देशवासी कोसने लगे। अटैचमेंट तो छोड़िए त्याग वगैरहा भी कोई देख नहीं रहा है। ये कहां का इंसाफ है।&lt;br /&gt;हैं भई!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;खैर, वो कहानी तो सुनी होगी आपने?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;एक बड़े राजा का वजीर रोज शतरंज में उससे जीतता। बदले में राजा रोज उसे एक स्वर्ण मुद्रा देता। एक दिन वजीर के मित्र ने उससे कहा- तुम यूं ही राजा साब से जीतते रहे तो वे कहीं खेलना न बंद कर दें, मुद्राएं मिलना बंद हो जाएंगी। कभी उन्हें भी जीत जाने दो। वजीर एक दिन जानबूझकर हार गया। राजा ने कहा- आज मैं जीत गया। अब आगे से तुम्हारे साथ नहीं खेलूंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और भइया टीम की तो ऐसे ही वाट लगी है। ले-ले हो गई। रोज जीतते थे। अब जरा सा जिता दिया कि सब उछलने लगे। यहां तक की रोज जीतने वाला पिछला रिकॉर्ड नहीं देख रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस रट रहे हैं साख गई। बादशाहत गई। अबे गई तो गई। कल को कोई टीम खेलती ही नहीं तो किससे खेलते? अब नहीं खेलते तो विज्ञापन कंपनियां हॉकी या फुटबाल खिलाड़ियों को न दे देती विज्ञापन! मासूम विज्ञापन कंपनियां इतना साथ देती हैं हमारा, उनका ख्याल न रखें। और चलो मान भी लो कि हॉकी-फुटबाल खिलाड़ियों को ही रख भी लें विज्ञापनों में तो चैनलवाले भूखों न मर जाते? देश में कोई देखता है इन्हें? आप ही सोचो? देश की हॉकी टीम के 11 खिलाड़ियों के नाम पता है आपको? खैर उनका तो छोड़िए फुटबाल में भूटिया के अलावा किसी खिलाड़ी को जानते हैं आप? नहीं तो फिर खाली स्टेडियम-सूनी टीवी स्क्रीनें। जनता की ऐसी तकलीफें हमसे देखी जाएंगी भला!&lt;br /&gt;इस पर तो आप विचार ही नहीं करते हो? तो इस पृष्ठभूमि में तैयार रणनीतिक त्याग पर ध्यान ही नहीं देते हो आप! हमारा प्लान न होता तो..,&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-1EtbXAAxFWg/TkplnZQhqHI/AAAAAAAAAIk/KTHjRtQd594/s1600/sachin.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" src="http://2.bp.blogspot.com/-1EtbXAAxFWg/TkplnZQhqHI/AAAAAAAAAIk/KTHjRtQd594/s200/sachin.jpg" width="151" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;गोल्डन सीनियर कहर न ढा देते!&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;द्रविड ‘द वॉल’ यूं ही पसरती क्या? वेरी-वेरी स्पेशल लक्ष्मण को तो स्पेशल त्याग करना पड़ा हार सुनिश्चित करने के लिए। मास्टर ब्लास्टर पर तो भावनाओं को ऐसा ब्लास्ट हुआ कि गेंदबाजों पर ही प्रहार नहीं कर पाए। खैर इनके लिए कुछ भी कहना बेकार है। कहेंगे तो आप छोड़ोगे थोड़ी न हमे ही कोस डालोगे।&lt;br /&gt;खैर त्याग की बात करते हैं। हर खिलाड़ी को इस त्याग के चक्कर में अलग-अलग इतने प्रयास करने पड़े की सबकी हालत खराब हो गई..।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वीरू भला-भला लड़का!&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;त्याग की बात सुनते ही पैड पहनकर चला गया। कुल साढ़े पांच मिनट में ही वापस आकर मिसाल बन गया। दूसरी पारी में भी साढ़े तीन मिनट में वापस आकर अपनी ही मिसाल के रिकॉर्ड में करेक्शन कर डाला।&lt;br /&gt;गोल्डन डक का!&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-Oqyx1nqoZpk/TkplwTcllSI/AAAAAAAAAIo/jJxpFVJLXPs/s1600/sahbag.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" src="http://1.bp.blogspot.com/-Oqyx1nqoZpk/TkplwTcllSI/AAAAAAAAAIo/jJxpFVJLXPs/s200/sahbag.jpg" width="141" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;दोनों पारियों में कुल जमा दो गेंदें ही हिस्से में आईं। ऊपर से उसकी दिक्कत तो देखिए अपनी अंग्रेजी में कोच तक को भी बड़ी मुश्किल से अपने त्याग के बाबत् समझा पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;गंभीर सबकुछ त्यागने को तत्पर!&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;आगे गंभीर तो गौतम की तरह पिच का सारा ऐश्वर्य त्यागकर चला आया पवेलियन। यहां भी आकर मौन साध गया। त्याग के बारे मजाल है कि उसने तनिक भी चर्चा की हो। जरा सा भी मुंह खोला हो। बस, पवेलियन में बैठाकर दर्दीले गाने सुनता रहा।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-xOvHAk-92dw/TkpmVWXzr_I/AAAAAAAAAIw/a3-y_b-953g/s1600/ghambhir" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/-xOvHAk-92dw/TkpmVWXzr_I/AAAAAAAAAIw/a3-y_b-953g/s1600/ghambhir" /&gt;&lt;/a&gt;त्यागी देश। त्यागी टीम। त्यागी खिलाड़ी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर आगे गेंदबाजों की तो आप बात करो ही मत..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जहीर मैदान का मरीज!&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;अपनी सारी बीमारियों की जानकारी मैदान पर ही देता है। टीम में सिलेक्शन से पहले डॉक्टर लाख पूछे-पुचकारें। देश के लिए खड़ा हो ही जाता है। बस एक दो मैच के बाद ही बताता है।&lt;br /&gt;उस्ताद हड्डी में गिल्ली सी गढ़ रही है! हाथ खिंच रहा है!&lt;br /&gt;सीने में जकड़न सी लग रही है! घुटना जाम सा हो रहा है!&lt;br /&gt;इतने के बाद ही मूल बात पर आता है कि भाई साब गेंदें न फेंक पाऊंगा। दूसरे को ट्राई कर लो। आईपीएल वगैरहा तो बेचारा कहता तक नहीं है फेंकता रहता है अपने कोटे के ओवर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;और भोला-भाला भज्जी!&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;वो तो ‘दूसरा’‘तीसरा’‘चौथा’ ‘छठा’ करके सारे हथियार चलाता है। ओवर खत्म करता है। फिर नौ-दो-ग्यारह होकर गीता पर अपनी फिरकी का जादू चलाने चला जाता है। बड़ा मेहनती लड़का है। मैदान पर बार-बार कप्तान कहता है ‘पहला’ चला, स्पिन करा। पट्ठा! ‘दूसरे’ ही खेल में उलझा है।&lt;br /&gt;तो इस खेल के चक्कर में तो बिना जाने ही टीम की मदद कर गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अब सीधा-साधा श्रीसंत!&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-xhRH-XNLSbw/Tkpl3yU956I/AAAAAAAAAIs/cPQaFmB1GBE/s1600/dhoni.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/-xhRH-XNLSbw/Tkpl3yU956I/AAAAAAAAAIs/cPQaFmB1GBE/s320/dhoni.jpg" width="239" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;इतना सीधा-सादा है कि सब उसका फायदा उठाते हैं। कप्तान कहता है कि गेंदे फेंको तो बेचारा दिनभर फेंकता ही रहता है। कोई उससे विकेट लेने के लिए नहीं कहता। बेचारा ले कैसे? बिना कहे वो लेता नहीं? आज्ञाकारी है। इसलिए हर बार टीम में होता है। विकेट ले न ले बात तो कम से कम सुनता है इतना ही बहुत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;फिर धोनी..द कैप्टन कूल!&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;कप्तानी के बोझ का मारा।&lt;br /&gt;टेस्ट जितवाए। वनडे जितवाए। वर्ल्डकप जितवाया। आईपीएल जितवाया। अब बच्चे की जान लोगे क्या? इतना सब तो कर दिया अब ससुरी प्रेरणा बची ही कहां हैं? अब त्याग-व्याग में थोड़ी-बहुत प्रेरणा दिखाई दे रही। उसे भी न लें!&lt;br /&gt;जीतते रहें। मशीन बन जाएं। संस्कृति भूल जाएं अपनी। धर्म बिसार दें। क्या लेके आए थे? क्या ले जाएंगे? जीत-हार की सांसारिक बातों में ही चिपके रहें? दुखिओं के काम न आएं? जख्मों पर मरहम न लगाएं?&lt;br /&gt;जितना(पैसा) पाना था, पा लिया। जितना(विज्ञापन) करना था, कर लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अब क्या बचा है?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;सो अब गले तक भरे हम त्याग करेंगे। जख्मों पर मरहम लगाएंगे। आप तो बस हमारे त्याग को ध्यान से देखिए। जो नहीं देख पा रहे हैं उनकी नजर घुमाइए। सबको बताइए। हमारे त्याग की जानकारी हर (कंपनी) तरफ पहुंचाइए। और रणनीति तो समझते हैं न आप! तो..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृपया! इसे हार मत कहिए, त्याग कहिए। त्याग समझिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;और हम साले कृतध्न, कह नहीं पा रहे हैं। काश कि हम कह पाते!&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;इतनी शर्मनाक हार के बाद काश कि ऊपर लिखा सच में ही सही हो जाता!&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-3262966671211978649?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/3262966671211978649/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=3262966671211978649' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/3262966671211978649'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/3262966671211978649'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/08/blog-post_16.html' title='बेशर्मो! हारा कौन? हमने तो किया है त्याग..'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-P8wFBeZ3dKE/Tyo_T9qRW_I/AAAAAAAAAKY/kv1HfEFx4CI/s72-c/cri.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-2319672352220212617</id><published>2011-08-14T17:46:00.000+05:30</published><updated>2011-08-14T17:46:23.846+05:30</updated><title type='text'>गांधी के दिखाए पथ पर ...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-LNO7LsguyZQ/Tke8FvPdhmI/AAAAAAAAAIQ/o1KWHBJdimY/s1600/le.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="193" src="http://1.bp.blogspot.com/-LNO7LsguyZQ/Tke8FvPdhmI/AAAAAAAAAIQ/o1KWHBJdimY/s200/le.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;एक नेता थे!&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;बचपन से ही लाभ-हानि, जरा-मरण, यश-अपयश आदि की मुकम्मल दिव्य दृष्टि संपन्न।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;एक समस्या थी?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेजी में उनका हाथ तंग था। बड़ा परेशान रहते थे बेचारे। बचपन में उनकी परीक्षाओं में एक परचा आता था। अंग्रेजी का। उनकी रूह कांपती थी इससे। पास होने के लाले थे। एक बार उन्हें एक पुराने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने गांधी जी के कामों के बारे में बताया। अंग्रेजों के कैसे छक्के छुड़ाए उसकी जानकारी दी। कैसे व्यवस्था बदल असंभव को संभव कर दिखाया। आंखें फैल गई नेताजी की। विचार में पड़ गए। ससुरे अंग्रेज और अंग्रेजी क्या अंतर। सो नेताजी ने अंग्रेजी के खिलाफ गांधीजी पर भरोसा करने की ठानी ली। किसी से गांधीजी पर निबंध लिखवाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;‘महात्मा गांधी वॉज द ग्रेटमैन आफ इंडिया, ही वॉज द ग्रेटेस्ट लीडर आफ द वर्ल्ड, ही वॉज बॉर्न ऑन 1869 एट पोरबंदर स्टेट ऑफ गुजरात, ही वेंट टू इंज्लैंड फॉर बिकेम ए लॉ..’&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;घर में मैदान में चिल्ला-चिल्ला कर रटने लगे। परचे में बस अंग्रेजी निबंध का सवाल हल करने लगे। न्यूनतम अंक आने लगे। गांधीजी के जीवन और कर्म के बारे में लिख-लिखकर अंग्रेजी को रगेद दिया। छक्के छुड़ा दिए। मास्टर के बाप में दम नहीं होता था अंग्रेजी में फेल कर सकें। बरसों तक निबंध एक ही कलेवर में, एक ही तेवर में, &amp;nbsp;एक ही स्टाइल में लिखते रहे। अनुभवी मास्साब निबंध देखते ही कॉपी पर पास होने लायक नंबर चढ़ा देते। ऐसा जलजला आया कि अंग्रेजी तक इस निबंध के आगे हाथ जोड़कर खड़ी हो गई!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मास्साबों ने भी हाथ जोड़ लिए!!&lt;br /&gt;पूरी शिक्षा व्यवस्था ही दंडवत हो गई!!!&lt;br /&gt;भैइया कछु ग्रामर और सीख लेते?&lt;br /&gt;थोड़ा अनसीन पैसेज भी दिमाग में भर लेते?&lt;br /&gt;कुछ वॉकेवुलरी भी जान लो।&lt;br /&gt;थोड़ी अंग्रेजी जान लोगे तो मर न जाओगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेताजी ने सब अनुरोधों को लात मार दी। सब अनुनय ठुकरा दिए। अंग्रेजी के खिलाफ हिन्दी पट्टी की लड़ाई पर उसी ग्राउंड में भाषण देने की भी प्रैक्टिस करने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;भाइयो..,&amp;nbsp;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;जब तक स्कूलों में टाटपट्टी रहेगी, अंग्रेजी के खिलाफ हिन्दी पट्टी की लड़ाई जारी रहेगी। किसी माई के लाल में दम नहीं है कि हमें परास्त कर सके। अंग्रेजों का नास हो! अंग्रेजी रसातल में जाए! गांधी बब्बा की जय! कोर्स में अंग्रेजी का निबंध रखने वाला अमर रहे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे देश में हर भाषण देने वाले के पीछे लोग जुटने लगते हैं, तमाशबीन टाइप सो यहां भी जुटने लगे। समर्थकों की संख्या भी बढ़ाने लगी। निबंध के चक्कर में गांधीजी के बारे में मालूमात हो गई। सिद्घांतों के बारे में पता चल गया। रटाई आगे बड़ी मददगार साबित होने लगी। पढ़ा हुआ कभी बेकार नहीं जाता। बस उपयोग में लाने का हुनर आना चाहिए। रटाई उपयोग में आ गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-VUBf81KyDf4/Tke8PLeCzFI/AAAAAAAAAIU/E6BADgEeCLM/s1600/gn+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/-VUBf81KyDf4/Tke8PLeCzFI/AAAAAAAAAIU/E6BADgEeCLM/s320/gn+2.jpg" width="288" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;बड़े हुए तो राजनीति को करियर बनाया!&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;बचपन से ही नेता थे। बनाना ही था। दिव्य दृष्टि थी। दिव्य मेमोरी थी। टंगड़ी भी दिव्य ही थी। गांधी जी के दिखाए रास्ते पर चलने लगे। चलना ही था। सब रट रखा था। आगे जब ब्लॉक से लेकर जिलास्तरीय, राज्यस्तरीय तक उनका कद बढ़ा तो गांधी काम आने लगे। गांधीवाद के सिद्घांतों ने बड़ी मदद की। गांधी जी महान थे। उनकी कथनी-करनी एक थी। राजनीति में पद-पैसा पाने के सख्त खिलाफ थे। देश की सेवा में जेल गए। कष्ट उठाए। यातनाएं सहन कीं। सेवा समझते थे सियासत को..। उन्होंने राजनीति के महान सिद्घांत दिए . . टाइप की बातें करने लगे। सब रटा था। रटाई काम आने लगी। राजनीति में शुचिता-नैतिकता टाइप की बातें करने वालों की कतार में दिखाई देने लगे। इन बातों से सियासत में सब डरते हैं। जैसे नंगे से खुदा डरता है, उसी टाइप। लोग बचते गए। हटते गए। जगह देते गए। नेताजी मदमस्त सांड की तरह सिद्घांतों के सींग सबको मारने लगे। काम चलता रहा। कद बढ़ता रहा। देशव्यापी हो गया। सरकार का हिस्सा हो गए। देश चलाने लगे।&lt;br /&gt;अब एक दिक्कत आ गई! सिद्घांतों से जुड़ी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;विपक्ष और सड़क पर गांधीजी सरल हैं। जिम्मेदारी आते ही निभाने में कठिन।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;सो दिक्कत पेश आने लगी। सिद्घांत मुश्किल दिखाई देने लगे। सरकार का हिस्सा बनकर भी भविष्य सुरक्षित नहीं किया तो गांधी टाइप लंगोट ही रह जाएगी। लेकिन अब जिन सिद्घांत को अपनाकर यहां पहुंचे हैं उन्हें छोड़ने की बेवकूफी भी तो नहीं की जा सकती है। तो क्या करें? प्रश्न विकट था। चिंता गहन थी। दिमाग घूम गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-4atO9HZGdTQ/Tke8WqvQooI/AAAAAAAAAIY/nR5KYLrleHE/s1600/gn+3.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="163" src="http://2.bp.blogspot.com/-4atO9HZGdTQ/Tke8WqvQooI/AAAAAAAAAIY/nR5KYLrleHE/s200/gn+3.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;फिर काम आ गई दिव्य दृष्टि!&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही टेढ़े बखत के लिए दृष्टि में दिव्यता भरी थी। सुकून आ गया। पढ़ाई बेकार नहीं जाती कभी! बस उपयोग का हुनर आना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिद्घांतों को मॉडर्न टच तो दिया ही जा सकता है। समयानुकूल तो किया ही जा सकता है। व्यावहारिक बनाने के लिए कौन सा डॉक्टर मना कर रहा है। सिद्घांतों पर ही चलेंगे। कलेवर नया रखेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब गांधीवादी सिद्घांतों की व्यावहारिकता कुछ यूं हो गई ..गांधीजी ने क्या किया था। हम क्या करेंगे कि व्यवस्था निर्धारित कर ली। कुछ इस तरह..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मार्च करना जरूरी है, दांडी की तरह.. तो जरूर करेंगे। चाहे स्विट्जरलैंड के किसी होटल से किसी बैंक तक ही न किया जाना हो। ससुरा जरूर करेंगे। मार्च का सम्मान होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असहयोग करना जरूरी है, जरूर करेंगे। हर सही काम के प्रति यही रुख रखेंगे साला! सही काम, सही व्यवस्था, सही परिणाम दिलाते हैं भला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्विट इंडिया आंदोलन चलाना जरूरी है। जरूर चलाएंगे। हर सही अफसर को इस व्यवस्था से क्विट करने पर मजबूर कर डालेंगे। वैसे भी इस टाइप के लोगों का यहां क्या काम? इनकी जगह तो घर में है। वहीं रहें।&lt;br /&gt;हम तो भाई पूरे मनोयोग से उनके मूल्यों को आत्मसात करेंगे। हर मामले का सही मूल्य आंकने में कोई कोताही न करेंगे। उन्होंने ट्रस्टीशिप सिद्धांत दिए हम भी अपना ट्रस्ट बनाएंगे। ट्रस्ट बनाकर बंधु-बांधवों का भी भला करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधीजी ने खिलाफत की थी। हम भी जरूर करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-3suOoAxm7F0/Tke8dBqIkjI/AAAAAAAAAIc/VtijEdwJDno/s1600/gn+4.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="133" src="http://3.bp.blogspot.com/-3suOoAxm7F0/Tke8dBqIkjI/AAAAAAAAAIc/VtijEdwJDno/s200/gn+4.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;विपक्ष की हर बात की खिलाफत करेंगे। सही हो या गलत। खिलाफत होगी। हो के रहेगी। कोई न रोक पाएगा हमें। सरकार सुनने के लिए बनी है क्या? ज्ञान नहीं चाहिए। विपक्ष की काहै सुनें। जब ससुरे सत्ता में आएं तो कर लें मन की। जब तक हम अपने मन की करेंगे। सो, कर रहे हैं। घर भर रहे हैं। गांधी पर भरोसा है। उनके सिद्घांत रास्ता दिखाते हैं। अंधेरे में टॉर्च टाइप काम कर जाते हैं। उनके दिखाए रास्ते पर चलना है। चल रहे हैं। चलते रहेंगे। कैसी परेशानियां आएं कदम न डिगने देंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सो अब बड़े नेता हैं!&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;बचपन से ही थे दिव्य दृष्टि संपन्न। और खास ये कि अभी भी गांधी के दिखाए रास्ते पर चलने को हैं तत्पर..।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-2319672352220212617?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/2319672352220212617/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=2319672352220212617' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/2319672352220212617'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/2319672352220212617'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/08/blog-post_14.html' title='गांधी के दिखाए पथ पर ...'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-LNO7LsguyZQ/Tke8FvPdhmI/AAAAAAAAAIQ/o1KWHBJdimY/s72-c/le.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-1095122711053302086</id><published>2011-08-04T17:20:00.004+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.594+05:30</updated><title type='text'>दो सांप, एक आस्तीन का इंसान..</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-ietmihTMCM0/TjqHX28mIMI/AAAAAAAAAIM/N2_Jo5VD9h0/s1600/snake.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="137" src="http://1.bp.blogspot.com/-ietmihTMCM0/TjqHX28mIMI/AAAAAAAAAIM/N2_Jo5VD9h0/s320/snake.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;नागपंचमी पर दो बूढ़े सांप मिले। थे कवि। आपस में भिड़े। एक ने कहा कौन है आजकल ज्यादा खतरनाक इंसान या सांप। या इंसानी सांप। इस पर हमने कविता रची है साली कालजयी टाइप की बन पड़ी है। सुनो..तुम सुनो। बहस चल रही थी। इतने में पास में लेटे एक अजगर ने आकर दो लातें जमाईं। साले-सोने भी नहीं देते। पावभर तो बचे हैं। सांप और इंसान की बहस में लगे हैं। जब जहर था तब क्या कर लिया अब बूढ़े हो, ऊपर से कवि किसी ने सुन लिया तो फोकट में मारे जाओगे। दोनों सांप अजगर के सामने ही फिर गुत्थम-गुत्था होने लगे। तब अजगर ने एक को पूंछ में लपेटा दूसरे को मुंह में भरा। कर्रा झटका। एक-एक तरफ पटका। फिर बोला- हरामखोरो! बड़े साहित्यिक बनते हो। रचना सुनने पर लड़ते हो। साहित्यिक कायदों का तो ख्याल करो। बंद कमरों में लड़ो। पीछे से बुराई करो। जड़ें काटो। सार्वजनिक रूप से तो गले लगो। इंसानों में ही कौन से कम थे जो अब तुम लोग भी रचनाएं फुंफकारने लगे। खैर, अजगर तो सब निगल लेते हैं, उलट-पलट के सब पचा लेते हैं। हमें सुनाओ अपनी-अपनी रचना। हम बता देंगे किसकी कविता में है दम, कौन है बड़ा बम। तब पहले सांप ने गला खंखारा..थोड़ा खराशा..चश्मा ठीक किया औऱ शुरू हो गया। &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;लीजिए बंधु सुनिए, शीर्षक है..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;अजगर ने फिर कहा- श्रीमान् बंधु वगैरहा न कहें। हम अजगर हैं ऊपर से फिलहाल श्रोता भी हैं। कम हैं। हर कायदे से आजकल सुनने वालों का सम्मान ज्यादा है। इसलिए प्रोटोकॉल का ध्यान रखें।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;अब पहला सांप बोल ठीक है। सर सुनिए, रचना पेश है..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;आस्तीन का इंसान..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;प्रिय सांप..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;सांप हो तो सांप बनो..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;विष उगलो या केंचुली छोड़ दो..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;डसो या ग्रास बनो..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;इसी में तुम्हारे सांपत्व का सम्मान है..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;आस्तीन का सांप बनना तो पूरी प्रजाति का अपमान है..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;प्रिय सांप..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;बूढ़े हो गए हो तुम..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;फुंफकारना नहीं भूल रहे..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;सौ-डेढ़ ग्राम जहर लेकर&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;धमकाना नहीं भूल रहे..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;छठी का दूध याद आ जाएगा..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;जब इंसान तुम्हें अपना विष दिखाएगा..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;प्रिय सांप..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;जमीन पर लोटना..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;कुंडली मारना..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;आंखों में भर लेना बदले की बात..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;अभिनेता तो हो नहीं..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;नेतागिरी में मारे जाओगे..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;इंसानों की नकल..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;गुरू, खतरनाक है तुम्हारा शगल..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;प्रिय सांप..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;देवताओं के काम आते हो..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;विष्णु का छत्र बन जाते हो..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;दर्द में दवा सा विष तुम्हारा..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;परोपकारी बन जाते हो..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;उधर, आस्तीन का इंसान..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;आस्तीन के सांप से है खतरनाक..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;इंसानों को तो है सब पता..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;सांप तो भ्रम में है बेचारा..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;प्रिय सांप..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;दूर रहो इंसान से तो ही अच्छा..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;लपलपाना, फुंफकारना, आड़े-तिरछे डोलना..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;सारी सरपट चाल भुला देगा..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;तुमसे.तुम्हारा मिस्टर विषधर वाला..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;सरनेम तक, कल्टियों में छुड़ा लेगा..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;अजगर की आंखें भर आईं। उसने उठकर सांप की पीठ थपथपाई। गालों पर दो चुम्मियां लीं। पेड़ के खोखले में पूंछ डालकर एक चूजा निकाला औऱ सांप के न्योछावर करके खा लिया। फिर भरे गले से बोला। उस्ताद क्या बात कही है।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;तुमसे.तुम्हारा मिस्टर विषधर वाला..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;सरनेम तक, कल्टियों में छुड़ा लेगा..वाह, वा..वाह, वा..।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;कुछ कहने सुनने को नहीं रह गया है। कविता खुद बोलती है। सब बयान कर देती है। कवि बूढ़ा जरूर है कविता में धार है, जाति की चिंता समाई है इसमें..। सांप प्रजाति का राष्ट्रीय कवि होने की योग्यता रखता है रे तू तो। जय हो। यशस्वी हो। इतन कहकर अजगर ने फिर पेड़ के खोखले में पूंछ डालकर एक चूजा निकाला औऱ सांप के न्योछावर करके खा लिया। एक डकार ली। फिर दूसरे सांप की तरह मुंह करके बोला। हां बे अब तू सुना..। देखें तेरी कविता में कितना दम है। दूसरा सांप थोड़ा लोटा-कुछ पोटा। कुछ पीछे हटा। फिर स्टार्ट लेकर शुरू हो गया। &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;सुनिए जनाब, मुलाहिजा फरमाइए मतला पेश है.., हुजूर को जमेगा। आप खानदानी हैं। रसिया हैं। आपके बाप-दादों ने कई कलमनवीसों को इज्जत बख्शी है। हुजूर भी दाद..!&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;इतने में अजगर ने उसे रोका। फिर टोका। मिस्टर! कलाम सुनाइए। जानवरों के साहित्य में इंसानी &amp;nbsp;तौर-तरीके और चमचागिरी मत लाइए।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;दूसरे सांप ने सिर झुकाया। आदाब बजाया। और शुरू हो गया।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;इंसान की केंचुली..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;सबसे खतरनाक होता है आस्तीन का इंसां होना..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;डसता नहीं छुऱा भोंकता है पीठ में..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;कांटे बिछाता है रास्ते में..शबनम की आड़ में..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;बांहों में फलता-फूलता है..अमरबेल की तरह&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;दरख्त को ही खोखला कर देता है एक दिन..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;जड़ों में डालता है मट्ठा..धीमे जहर सा..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;और कभी सींचता है तेजाबी जहर से..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;बुनियादें हिलाने तक रहता है आस्तीन में..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;ढहती है जब कोई मीनार..तभी खिसकता है..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;नए शिकार की खोज में..खूंखार पंजे लेकर..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;उमर भर की परेशानी होती है रुखसत तभी ..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;जब खुद की सोच का जहर कर देता है बदन नीला..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;या कभी,&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;कभी खुद की आस्तीन से ही निकल आता है इंसां..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;तब जाती है जान..होता है फरामोशी का इल्जाम..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;सबसे खतरनाक होता है आस्तीन का इंसान..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;अजगर ने रूमाल से आंखें पोंछी। उसने उठकर सांप की पीठ पर दाद की पूंछ फिराई। गालों पर चार चुम्मियां लीं। तीसरी बार पेड़ के खोखले में पूंछ डालकर एक चूजा निकाला औऱ सांप के न्योछावर करके खा लिया। फिर भरे गले से बोला। उस्ताद क्या बात कही है।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;कभी खुद की आस्तीन से ही निकल आता है इंसान..&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;तब जाती है जान.. होता है फरामोशी का इल्जाम..वाह, वा..वाह, वा..।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;कुछ कहने सुनने को नहीं रह गया है। कविता खुद बोलती है। सब बयान कर देती है। कवि बूढ़ा जरूर है लेकिन वाणी में ओज है। चिंतन में भयानकता है। जाति की चिंता को स्वर दे डाला है इसने। तू भी सांप प्रजाति का राष्ट्रीय कवि होने की योग्यता रखता है। जय हो। तू भी यशस्वी हो। तमाम औपचारिक क्रियाकलापों के पश्चात अब अजगर ने पूछा- बेटा! जरा ये तो बताओ। दोनों की कविताओं में इतनी गहरी बात। दर्द की इतनी गहन भावना। यथार्थ का इतना अद्बुत संसार कैसे रचा है तुम दोनों ने..शरमाओ नहीं खुलकर जरा बताओ। इस बुढ़ापे में भी कहां से रिचार्ज करवाया है अपने अंदर का जहर..।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse;"&gt;तब दोनों सांपों ने श्रृद्धेय की चरणधूलि ली..उनकी सीनियोरिटी के सलाम किया। बात को ताड़ लेने की काबिलियत पर तारीफ का छोटा-मोटा कलमा पढ़ा। फिर रूंधे गले से बताया। सर.., इस जहर के पीछे राज है गहरा। कुछ समय हम रहे इंसानों के संग। पिटारी में पड़े भोगते रहे कष्ट औऱ गम। सुनते रहे इंसानी बातें..। उनकी हरकतें औऱ जबानी जहर देखकर भूल गए अपना जहर। जब तक उनकी कैद में रहे दहशत के मारे कांपते रहे। जब से छूटे हैं अपनी खैर मनाते हैं। हमारे काटे का फिर भी इलाज है, इंसानी जहर तो दादा, लाइलाज है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-collapse: collapse;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-1095122711053302086?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/1095122711053302086/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=1095122711053302086' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/1095122711053302086'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/1095122711053302086'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/08/blog-post_04.html' title='दो सांप, एक आस्तीन का इंसान..'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-ietmihTMCM0/TjqHX28mIMI/AAAAAAAAAIM/N2_Jo5VD9h0/s72-c/snake.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-1876709646030558520</id><published>2011-08-03T17:43:00.002+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.595+05:30</updated><title type='text'>धैर्य धरे, कुछ हो जाएगा, साला कुछ अच्छा हो जाएगा...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-XeBxm_GJBCA/Tjk7WHizeXI/AAAAAAAAAIE/609XLQyTti8/s1600/ho.....jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/-XeBxm_GJBCA/Tjk7WHizeXI/AAAAAAAAAIE/609XLQyTti8/s320/ho.....jpg" width="227" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;हो जाएगा आप बेफिकर रओ भाई साब!&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;ऐसी आवाजें तो आपने सुनी होंगी। इन आवाजों को निकालने वाले ऐसे मनुष्य भी आपने देखें ही होंगे।&lt;br /&gt;हर तरह के भाई साब की चिंता ओढ़कर उन्हें निश्चिंत करने वाली यह प्रजाति मनुष्य के जन्म के साथ ही धरती पर चली आ रही है। आपके आस-पड़ोस में काफी मात्रा में इस प्रजाति के परभक्षी मंडराते पाए जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसा भी काम हो? कोईसा भी काम हो? सब करवा देने का दावा। तारणहार टाइप की फीलिंग रखते हैं। किसी के भी बाजू में जहां जरा सी भी जगह मिली झाड़-झंखाड़ टाइप उग ही आते हैं।&lt;br /&gt;जबानी जमाखर्च के विशेषज्ञ होते हैं ये! काम होगा नहीं, भाई साब भी जीवनभर निश्चिंत रहेंगे। बैलेंसिंग प्रतिभा होती है इनके अंदर। स्प्रिंग के साथ मनुष्य जाति का निकट का रिश्ता जोड़ दिया है इन्होंने! हो जाएगा की स्प्रिंग पूरी ताकत के साथ पिचकती है, नहीं होगा की शक्ति से वापस अपना आकार ले लेती है। यंत्र और मानव का अनूठा गठजोड़ कर डाला है इन्होंने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर असंभव काम के लिए इस प्रजाति का चमत्कारिक वाक्य एक ही है-हो जाएगा भाई साब! साला हो कैसे जाएगा इसकी टेंशन भी भाई साब को नहीं लेने देते हैं। होते-होते भाई साब जवानी से बुढ़ापे की दिशा में निकलने लगते हैं। दिया गया काम वहीं रहता है, ‘हो जाएगा प्रजाति’ काफी आगे निकल जाती है।&lt;br /&gt;काफी आगे निकलना ही इस ‘हो जाएगा प्रजाति’ का लक्ष्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंतिम लक्ष्य! जीवन का उद्देश्य!&lt;br /&gt;अपने जीवन के लक्ष्यों को लेकर यह ‘हो जाएगा प्रजाति’बड़ी सजग रहती है। जिन हथियारों से ये भाई साब किस्म के जीवों को भरमाए रहती है उन्हीं का प्रयोग खुद के ऊपर न होने देने के लिए अडिग रहती है। इसलिए सफल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे बड़ी परोपकारी होती है ये प्रजाति। खासी वफादार। भाई साब का सारा तनाव अपने सिर ले लेती है। भाई साब को डाइबिटीज, ट्यूमर, कैंसर, टीबी जैसी बीमारियों से दूर रखती है। काम न होने जब कभी सीधे हॉर्टअटैक की स्थिति बन जाती है, तभी ये नया भाई साब तलाशती है।&lt;br /&gt;मजबूरी में!&lt;br /&gt;‘हो जाएगा’ की खातिर!&lt;br /&gt;जीवन का लक्ष्य साधने की चिंता में!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नया भाई साब मिलते ही अपना चमत्कारिक वाक्य जपने में जुट जाती है।&lt;br /&gt;‘हो जाएगा भाई साब आप बेफिकर रओ।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कम्युनिकेशन की मास्टर होती है प्रजाति। संचार की भारी विशेषज्ञता रखती है। दिलासे का ऐसा संचारण करती है कि संबंधित चिता पर लेटे-लेटे एक हाथ उठाकर आशीर्वाद दे दे। ये तब भी बाज नहीं आते।&lt;br /&gt;हो जाएगा भाई साब आप सुकून से जलोगे! लकड़ियां चंदन की लगवाईं हैं। तीन दिन तक तो सिर्फ धूप में ही सुखवाई हैं। चिता के नीचे गोबर भी शुद्ध क्वालिटी का लिपवाया है। सूचना भी पूरे शहर को करवा दी है। सब आ गए हैं।&lt;br /&gt;हां, भाई साब आप बस थोड़ा से ठहर जाते अपना काम भी बस होने ही वाला था, फाइल भी निकलने ही वाली थी। श्मशान में भी इनकी मुस्तैदी देखते ही बनती है। सक्रिय रहते हैं हर वक्त।&lt;br /&gt;इतने कि, चिता जलने से पहले ही नए भाई साब का ‘हो जाएगा’ देखने निकल चुके होते हैं।&lt;br /&gt;भयंकर कर्मठता से ओतप्रोत होते हैं ये। भयानक संकल्प शक्ति के धनी होते हैं ये।&lt;br /&gt;अपने मामले में!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाई साब के मामले में तो उनकी संकल्प शक्ति का भीषण इम्तिहान ले लेते हैं।&lt;br /&gt;हर तरह के भाई साहबों को हर प्रकार की सहनशीलता सीखा देते हैं ये।&lt;br /&gt;भाई साब लगे हैं, दो-चार दिन में काम हो जाएगा!&lt;br /&gt;एक बार साला फंदे में आया कि काम हुआ ही समझो!&lt;br /&gt;बै ज्यादा भाव खा रहे हैं! जुगाड़ नई मिल रई कौनऊ!&lt;br /&gt;बस भाई साब, कल सुबै से साले की खोपड़ी पे बैठ जाऊंगा, कैसे नईं करेगा काम!&lt;br /&gt;हमने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं! साले की चड़्डी का रंग तक जानते हैं नाड़ा खींच देंगे होशियारी धरी रह जाएगी।&lt;br /&gt;काम तो होके रहेगा। आप बेफिकर रओ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-iZIEx1MNKAw/Tjk7dy6KmuI/AAAAAAAAAII/e9dKBZCQgUI/s1600/ho+2222.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/-iZIEx1MNKAw/Tjk7dy6KmuI/AAAAAAAAAII/e9dKBZCQgUI/s320/ho+2222.jpg" width="283" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;आश्वासनों के अचूक हथियार हैं इनके पास। विविधता इतनी की कोई काट नहीं सकता है। इनका काटा वैसे भी पानी नहीं मांगता है। मांगेगा तो ये उसे कुंआ खुदवाने का आश्वासन देकर निकल लेंगे। जरूरी हुआ तो पानी की पाइप लाइन भी अपने घर की दिशा में ही बिछवाएंगे। ज्यादा हुआ तो बांध बनवाने का आश्वासन देने लगेंगे। आश्वासन हैं, आश्वासनों का क्या? इसी भरोसे दुकानदारी चल रही है। ग्राहक बिचकना नहीं चाहिए। सब तरफ नजर रहती है इनकी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधुनिकता से भी लबालब होते हैं ये। देसी से काम न चले तो आश्वासनों के कई हथियारों का बाहर से भी आयात कर लेते हैं। जोर इस बात पर है कि कोई वार खाली न जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं गलती से कोई काम हो गया तो उसे दिशा से भटकी मिसाइल मानते हैं। प्रजाति पर कलंक लग गया। प्रतिभा कुंठित तो नहीं हो गई, टाइप विचारने लगते हैं। संकल्प लेकर फिर मैदान में जुट जाते हैं।&lt;br /&gt;फायर एंड फॉरगेट इनके प्रेरक वाक्य हैं! &lt;br /&gt;‘भाई साब का हो जाएगा’ का फायर करके लक्ष्य फॉरगेट कर देते हैं। भाड़ में जाए मिसाइल। झील में डूबे या किसी की खोपड़ी में गिरे, अपने बाप का क्या? या बाप की ही खोपड़ी में ही गिरे तब भी अपने बाप का क्या? हालांकि इनके बाप तो पहले ही इनके आश्वासनों की गोलियां खा-खाकर गोलोकवासी हो चुके होते हैं, सो मिसाइल वगैरहा की भी ज्यादा चिंता नहीं करते हैं। कहीं गिरे। किसी पे गिरे। न गिरे। चलनी जरूर चाहिए। चलती दिखनी जरूर चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर लक्ष्य हांसिल हो न हो फायर की प्रक्रिया इतने खूबसूरत ढंग से बताते हैं कि भाई साब को उसी में लक्ष्य प्राप्ति का आनंद प्राप्त करवा देते हैं। काम हो जाने की अनुभूति से सराबोर कर देते हैं। ऊर्जा से भर देते हैं। पूरा वातावरण ही नई उमंग से खलबला उठाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी कथावाचक के साक्षात अवतार हो जाते हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंडाल भी तालियों से गूंज उठता है। जयकारे लगने लगते हैं चहुंओर। हरे-हरे गूंजने लगता है हर कहीं..। काम हो न हो। मोक्ष मिले न मिले। कथा तो सरस है। प्रक्रिया तो सहज है। टकटकी लगा लेते हैं श्रृद्घालुजन। आंखों से टपाटप आंसू गिरते हैं फिर। भाव-विभोर हो जाते हैं भाई साब। मंजिल किसने देखी है रास्ते का विवरण तो जोरदार है। श्रृद्घा से नत है देश। भाई साब भी बलि-बलि जाते हैं। ‘हो जाएगा’ प्रजाति का संचारण ऐसा ही सम्मोहनीय होता है।&lt;br /&gt;वैराज्य दिलवाते है, माया-मोह से। संसार नश्वर है। दुनिया फानी है। क्या लेके जाओगे। बिना प्रवचन झाड़े ही भाई साब को मोक्ष के पथ पर रवाना कर देते हैं। मोक्ष की दिशा में मिसाइल छोड़ दी है। आपकी सीट भी रिजर्व करवा दी है। काम हुआ नहीं। भाई साब निश्चिंत हैं। संचार के भारी विशेषज्ञ होते हैं न ये! श्रोताओं को फुल आनंद की प्राप्ति करवा देते हैं, जबानी जमाखर्च के बलबूते ही। काम साला भाड़ में जाए.. क्या साथ लेके जाओगे? खाली हाथ आए थे साला, भर के ले जाने की कुकर्मी भावना रखते हो।&lt;br /&gt;ज्ञानी मनुष्य तो तत्काल सब सीख लेता है। संसार में उलझना छोड़ देता है। हालांकि ये उसे उलझने लायक रहने ही नहीं देते हैं। अज्ञानी जरूर संसार में उलझा रहता है। हमारा काम कब तक होगा की रट लगाए रहता है। तब ये ‘भाई साब हो जाएगा आप बेफिर रओ’ का डोज बढ़ाकर उसे अज्ञानता के दलदल से खींचने का भरपूर प्रयास करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मधुर वाणी-खूबसूरत भावभंगिमाए!&lt;br /&gt;सहनशीलता का अद्भुत इम्तिहान!&lt;br /&gt;मुर्दो तक की आंखें खोल देता है। भाई साब भी एक दिन सीख ही जाते हैं। माटी की देह माटी में मिलेगी। क्या लेकर आए थे, क्या ले जाना है। दुनिया आनी-जानी है। ऊपर से फानी भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संक्षेप में संसार नश्वर है!&lt;br /&gt;‘हो जाएगा’ अमर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सो, एक दिन उसके सारे क्लेश कट जाते हैं। मनुष्य निर्विकार भाव को प्राप्त हो जाता है। बचा रहा तो..।&lt;br /&gt;वैसे कई बार तो मुझे लगता है कि देश के नेता इसी ‘भाई साब का हो जाएगा’ प्रजाति से प्रताड़ित होकर ही तो इस धंधे में नहीं उतरे हैं। ताकि आश्वासनों की खुंदक और काम न होने के व्यक्तिगत तौर पर हुए जुल्मों का बदला सामूहिक तौर पर राष्ट्र से ले सकें। कुछ इस तरह?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो जाएगा देशवासियों!&lt;br /&gt;धैर्य धरें! कई स्तरों पर बात चल रही है! हमारे सहनशक्ति की परीक्षा न लें! हम कड़ी कार्रवाई करेंगे! अबकी बार ये अंतिम चेतावनी हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आतंकी आते हैं वारदात करके निकल जाते हैं। घोटाले होते रहते हैं। योजनाएं आगे नहीं खिसकतीं। राष्ट्र विकास पथ पर अड़ियल टट्टू बना खड़ा रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और देश भी कुछ हो जाएगा.., कुछ अच्छा हो जाएगा.. साला हो ही जाएगा.. का धैर्य धरे बैठा है..भाई साब की तरह..। प्रतीक्षारत..।&lt;br /&gt;अन्यथा अगर नेताओं को बदला नहीं भांजना है तो फिर और क्या कारण हो सकता है हर मामले में हमारी राष्ट्रीय लाचारी का..।&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-1876709646030558520?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/1876709646030558520/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=1876709646030558520' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/1876709646030558520'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/1876709646030558520'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='धैर्य धरे, कुछ हो जाएगा, साला कुछ अच्छा हो जाएगा...'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-XeBxm_GJBCA/Tjk7WHizeXI/AAAAAAAAAIE/609XLQyTti8/s72-c/ho.....jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-6312120291195527202</id><published>2011-07-25T12:41:00.000+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.596+05:30</updated><title type='text'>सरकारी अय्यारों की गाथा...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-KceHmzVel0E/Ti0WRU00h8I/AAAAAAAAAHw/AMwrzDkJVDk/s1600/ayyar.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="190" src="http://4.bp.blogspot.com/-KceHmzVel0E/Ti0WRU00h8I/AAAAAAAAAHw/AMwrzDkJVDk/s320/ayyar.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;मुझे कई बार लगता है कि चंद्राकांता संतति के अय्यार और सरकारी कर्मचारियों में बड़ी मौलिक समानता होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों ही बेहद चंट और तेज-तर्रार होते हैं। हर काम में एकदम एक्सपर्ट। इधर आका या अफसर या मंत्री का इशारा मिला उधर, काम में जुट गए। अपने आका के लिए जी-जान लगा देते हैं अय्यार। कैसा भी टेढ़ा-तिरछा काम हो, कितना भी दुर्गम अभियान हो मजाल है कि मना करें.। कैसा भी रहस्य हो, खोल देंगे साला..। हर काम के लिए जान हाजिर। मुश्किल है तो बना देंगे सरल.। साला, नियमों में नहीं बैठ रहा है, तो ससुरे नियमों की तो.. । वो साला बड़ा इमानदार बनता है, काम के आड़े आ रहा है, उसकी तो कबर इतनी गहरी बना देंगे कि कल को खुदाई हो तो पानी पहले निकले आए लाश बाद में ही मिलेगी। माने हर दंद-फंद में भयंकर निपुण। भले ही सरकारी हों लेकिन डिलीवरी के मामले में 25 मिनट में पिज्जा घर में सप्लाई कर देंगे टाइप की तत्परता रखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर आर्डर, उधर सप्लाई, नहीं तो पइसे वापस!&lt;br /&gt;इसीलिए ये आंखों के तारे होते हैं।&lt;br /&gt;राज व्यवस्था में बड़ा सम्मान होता है इनका।&lt;br /&gt;हर राजकुमार इन्हें अपने आजू-बाजू ही रखना चाहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेष बदलने से लेकर व्यवहार बदलने तक बड़े जुझारू होते हैं ये। कभी अपने आका के चरणों में गिरें तो याचना के क्षेत्र को इतना ऊंचा उठा देंगे कि मजाल है कोई बराबरी कर पाए। किसी भी बात या विषय को ये अपने आका की इच्छानुसार दूसरे को इतनी अच्छी तरह से समझाते हैं कि आका इन पर बली-बली जाता है। कई बार तो उठकर मुंह तक चूम लेता है। ये बुरा नहीं मानते, गालों पर पान की पीक लगे मिक्स थूक को भी आका का प्रसाद समझ स्वीकार करते हैं। ऐसे ही कभी आका के दुश्मनों उर्फ आम आदमी इनके लपेटे में आ जाए तो फिर देखिए क्या हाल करते हैं उसका, उसे खुद अपने इंसान होने पर शर्मिदा कर देंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर सरकारी विषय के बड़े विद्वान होते हैं अय्यार।&lt;br /&gt;हर आदेश के प्रति भारी पैमाने पर चेतना भी पाई जाती है इनमें।&lt;br /&gt;इनका ललाट सरकारी किस्म की चमक से दिपदिपाता रहता है।&lt;br /&gt;और तो और इनके दुश्मनों का तो यहां तक मानना है कि इनके मुर्दो तक में भारी प्रखरता पाई जाती है।&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; जैक ऑफ ऑल हैं ये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;24 घंटे मुस्तैद रहते हैं अय्यार। इनकी पोटली में हर तरह के अचूक अस्त्र-शस्त्र रहते हैं। नियम नंबर 12 आड़े आ रहा है तो उस पर 12 (ब) और 13 (स) की कंडिकाएं चढ़ा देंगे। नियम नंबर 12 बताए कि किसी काम को करने में क्या-क्या प्रक्रियाओं का पालन किया जाना जरूरी हैं तो कंडिकाएं बताएंगी कि इनकी खाट ही कैसे खड़ी की जा सकती है। या नियमों को ही खाट पर आका के लिए कैसे लिटाया जा सकता है। खुद नियमों के लखलखे का आम आदमी पर इतना भयंकर इस्तेमाल करेंगे कि बरसों तक उसकी बेहोशी न टूटे।&amp;nbsp;जब टूटे भी तो विधानसभा भवन या सेक्रेट्रिएट की तरफ देखकर हाय..! नियम, हाय..! नियम करके पछाड़ खा-खाकर गिरे। इस लखलखे के कहर से बचने के लिए सरकारी लाख-लाख की हरी औषधि ही काम करती है। बेचारे देवकीनंदन खत्री भी आज होते तो इस औषधि की ठीक-ठीक काट नहीं बता पाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;छोटे बाबू-बड़े बाबूओं का इनका अपना खूंखार दस्ता होता है। एक-एक छंटा हुआ। अपने क्षेत्र में गहराई से धंसा हुआ। इधर, इशारा मिला उधर, बेआवाज काम चालू। किसी काम में अड़ंगा लगाना है तो आपत्तियां लगा-लगाकर गर्भवती महिला जैसा फाइल का पेट फुला देंगे। नियमों में ऐसा मामला फंसाएंगे कि ऑपरेशन हो तो प्रसूता और बच्चे दोनों की जान को खतरा निकल आए। मुद्दा ऐसा उलझा देंगे कि कोई हाथ और गर्दन तक न फंसाने की हिम्मत न कर पाए। इशारा मिलने पर तो ये कठिन से कठिन आपरेशन भी बिना औजारों के कर गुजरें। बेहिसाब विशेषताएं होती हैं इनमें। रहस्यों के खौफनाक सियासी गलियारों में बेधड़क धूमता रहता है अय्यार। एक-एक सुरंग और गुप्त रास्ते की जानकारी होती है उसको। कब किसको, किस रास्ते से बचाना है या मरवाना है इसकी पूरी मालूमात रखता है वो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन अय्यारों के भरोसे ही राजव्यवस्था निश्चिंत होती है।&lt;br /&gt;जो राज व्यवस्था का हिस्सा बनकर भी अय्यारी नहीं सीख पाते हैं उनकी तो बड़ी दुर्गति होती है। बेचारे महत्वहीन पदों पर बैठाए जाते हैं। वहां से भी यहां-वहां फिंकवाए जाते हैं। एक बंगले पर पहुंचकर पूरा सामान भी खोल नहीं पाते हैं कि दूसरे महत्वहीन स्थान पर जाने का आदेश आ जाता है। हमेशा अय्यारों के ऐश और पावरफुल स्थिति देख मन ही मन कुढ़ते रहते हैं। कर कुछ पाते नहीं है ऊपर से अय्यार भी नहीं बन पाते, बड़ी विकट स्थिति होती है इनकी। यूं तो कहने को बहुत कुछ है। बड़ी लंबी है यह कहानी। लिखने बैठो तो चंद्रकांता संतति से भी लंबी निकल आएगी सरकारी अय्यारों की गाथा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्योंकि चंद्रकांता संतति तो 24 खंडों में जाकर खत्म हो जाता है लेकिन सरकारी अय्यारों की गाथा तो अनंत है.., हरिकथा की तरह..। ऊपर से लिखी भी तो सिंधुघाटी सभ्यता की तरह की किसी लिपि में है।&lt;br /&gt;सैकड़ों साल से सामने है गुर्दा हो तो पढ़ लो.।&lt;br /&gt;एक जीवन भी कम है इसे पढ़ने के लिए ..।&lt;br /&gt;आपको तो पता ही है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-6312120291195527202?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/6312120291195527202/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=6312120291195527202' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/6312120291195527202'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/6312120291195527202'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/07/blog-post_25.html' title='सरकारी अय्यारों की गाथा...'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-KceHmzVel0E/Ti0WRU00h8I/AAAAAAAAAHw/AMwrzDkJVDk/s72-c/ayyar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-4200307363209497970</id><published>2011-07-12T13:16:00.001+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.597+05:30</updated><title type='text'>विचारों का मुर्दा, स्पेस का ताबूत..</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-pBEACdJ3cQ8/Thv7oLAmzjI/AAAAAAAAAGs/djJ6H6VK04g/s1600/images.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="224" src="http://2.bp.blogspot.com/-pBEACdJ3cQ8/Thv7oLAmzjI/AAAAAAAAAGs/djJ6H6VK04g/s320/images.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;भाई साब! जरा एक अच्छा सा पीस तो भिजवा दीजिए। बस जरा शब्द सीमा का ध्यान रखिएगा। स्पेस का तो आपको पता ही है ज्यादा नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्पेस का झंझट है! हर कहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अखबारों में, मैगजीन में, रिश्तों और जिंदगी में तो खैर है ही, शाश्वत समस्या की तरह।&lt;br /&gt;हालांकि यहां बात लेखन-विचारों के लिए अखबारों में उचित स्पेस न मिलने की हो रही है।&lt;br /&gt;अखबारों में बड़ी फिक्स सी जगह होती है, अपनी बात कहने के लिए। यानी स्पेस का ताबूत पहले से बना होता है अब विचारों का मुर्दा इसी साइज में चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न लंबा!&lt;br /&gt;न छोटा!&lt;br /&gt;बिलकुल फिट साइज का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा न हो तो विचारों की उन्मुक्त उड़ान को स्पेस की कैंची मारकर धड़ाम से जमीन पर गिरा दिया जाता है। फिर बेचारा घायल विचार फड़फड़ाता रहता है। कोई ध्यान नहीं देता। घायल विचार किसी का ध्यान खींच पाते हैं भला! पूरी सोसाइटी ही इन घायल विचारों के कारण दिशाशून्य सी हो रही है। किसी का घायल विचार-दूसरे किसी के जख्मी विचार सोच को कोई साबुत दिशा नहीं दे पाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार इधर आपने विचार लिया। उसे धीरे-धीरे दिमाग की देग में पकाना शुरू ही किया था कि पता चला शब्द सीमा समाप्त।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;विचार असमय ही दिवंगत।&lt;br /&gt;क्या अच्छे भले थे एकाएक हॉर्टअटैक आया।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;नहीं रहे।&lt;br /&gt;‘स्पेस’ की कमी से जाम हो गईं धमनियां।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;नीला पड़ गया मुंह।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;ठंडा पड़ गया शरीर।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;कालजयी दिशा में जाता एक विचार स्मृति शेष हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; स्पेस का दबाव ही ऐसा है। मितव्ययिता चाहिए सोचने में। विस्तार का तंबू मत तानिए। सीधे अपनी बात कह दीजिए। वरना फिर टांगे छांटनी पड़ेंगी। तब फिट हो पाएगा ताबूत में, हो सकता है बाल भी उड़ाना पड़ें। भले ही कटी-फटी शक्ल निकले, विषय भी पहचानने में न आए!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अलंकार! अनुप्रास! शब्द सामथ्र्य! भाषा सौष्ठव! भाड़ में जाने दीजिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टुंडा विचार भी चलेगा!&lt;br /&gt;मिसाल भैंगी हो रही है जनाब।&lt;br /&gt;कोई बात नहीं भैंगी ही चलेगी!&lt;br /&gt;अरे भाई अभी तो माहौल ही नहीं खेंच पाए थे।&lt;br /&gt;मट्टी डालिए माहौल पर आप तो सीधे-सीधे द एंड पर पहुंच जाइए!&lt;br /&gt;पाठक समझदार हैं, बीच का माहौल खुद ही बना लेंगे। उसके पास भी पढ़ने का स्पेस कम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी तो पार्क में छोरा-छोरी मिले ही थे। प्यार की पींगे बढ़ा ही रहे थे कि स्पेस के विलेन ने झाड़ियों से लात मार दी। औंधे मुंह गिर पड़े कालजयी रचना के विचार!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सो अब हर तरह का लेखक माहौल नहीं खेंच पा रहा है। जल्दी में सब निपटा देता है।&lt;br /&gt;लेखन में दम नहीं बचा है? सुनने में आ रहा है। इन दिनों। इसलिएं? क्योंकि!&lt;br /&gt;विचारों का अधकच्च फल लद्द से गिरता है। जमीन पर। नौसिखुआ सा कोई आलोचक इसी के आधार पर लेखक की सात पुश्तों को कोस डालता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर, लेखक पर भी स्पेस का दबाव था। विचार कृत्रिम तरीके से पकाना पड़ा। अधकच्च ही मार्केट में चला दिया। रंग-रूप-स्वाद-पुरानी बात नहीं रही जैसी शिकायतें आने लगती हैं।&lt;br /&gt;स्वाद कहां से आएगा!&lt;br /&gt;स्पेस का दबाव रहा विचारों का नवजात अठमासा ही बाहर आ गया।&lt;br /&gt;कई बीमारियां लेकर।&lt;br /&gt;रचना के बाप और साख दोनों पर भी अलग ही संकट खड़ा कर गया।&lt;br /&gt;हैं! बहन जै का भया है?&lt;br /&gt;ऐसी आवाजें प्रसूति की कमजोरी झेल रहे लेखक का मनोबल और तोड़ देती हैं। फिर लेखक हिम्मत नहीं जुटा पाता है अपना जाया देखने की। दूसरे लेखक का जाया यूं भी कोई लेखक देखता नहीं है।&lt;br /&gt;तो फिर ?&lt;br /&gt;वही टुंडा विचार!&lt;br /&gt;सोसाइटी में दिशाशून्यता! बौरायापन!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि लेखन ही क्यों हर जगह स्पेस में कमी आ रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। दायरे सिकुड़ रहे हैं। रिश्ते सिमट से गए हैं। हम-तुम के स्पेस में मां-बाप तक नहीं समा पा रहे हैं। यहीं देख लीजिए अपनी बात कहने का ढंग से माहौल भी नहीं बना पाया कि लीजिए खर्च हो गई जगह। स्पेस की कमी की बात भी मुंह की मुंह में रह गई।&lt;br /&gt;हां उम्मीद के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं...&lt;br /&gt;वो दिन कभी तो आएगा, &amp;nbsp;जब हम खाल में रहना। स्पेस में कहना सीख पाएंगे।&lt;br /&gt;शायद आएगा...!&lt;br /&gt;आमीन।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-4200307363209497970?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/4200307363209497970/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=4200307363209497970' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/4200307363209497970'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/4200307363209497970'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/07/blog-post_5693.html' title='विचारों का मुर्दा, स्पेस का ताबूत..'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-pBEACdJ3cQ8/Thv7oLAmzjI/AAAAAAAAAGs/djJ6H6VK04g/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-4529641380142892139</id><published>2011-07-12T12:55:00.000+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.598+05:30</updated><title type='text'>कहीं बेदखल न हो जाए भीतर का भगवान...</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-2_2AI_FjEJU/Thv2tCklrhI/AAAAAAAAAGo/4wIanV7rVoc/s1600/a_256_f.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" src="http://1.bp.blogspot.com/-2_2AI_FjEJU/Thv2tCklrhI/AAAAAAAAAGo/4wIanV7rVoc/s200/a_256_f.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 19px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;भीषण गति से बढ़ती आबादी पर कोई कल्पना जब किसी दार्शनिक विचार से टकराती है तो इस विस्फोट से देखिए कैसे एक झकास, मौलिक कैटेगिरी का ऊ टपटांग विचार जन्म लेता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 19px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 19px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;&amp;nbsp;किसी दिन आदमी के अंदर रहने वाले ईश्वर को बेदखल होना पड़ा तो? विचार कुछ ऐसे आया कि आबादी ऐसे ही बढ़ती रही तो एक दिन इंसानों के रहने की जगह खत्म हो जाएगी। फिर लोग रहेंगे कहां? हालात कहीं ऐसे न हो जाएं कि एक ही आदमी में कई-कई रहने लगें। एक शरीर में भरे चार-चार इंसान। लल्लू-कल्लू-पप्पू-टप्पू। एक ही शरीर के ऊपर नीचे तल्ले में लदे चार-चार लोग। अगर कभी ऐसा हो गया तो ईश्वर को अपने रहने के लिए अलग जगह खोजनी होगी? क्योंकि जैसा कि हम मानते हैं आदमी के अंदर ईश्वर भी तो रहता है। तो यही है मेरा ऊटपटांग विचार..!&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 19px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 19px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;आइए, मुद्दे पर विचार करने से पहले आदमी के अंदर ईश्वर ने कबसे रहना शुरू किया, इस बात पर विचार करते हैं। ओशो की सुनाई कहानी है। आदमी से पहले ईश्वर रहने की जगह की समस्या से दो-चार हो चुका था। पहले भगवान के रहने का निश्चित पता-ठिकाना था। लोग दिन-दोपहर आकर कुछ न कुछ मांगते रहते थे। मांगें भी एक-दूसरे की खुशी से जलने वालीं..। ईश्वर भी त्रस्त हो गया।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 19px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;तब उसने अपने प्राइवेट सेक्रेटरी से पूछा। सेक्रेटरी ने उन्हें हिमालय पर बसने की सलाह दी। ईश्वर ने कहा - क्या फायदा? कुछ ही दिनों में एडमंड हिलेरी-तेनजिंग नार्के माउंट एवरेस्ट जीत लेंगे, फिर धड़ाधड़ वहां भी लोग पहुंचेंगे। वहां भी ये सब शुरू हो जाएगा। अब सेक्रेटरी ने कहा - तो फिर चांद पर बसना अच्छा विकल्प हो सकता है? इस पर ईश्वर ने कहा - वहां भी बस नील आर्मस्ट्रांग पहुंचने ही वाला है, फिर बाकी लोग पहुंच जाएंगे। वहां भी मांगने का खेल शुरू हो जाएगा, क्या फायदा..?&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 19px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 19px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;तब सेक्रेटरी ने कहा - एक धांसू आइडिया है। आप कहो तो रहने की सबसे सुरक्षित जगह बताऊं? आप आदमी के भीतर क्यों नहीं रहते? गुड आइडिया!! ईश्वर ने कहा। वहां बहुत ही कम लोग रहते हैं। उससे भी कम लोग भीतर देखते हैं। सदियों में कोई एक कृष्ण, जीसस, पैगंबर वहां झांकता है। जो झांक लेता है, फिर वो लालची नहीं रह जाता। मांगता कुछ नहीं है। शिकायतें रह नहीं जातीं। हां, यहीं रहना ठीक है। बस, तबसे हमारे भीतर ईश्वर रहता है। आत्मा के साथ। अंतर्जगत को रोशन करता हुआ।तो इस कहानी के साथ फिर मूल विचार पर लौटते हैं। यहां तक तो ठीक है, लेकिन जब जगह की कमी के चलते एक ही शरीर में रहने लगेंगे कई आदमी तो फिर रहने के स्पेस की लड़ाई होगी और आदमी जगह कब्जाने, अतिक्रमण करने में ज्यादा तेज है। उसे इस काम के छल-छंदर ज्यादा आते हैं। सारे दो नंबरी कामों को एक नंबर बनाने का हुनर खूब विकसित किया है उसने। उधर, ईश्वर तो सहज-सरल है। निष्कपट! फिर कैसे रोका जा पाएगा आदमी को..? इस तरह तो आदमी एक दिन अपनी आत्मा तक पर अतिक्रमण का रंग चढ़ा देगा। तब..?&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 19px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 19px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;&amp;nbsp;आत्मा से ईश्वर निकला तो सिर्फ आदमी ही वहां भी रह जाएगा। अंदर-बाहर का खालिस बुरा आदमी। अंदर से सच्चई का ईश्वर हो जाएगा न बेदखल? अच्छा-बुरा रास्ता दिखाने वाला ईश्वर ऐसी हालत पर चीत्कार करेगा। आत्माविहीन हो जाएगा शरीर ..। फिर ये दुनिया रह जाएगी रहने लायक? डर इसी बात का है। फिकर इसी चीज की है। बढ़ती आबादी कहीं अंदर के ईश्वर को बेदखल न कर दे।&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 19px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; विचार भले ही ऊटपटांग-सा लगे, किंतु बढ़ती आबादी पर सोचना तो आज ही जरूरी है, कल तो देर हो जाएगी न!&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-4529641380142892139?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/4529641380142892139/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=4529641380142892139' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/4529641380142892139'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/4529641380142892139'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/07/blog-post_12.html' title='कहीं बेदखल न हो जाए भीतर का भगवान...'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-2_2AI_FjEJU/Thv2tCklrhI/AAAAAAAAAGo/4wIanV7rVoc/s72-c/a_256_f.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-4010933026700409855</id><published>2011-07-08T17:04:00.001+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.599+05:30</updated><title type='text'>लेखकीय कद बढ़ाने में किताबों का योगदान...</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-wWopjQizjSE/ThbqV8msxhI/AAAAAAAAAGg/fieJxROg9UA/s1600/writer.gif" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" src="http://3.bp.blogspot.com/-wWopjQizjSE/ThbqV8msxhI/AAAAAAAAAGg/fieJxROg9UA/s200/writer.gif" width="198" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी ही लिखी किताबों के ऊपर खड़े होकर उनका कद ऊंचा हो गया। स्टूल की जरूरत ही नहीं पड़ी!&lt;br /&gt;कुछ लेखक ऐसे ही कद बढ़ाते हैं। माने एकदम कंडम किताबों की थप्पी पर खड़े होकर। उनकी औसत लंबाई को किताबों की ईंटें काफी ऊंचाई प्रदान कर देती हैं। लगभग पर्याप्त मात्रा में ऊंचा उठा देती हैं।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;ऐसे लेखक इफरात में नजर आते हैं, बस उनकी किताबें ही नजर नहीं आतीं! साहित्य में घुसे ऐसे अतिक्रमणकारी दंद-फंद से काफी स्पेस हथिया लेते हैं। साहित्यिक खेतों को बंजर बनाने में जुटे ये परिश्रमी चेहरे इन दिनों काफी मात्रा में दिखाई देने लगे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े पुस्तकशील होते हैं ये!&lt;br /&gt;अनंत ज्ञान भरा होता है इनके दिमाग में!&lt;br /&gt;बात-बात पर पुस्तक फेंकने की कूबत रखते हैं!&lt;br /&gt;यहां-वहां से कट-पेस्ट इनके सबसे बड़े लेखकीय हथियार होते हैं?&lt;br /&gt;इतने मेहनती होते हैं सालों की कौन कहे, महीनों और सप्ताहों में भी किताब फेंक सकते हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले लेखक एक किताब लिखकर सैकड़ों सालों के लिए अमर हो जाता था, अब सैकड़ों लिखकर एक वर्ष की गारंटी नहीं बैठती है। क्यों लिखते हैं ये किताबें? कभी आपने विचार किया। या इस पर यूं भी सोचा जा सकता है आपके दिमाग में किताब लिखने का ख्याल क्यों नहीं आया। आया भी तो आपने इस विचार को ज्यादा लिफ्ट क्यों नहीं मारी।&lt;br /&gt;शायद, &amp;nbsp;हर आदमी अपनी सीमाएं जानता है?&lt;br /&gt;अपनी क्षमताओं से भली-भांति वाफिक होता है?&lt;br /&gt;पर इनकी सीमाएं तो अनंत हैं !&lt;br /&gt;ब्रह्मांण भी इनके दायरे में नहीं समा सकता है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनकी क्षमताएं भी इतनी भयंकर हैं कि तुलसीदास-वाल्मीकि तक के लेखन में कमियां निकाल दें। यहां तक की इन कमियों को लेकर ही&amp;nbsp;रामाय़ण-महाभारत से बड़ा ग्रंथ भी लिख सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; ये लेखक होना चाहते हैं। समाज को ज्ञान औऱ दिशा देने वाले साहित्यकार कहलाना चाहते हैं। हर तरह के शार्टकट से इतिहास में अपना नाम लिखवाना चाहते हैं। खुद ही मानते हैं कि राष्ट्र को सीधे रास्ते पर ले जाने की जिम्मेदारी ससुरी हमारे ही माथे है। हमई अलसा गए तो लुटिया डूबते देर न लगेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; लुटिया की चिंता है इन्हें..!&lt;br /&gt;&amp;nbsp; राष्ट्र को दिशा देना चाहते हैं!&lt;br /&gt;&amp;nbsp; लाइट हाउस भी बनना चाहते हैं ताकि देश को अपनी प्रखरता के बलबूते भटकने से बचा सकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; इतने पावन उद्देश्य की दिशा में भारी तादाद में ज्ञानदान भी करना चाहते हैं ताकि बुद्धिजीवी भी कहला सकें।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;काफी छपे हैं, यह जानकारी प्रतिष्ठित करवा देती है। क्या लिखा है, इसे देखने-पढ़ने की जहमत कौन उठाता है।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; इसलिए कोई रोकता भी नहीं है। रोकने के लिए कमियां बताना जरूरी होता है। आईना दिखाना पड़ता है। कमियां या आईना तभी दिखाया जा सकता है जब संबंधितों को पढ़ा गया हो। एक तो ये तो खुद अपना लिखा नहीं पढ़ते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा, लोग भी नहीं पढ़ते। पढ़ना आज कोई चाहता नहीं है। पढ़ने से कहीं सैटिंग लगाने की कला सीखी जा सकती है भला..।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी बड़े स्कूल में बच्चे के एडमिशन की व्यवस्था जमाई जा सकती है..। &lt;br /&gt;बॉस को पटाया जा सकता है..।&lt;br /&gt;नहीं न..।&lt;br /&gt;ये सब तो साला जिंदगी आजकल सड़क चलते ही सिखाने लगी है। फिर क्यों पढ़ें किताबें..? क्या दे पाएंगी किताबें.?&lt;br /&gt;सो लोगों को प्राप्त इतने ब्रह्म ज्ञान बदौलत ये लिखे जा रहे हैं। इतने आगे निकल चुके हैं कि इन्हें अब रोका भी नहीं जा सकता है।&lt;br /&gt;रोका तो इन्हें पहले भी नहीं जा सकता था। बचपन से ही बिगड़ गए थे।&lt;br /&gt;अब तो इनके बाप भी इन्हें रोकने में सक्षम नहीं हो पाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; ये ज्ञान देकर रहेंगे। ये ज्ञान कहीं से भी ला सकते हैं। समाज को दिशा भी दिखाएंगे। दिशा किसी भी तरफ की दिखा सकते हैं।&lt;br /&gt;ये कुछ भी देंगे, राष्ट्र को उसे ज्ञान मानना ही होगा। नहीं लेगा राष्ट्र ससुरा, तो उसके मुंह में घुसेड़ देंगे।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;सही रास्ते पर चलने के लिए हमारे दिए ज्ञान को ही पथ प्रदर्शक टाइप का मानना ही होगा। जो दिशा दिखाई है राष्ट्र को सीधे-सीधे उस पर चलना ही होगा। बिना न-नुकुर किए।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;इसलिए ये लिखना चाहते हैं। किताबें लाना चाहते हैं। लाइब्रेरी सजाना चाहते हैं। किताबों के ऊपर किताबें जमाना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;लेखकीय ऊंचाई बढ़ाना चाहते हैं।&lt;br /&gt;इन्हें लगता है ये ऊंचे कद के लेखक हैं। अपनी किताबों पर खड़े होकर..! &amp;nbsp;बिना स्टूल के.! &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;हमारे एक मित्र हैं। स्वाभाविक है लेखक भी हैं। ऊपर बताई गई परंपरा के प्रतिनिधि भी हैं। एक दिन घर आए बोले--यार, ये स्वात घाटी कहां है बताओ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;अपनी मासूम जिज्ञासा के तहत हमने उनसे इसका कारण जानना चाहा। बोले- भई, तालिबान के बारे में बड़ी भ्रांतियां फैली हुई हैं। उसी को लेकर एक प्रामाणिक किताब लिखना चाहता हूं। ताकि लोग वहां के बारे में अललटप्पू न बकें। बोलने से पहले एक बार वहां के बारे में बेसिक जानकारी तो प्राप्त कर लें। पिछली बार भी खाड़ी देशों में हुई जनक्रांति के बारे में जो जिसके मन में आया सूतने में लगा था। कई तो ऐसे फेंकू मिले जैसे बरसों वहीं गुजारे हों। फिर बवासीर के बावजूद भी दो महीने लगाकर हमें वहां की स्थिति को साफ करने के लिए दो किताबें फेंकना पड़ीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; अर्ज किया-आप कितना बार गए हैं? तो जानकारी मिली कि अभी तो पासपोर्ट भी नहीं बनवाया है।&lt;br /&gt;लेकिन भड़क इतनी ही पूछताछ से गए। भिनकते सी आवाज में बोले- यार, उलझाओ मत, स्वात घाटी की लोकेशन बताओ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-t5FHdDTnh2Y/ThbrNcnlYNI/AAAAAAAAAGk/FO6vabVUOeI/s1600/writer.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="148" src="http://2.bp.blogspot.com/-t5FHdDTnh2Y/ThbrNcnlYNI/AAAAAAAAAGk/FO6vabVUOeI/s200/writer.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;पूरी किताब ही इस घाटी पर लिख रहा हूं। अमेरिकी कार्रवाई, आईएसआई, तालिबानी, स्थानीय निवासी, परंपराओं की बात लड़ाई की एक सच्ची कहानी के थ्रू बता रहा हूं। कश्मीर से स्वात तक का एरिया कवर करूंगा। छोरा कश्मीर का है। लड़ स्वात में रहा है। रोज खबरों में जिक्र सुनता हूं बड़ा फैसिनेट करता है स्वात नाम..। सो एक प्रामाणिक किताब लाने का संकल्प कर ही लिया। फिर कश्मीर औऱ स्वात नाम भी बराबर वजन पर बैठ रहे हैं। सो दोनों का मेलजोल बैठा दिया है। 140-150 पेज भी लिख मारे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;हमने जरा विनम्रता से जानना चाहा कि इन पेजों में क्या फटकार दिया है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोले- कोई बता रहा था कि कई बॉलीवुड फिल्मों की वहां शूटिंग हुई है वहां.., सो उसका जिक्र, स्वात घाटी की सुंदरता.., कश्मीर औऱ स्वात के बीच के रास्ते-पगडंडियों की बात.., तालिबानियों का जिक्र एवं चरित्र चित्रण..,बकरियों के झुंड का किस्सा..,वहां के पत्थरों की किस्में..,वनस्पतियों के नाम.., अमेरिकी कार्रवाई .., वहां की मिठाइयों के नाम!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निवेदन किया कि इस प्रयास में प्रामाणिकता नामक कोई चीज कहीं दिखाई नहीं दे रही है..?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;बोले- बस, तुम अफगानिस्तान की स्वात घाटी का जरा जुगराफिया भर बता दो। प्रामाणिकता भी बस डाली ही डाली समझो..। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;150 पेज लिख चुके हैं स्वात घाटी को अफगानिस्तान में फिट कर रखा है? इनके ऐसे कठिन परिश्रम पर भले ही पाकिस्तानी पीओके में स्थित स्वात घाटी अपनी स्थिति पर शर्मिंदा हो जाए, इन्हें क्या? ये तो ऐसी ही प्रामाणिकता से राष्ट्र को दिशा देते जाएंगे। किताब खत्म होगी तो 1200-1500 पेजों में जाएगी ही जाएगी। प्रामाणिकता के अलावा सब कवर कर लिया है। ऊपर से कवर पेज भी मोटी दफ्ती से बनवाएंगे।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;प्रामाणिक हो न हो..मोटी जरूर होना चाहिए किताब..!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक को उस पर खड़ा होकर अपना कद जो ऊंचा करना है। कवर भी मोटी दफ्ती का रखेंगे ताकि जूते सहित खड़े होने पर किताबें लेखक का बोझ झेल सकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही भी हो सकता है कल को विषय विशेषज्ञ ही हो जाएं। हर जगह तालिबान, आतंकवाद, घाटियों का जिक्र आने पर विशेषज्ञ मार्गदर्शन के लिए बुलाए जाएं।&lt;br /&gt;प्रामाणिकता के साथ सुना हुआ ‘सुना’ दें.., दोनों जेबों से निकाल कर ज्ञान और दिशा चहूंदिशाओं उछाल दें। लो, लपक लो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;भले ही स्वात घाटी का जुगराफिया क्लियर न हो..! &amp;nbsp;क्या जाता है महान किताब है। महान लेखक हैं। ज्ञान देना जरूरी है। किताबों की मोटाई ज्यादा मायने रखती है। उसी पर खड़े होकर तो अपना कद बढ़ाना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो ऐसी ही किताबें लेखक का कद बढ़ाने का भ्रम देती हैं। बिना स्टूल के..! आपको नहीं लगता इस पूरे प्रयास में बढ़ती तो मात्रा ऊंचाई है, कद तो सौ फीसदी घटता ही है। पर इसकी परवाह है किसी को! &lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-4010933026700409855?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/4010933026700409855/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=4010933026700409855' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/4010933026700409855'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/4010933026700409855'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/07/blog-post_08.html' title='लेखकीय कद बढ़ाने में किताबों का योगदान...'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-wWopjQizjSE/ThbqV8msxhI/AAAAAAAAAGg/fieJxROg9UA/s72-c/writer.gif' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-1815960794207344285</id><published>2011-07-02T18:32:00.000+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.600+05:30</updated><title type='text'>सियासी मंच से देश चिंतन...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-p1FAzjD-E4A/Tg8WAIX_CyI/AAAAAAAAAGY/7cnokzq1RD8/s1600/bhaaaaaaaaaaaa.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/-p1FAzjD-E4A/Tg8WAIX_CyI/AAAAAAAAAGY/7cnokzq1RD8/s320/bhaaaaaaaaaaaa.jpg" width="223" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;बड़े मंचों से अपनी बात कहने का बड़ा कायदा होता है। जोरदार सलीका होता है। अक्सर कायदा इतना कायदे का हो जाता है या सलीका इतना सलीकेदार हो जाता है कि इनके चक्कर में मूल मुद्दा ही गुम हो जाता है। आइए देखते हैं कैसे..?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गंभीर चर्चा के लिए सियासी मंच सजा है। मुद्दा गंभीर है। साथ में राष्ट्रीय भी है। बड़े नेता अर्थात् मुख्य वक्ता भी गंभीर हैं। वातावरण भी गंभीर है। छोटे नेतानुमा संयोजक ने गंभीर सा मुंह बनाकर अपना भाषण शुरू किया। आदरणीय मंच पर बैठे मेरे परम आदरणीय, परम श्रृद्धेय, परम ज्ञानी, देशभक्तों के देशभक्त, प्रखर चिंतक, चिंतनशील मेरे माननीय बड़े भाई साब, जिनके अथक प्रयासों से आज हम देश पर आन पड़े इस भीषण संकट पर चर्चा करने के लिए उपस्थित हुए हैं। यूं तो भाई साहब का जीवन ही संकटों के खिलाफ संदेश की तरह है। हमने एक बार उनसे इस मुद्दे पर आग्रह क्या किया वे अपना समय निकालकर हमारे लिए दौड़े चले आए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो भाई साहब के निजी जीवन में भी इन दिनों भीषण समस्याएं चल रही हैं। फिर भी हमने जरा फोन क्या किया पहली ही गाड़ी से निकल आने की बात कहने लगे। वो तो हमने ही उन्हें बताया कि पर्याप्त समय है आप आराम से रिजरवेशन वगैरह करवा लो, अन्यथा तो एक बार देश का नाम आते ही फिर भाई साहब से रुका नहीं जाता है। देशसेवा के लिए उनकी ललक ही कुछ ऐसी है। ऐसा नहीं कि भाई साहब ही ऐसे हैं उनका तो पूरा परिवार ही ऐसी प्रवृति रखता है। देशसेवा की कोई भी बात हो पूरा परिवार ही हम करेंगे, हम करेंगे.. कहकर आपस में लड़ने लगता है। एक बार तो ऐसे ही लड़ाई झगड़े के चक्कर में आपके पूज्य ताऊजी को दूसरा हार्ट अटैक तक हो चुका है। लेकिन देशसेवा की राह से फिर भी परिवार कभी डिगा नहीं है। और क्या कहें। भाई साहब का पोता तक जन्म से पक्का देशभक्त है। ऊंहूं..ऊंहूं..करके रोने की जगह अपनी तोतली आवाज में इंकलाब..इंकलाब..कहता है। खुद भाई साब ने सबको इस बारे में बताया है। अपने पोते को खिलाते समय अक्सर कहते भी हैं, भई ये लड़का तो बड़ा होकर हमसे भी बड़ा देशप्रेमी बनेगा। देखो, अभी से ही नारे लगाने की प्रैक्टिस कर रहा है। नारे भी वो वाले लगा रहा है जिन तक पहुंचने में हमें राजनीतिक जीवन के 15 साल लग गए। बड़ा उज्‍जवल भविष्य है छुटके का हें..हें..हें..।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; वैसे तो देशसेवा की कोई भी पुकार भाई साब के कान सैकड़ों मील दूर से भी पकड़ लेते हैं। तभी तो किसी भी बार्डर पर फायरिंग हो या पाक में किसी तरह की कोई हलचल हो। भाई साब फौरन ताड़ लेते हैं। देश को जगाने का वक्त आ गया है रे..। उठ बैठो.., देश के सामने समस्या गंभीर है..। आज ही चेतना होगा..। कल देर हो सकती है..। मातृभूमि पर संकट आया है रे। उठ बैठो रे..। वैसे मातृभूमि के नाम पर याद आया आपकी पूज्य पत्नी अर्थात् हमारी पूज्य माताजी से बड़ी देशभक्तिन तो आसपास के कई शहरों बल्कि मैं तो कहता हूं कि आसपास के कई देशों में दीया लेकर खोजने भी निकलो तो नहीं मिलेंगी। भाइयो, आप उनके चेहरे का तेज देखिए। उनका तेज ही भाई साब की शक्ति है। आप भले ही दिखने में साधारण सी घरेलू महिला दिखाई देती हों लेकिन उनकी विचारशक्ति हमारे देश के कई नेताओं की सोच को पानी पिला सकती है। यहां तक की आप घर आए किसी भी मेहमान को केवल पानी पिलाकर विदा करने में कतई भरोसा नहीं करती हैं। भाई साब के लिए भले ही न बनाएं लेकिन मजाल है कि बिना चाय पिए कोई उनके घर से लौटा हो। जब से भाई साब को डाइबिटीज हुआ है तब से छोड़ा है अन्यथा तो चाय के साथ दो-चार बिस्कुट तो वे साथ रखा ही देखी हैं। भाई साब के लिए पूज्य माताजी प्रेरणा की स्त्रोत हैं। भाइयो, जब माता-पिता देशभक्त हों तो परिवार को तो क्या कहना..। अहा..अहा..।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-GJsnjv5O2Vg/Tg8Wy1Z5QAI/AAAAAAAAAGc/ETHhrhqPR1U/s1600/bhnnnnnnnn.png" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/-GJsnjv5O2Vg/Tg8Wy1Z5QAI/AAAAAAAAAGc/ETHhrhqPR1U/s320/bhnnnnnnnn.png" width="223" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;आपके परिवार के जानवर तक इस जज्बे को रखते हैं। मैंने खुद अपनी आंखों से देखा है। आपकी गाय अपने देश की तरह शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की भावना की कायल है। किसी के चारे में मुंह नहीं मारती है। अपना चारा खाती है। अपना ही पानी पीती है। सड़क पार करने से पहले तक तीन बार दाएं-बाएं देखती है। इन्हीं प्रयासों से हमारा देश गऊ जैसा बना पाया है। भाई साब का इस दिशा में भी योगदान अतुलनीय है। सौभाग्य है कि ऐसे परिवार के नुमाइंदे हमारे बीच हैं। हमें इस मुद्दे पर जागरूक करने आए हैं। तो भाइयो, जैसा कि मैं कह रहा था भाई साब का जीवन ही देशभक्ति का संदेश है। .. और लीजिए मैं अभी मूल मुद्दे पर आ ही नहीं पाया कि मंच पर विराजमान आदरणीय भाई साब की तरह से संदेशा भी आ गया। उन्हें देर हो गई है शाम की गाड़ी से निकलना है। कल हाइकमान के पास पहुंचना है। अन्यथा तो सारी रात देश के लिए चर्चा में निकाल देते। क्या करें ..। बिचारे अकेली जान हर दिशा से पुकार उठती रहती है। तो भाइयो, इस मुद्दे पर आज की हमारी चर्चा बेहद उपयोगी रही। आशा है सरकार नींद से जगेगी। कुछ कदम उठाएगी। गंभीर मुद्दे पर आप लोगों की एकजुटता का ही नतीजा अन्यथा तो देश कब का गुलाम हो चुका होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत माता की जय..। इंकलाब जिंदाबाद..। जय हो ..। विदा दो..। विसर्जित हो जाओ..।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो इस तरह भाई साब गंभीर मुद्दे पर बिना भाषण दिए ही शाम की गाड़ी से निकल गए। अब शायद आप भी समझ गए होंगे कि क्यों देश के सामने आने वाली गंभीर समस्याओं के गंभीर हल किसी सियासी मंच से कभी नहीं निकल पाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-1815960794207344285?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/1815960794207344285/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=1815960794207344285' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/1815960794207344285'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/1815960794207344285'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='सियासी मंच से देश चिंतन...'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-p1FAzjD-E4A/Tg8WAIX_CyI/AAAAAAAAAGY/7cnokzq1RD8/s72-c/bhaaaaaaaaaaaa.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-490397699079793406</id><published>2011-06-09T11:09:00.000+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.601+05:30</updated><title type='text'>बादलो! पकौड़ा पिपासुओं पर तरस खाओ</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-Z_yeArcKdLg/TfBcVj_QDVI/AAAAAAAAAGU/QQH32bNdYAA/s1600/clouds1_f.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/-Z_yeArcKdLg/TfBcVj_QDVI/AAAAAAAAAGU/QQH32bNdYAA/s1600/clouds1_f.jpg" t8="true" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इधर कुछेक दिनों से बादलों पर मेरी नजर है। नजर इसलिए है कि इधर वे बरसें, उधर मैं पकौड़े खाऊं। बादलों और पकौड़ों का बड़ा गहन संबंध है। बिल्कुल वैसा ही, जैसा घोड़े का चने, चने का बेसन, बेसन का पकौड़ों से होता है, जन्म-जन्मांतरों का। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बारिश के दिनों में यह संबंध पूरी तरह से धुल-पुंछकर निखरे रूप में सामने आता है। किसी उत्सव की तरह मेरी जिंदगी में बदरी-बेसन-पकौड़ों-चटनी का उत्साह हिलोरे लेने लगता है। प्रकृति और चटोरेपन पर कई एंगलों से कविता करने का मन करने लगता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चने के बेसन बनने और बेसन के पकौड़ों के रूप में मुंह तक जाने की प्रक्रिया के अर्थशास्त्रीय विवेचन पर दिमाग चलने लगता है। पकौड़ों की प्लेट के साफ होते ही मन अध्यात्म की दिशा में रमने लगता है। पेट के आंतरिक जगत का बाह्य जगत से सीधा समीकरण बनने लगता है.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो इतने गहरे समीकरण के तहत मेरी बादलों पर नजर है। गहरी नजर है। बादल हैं कि बरस नहीं रहे हैं। पकौड़े के वियोग में मेरी आंखें हैं कि पथरा रही हैं। दिल है कि जार-जार पुकार रहा है। अरे, अत्याचारियो, बरस क्यों नहीं रहे हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जल से भरे हो, लेकिन पनियलपना दिखा रहे हो। क्यों आदमी और पकौड़ों के बीच आ रहे हो? आखिर इतने भरे मौसम में तुम्हें एक पकौड़ा पिपासु मनुष्य पर तरस नहीं आ रहा है? जरा-सा बरसोगे तो आत्मा का जिह्वा से मिलन हो जाएगा, तुम्हारा क्या जाएगा? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसी निष्ठुरता दिखा रहे हो। इतना सूखापन तुम्हें शोभा नहीं देता। आदिकाल में तो विरहिणी यक्षिणी के लिए घनघोर ‘मेघदूत’ हो गए थे। मध्यकाल में ‘तानसेन’ पर न्योछावर होकर रिमझिम तान छेड़ते थे। अब क्यों वियोगी को तरसा रहे हो? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई तुमसे झमाझम की मांग तो कर नहीं रहा हूं, बस इतना बरस जाओे कि कढ़ाई चढ़ सके, पकौड़े तल सकें, हम चटनी के संग निगल सकें। इतनी दयालुता तो ऑफ्टरआल होनी ही चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले प्रेमी जैसी तासीर रखते थे, अब क्यों पति जैसे निष्ठुर हो रहे हो? बीच में तुमने कब ये कलाबाजियां सीख लीं? पहले तुम बड़े कायदे से आते थे, कायदे से जाते थे, तरीके से बरसते थे, नफासत से खिसकते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े-बूढ़े तक तुम्हारे साथ इतनी बढ़िया ट्यूनिंग बिठाए थे कि तुम्हारा रंग बदला, इधर उन्होंने दालान से हांक लगाई, उधर कल्लू की अम्मा पकौड़े की प्लेट लिए दौड़ी चली आईं। मजाल है तुमने कभी निराश किया हो। खूब बरसते थे। इतना पानी-पानी कर देते थे कि फिर बब्बा-कक्का सालभर का कोटा पूरा कर लेते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब क्यों गुस्साए हो? तुम आ रहे हो, जा रहे हो, बस, भिगो नहीं रहे हो। पकौड़े से तुम्हारी निजी दुश्मनी हो गई है कि हमारी पीढ़ी से नाराज हो? बताते क्यों नहीं कि ग्रीनहाउस गैसों पर गरमा रहो हो। प्रकृति से खिलवाड़ पर खफा हो। जलती निगाहों से कटते जंगलों को घूर रहे हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माना कि आदमी के जंगलीपन से खफा हो, लेकिन मासूम पकौड़ों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, कुछ तो बताओ। धरतीपुत्र किसान तुम्हारी तरफ ताक रहे हैं। हैंडपंप पर बर्तनों के ढेर लगाए गरीब तुम्हें भांप रहे हैं। गरमी से हलाकान आदमी कांप रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माना कि सबका स्वार्थ है। मेरा स्वार्थ तो क्षुद्र है। तुम बरसोगे तो सौंधी-सी खुशबू आएगी। दोस्त मिलेंगे, परिवार बैठेंगे। मिलकर पकौड़े खाए जाएंगे तो संबंध हरियाएंगे। संबंध हरियाएंगे तो तुम्हारी आंखों से नेह बरसेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो मेह बाबा धरती पर हरियाले संबंध को देखने के लिए तुम्हारा बरसना उसी तरह जरूरी है, जिस तरह मेरा पकौड़े खाना। देखो निराश मत करना, बाबा बरस जाना, प्लीज.. पकौड़ों की खातिर..। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-490397699079793406?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/490397699079793406/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=490397699079793406' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/490397699079793406'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/490397699079793406'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='बादलो! पकौड़ा पिपासुओं पर तरस खाओ'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-Z_yeArcKdLg/TfBcVj_QDVI/AAAAAAAAAGU/QQH32bNdYAA/s72-c/clouds1_f.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-5865450700757216723</id><published>2011-05-20T15:51:00.000+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.602+05:30</updated><title type='text'>फैशन में आलोचना, इन दिनों..</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-gFPT29fpkhk/TdZAMWdNeiI/AAAAAAAAAGQ/8Zao0qOOxDo/s1600/obama.gifff.gif" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="256px" j8="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-gFPT29fpkhk/TdZAMWdNeiI/AAAAAAAAAGQ/8Zao0qOOxDo/s320/obama.gifff.gif" width="320px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;फैशन &lt;/strong&gt;के साथ एक सुभीता है बैठे-बिठाए कोई भी चीज कभी भी फैशन में पाई जा सकती है। या फैशन बताई जा सकती है। हो सकता है किसी दिन आप सोकर उठें और ओल्ड फैशन्ड पाएं जाएं। हो सकता है कोई आपके धारीदार पजामे पर आपत्तियां कर दे या व्यक्तित्व पर ही धारीदार कमेंट्स कस दे। कुछ भी हो सकता है। इन दिनों फैशन के तौर पर आलोचना करने की लहर चल रही है। हर चीज की बुराई करो। आज को कोसो। अतीत को अद्भुत बताओ। शहर को, देश को खराब बताओ। इस सम्मिलित प्रयास से अपना बुद्धिजीवी कद बढ़ाओ। तुर्रा ये कि फैशन के साथ नहीं चले तो पिछड़े कहलाएंगे। तो गुरु, यदि आप भी फैशनपरस्त होना चाहते हैं तो हर चीज में नुक्स निकालते हुए इस ‘बौद्घिक फैशन’ की अपनाने की शुरुआत कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे भले ही बचपन में आपके घर के पास बजबजाता नाला बहता हो लेकिन वर्तमान मोहल्ले में बहने वाली नाली पर उसकी महानता स्थापित करें। फिर सुताई के महाप्रयास से राष्ट्र को शिक्षा की पटरी पर लाने वाले शिक्षकों को आज के टीचरों से ज्यादा अनुभवी और राष्ट्र निर्माता साबित करें। ज्यादा जोश में आ जाएं तो मास्साबों की सुताई की शंटी को भी राष्ट्रीय धरोहर बता डालें। आपके ऊपर है कोई क्या कर लेगा? करे तो उसकी आलोचना शुरू कर दें। मामला सुलट जाएगा। खैर, आगे बढ़ें इसके बाद सुबह-दोपहर-शाम केवल कुटाई को सुधार का एकमात्र आधार मानने वाले कई श्रद्घेय बुजुर्गो को आज के बब्बा-कक्काओं से ज्यादा काबिल साबित करें। उनकी धाराप्रवाह गालियों में छुपे अर्थ बताते हुए उन्हें जीवन के लिए पथप्रदर्शक टाइप का घोषित करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चूंकि सभी आजकल फुलटाइम यही कर रहे हैं, सो हम भी करें। वैसे फैशन की बात निकली है तो विचार करते चलें कि फैशन मात्र कपड़ों के नए ट्रेंड को ही नहीं कहते, विचारों में आए उथले झोंके भी फैशन बन जाते हैं। फैशन बन जाते हैं तो अपनाने वाले अगड़े बन जाते हैं। तो आइए ,आलोचना के कई नए विषय और एंगल निकालते हुए काफी मात्रा में हम भी अगड़े बनें। पिछड़े होने से बचें, लगे हाथों अपना कद भी ऊंचा करें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सो, आगे इस बात पर बिना सांस लिए जोर दें कि जहां हमारे शहर की सीमा खत्म होती है वहां से बेहद भले-भोले लोग मिलते हैं। बस हमारे शहर का हाल बुरा है। यूंके पूरा आंचलिक एरिया ही सद्गुणों की खान टाइप का है। भले ही वहां अपराधों में कमी न हो या आधा शहर ही बाहर से आए लोगों से अटा पड़ा हो लेकिन सद्गुणीजन शहर में नहीं पाए जाते हैं। यही बात स्थापित करनी है। इसी में फैशनेबल होने की संभावना छुपी है। आगे फैशन में कुछ सदाबहार टाइप के ट्रेंड भी पाए जाते हैं। जिसमें प्रमुख है विदेशों की तुलना में अपने देश को पानी पी-पीकर कोसना। कुछ इस तरह ..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूं नो!, लास्ट मंथ अमेरिका गया था, दे आर रियली वैरी कंशस एबाउट देयर नेशनल प्राइड टाइप.. सामने वाला भी सुर में सुर मिलाता है। यदि वो भी एकाधा बार का विदेशयात्री निकल आया तो जुगलबंदी कुछ इस तरह की हो जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या यू आर राइट! दे आर रियली वेरी हॉनेस्ट एंड लॉ फियरिंग, ऐज कम्पेयर टू अस.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बातचीत में एक बार तक उस देश गया आदमी वहां की इतनी तारीफ कर देता है जैसे प्राइमरी वहां से ही पास किया हो। कई तो तो ऐसे भी निकल आते हेैं जिनका तो मात्र हवाई जहाज उस देश के एयरपोर्ट पर आधे घंटे रुका भर था। वो वहां की इतनी विशेषताएं बता सकने की स्थिति में होते हैं कि छोटा-मोटा एनसाइक्लोपीडिया तक छप जाए। इनसे भी खतरनाक फैशनपरस्त वे होते हैं जिनका तो केवल हवाई जहाज भर उस देश के ऊपर से गुजरा होता है। इनके भरोसे ही आलोचना की फैशन महामारी जैसी फैल पाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि भई हर तरह का फैशन खराब नहीं होता। बिना विचारे उसका पिछलग्गू होना गलत है। लेकिन हो सकता है इस तरह सलाह देने पर आप मेरी ही आलोचना शुरू कर दें। सो, मुझे बख्शें, आप लगे रहें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-5865450700757216723?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/5865450700757216723/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=5865450700757216723' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/5865450700757216723'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/5865450700757216723'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/05/blog-post_20.html' title='फैशन में आलोचना, इन दिनों..'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-gFPT29fpkhk/TdZAMWdNeiI/AAAAAAAAAGQ/8Zao0qOOxDo/s72-c/obama.gifff.gif' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-6520184268990561746</id><published>2011-05-18T16:37:00.000+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.603+05:30</updated><title type='text'>ये रूमाल फेंककर सीट छेंकने वाले</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-0mv_KE8jyBo/TdOoP76J2gI/AAAAAAAAAGM/MF0ckpj7ROg/s1600/busads19.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="148px" j8="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-0mv_KE8jyBo/TdOoP76J2gI/AAAAAAAAAGM/MF0ckpj7ROg/s200/busads19.jpg" width="200px" /&gt;&lt;/a&gt;रूमाल फेंककर सीट छेंकना भी एक कला है। किसी भी बस स्टैंड पर बस रुकते ही यूं सिर अंदर डाला, यूं जहां जगह खाली दिखाई दी वहां रूमाल दे मारा। सीट हमारी हो गई। गुरू! शानपत्ती नईं चाहिए। कोई दूसरा नहीं बैठ सकता है। अपुन ही बैठेगा यिहां। हो सकता है इस सबसे दूर आप पूछ ही बैठें, कैसा रूमाल! कैसी कला! भाई साब आप बात क्या कर रहे हैं? हमारे तो पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा है? तब हो सकता है कि मैं आपको बताऊं कि अरे! आपने कभी बस में सीट नहीं छेंकी क्या? गांव-कस्बों में बसों में बैठने के लिए मारामारी नहीं मचाई क्या? चार सवारियां उतर नहीं पातीं की पचास चढ़ने को तैयार। एक-दूसरे को रौंदते। मलीदा बनाते। ऐसे में खड़े होने की जगह ही नहीं &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;मिलती सीट मिलने की कौन कहे। बस यही वो जगह है जहां सीट हथियाने का ऐतिहासिक प्रश्न खड़ा हो जाता है। जैसा हमारे देश के सामने हर कभी, साल में सौ-डेढ सौ बार खड़ा हो जाता है। बिल्कुल उसी तरह। इसी स्थल पर खिलाड़ी बाहर आता है। जीतता है कलाकार। आम आदमी तो &lt;br /&gt;बस बाहर से इस कला को देखता रहता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस के बाहर से ही थोड़ा गुड़ीमुड़ी हुए...मुंडी खिड़की से अंदर डाली...बाज सरीखी नजरों से एकबार में &lt;br /&gt;ही पूरी बस के आंतरिक खोखलेपन का निरीक्षण किया और किसी खाली सी लगती सीट पर रूमाल दे मारा। हालांकि ये मामूली सा प्रयास नहीं है। &lt;br /&gt;रूमाल खाली सीट पर ही गिरे ... इस परिणाम के लिए नजरों और हाथों का जबर्दस्त तालमेल चाहिए। जिसमें दिमाग में गंजेड़ियों के समान एकाग्रता लगती है। तब इस कला का प्रथम चरण पूरा हो पाता है। फिर खुद को दूसरे चरण अर्थात् अंदर जाकर लड़ने के लिए तैयार किया जाता है। वहां कोई सायणा रूमाल के ऊपर ही बैठ मिलता है। फिर उससे अपने हक की लड़ाई लड़नी पड़ती है। कई बार तो कई इतने शातिर निकल आते हैं कि रूमाल पर बैठने की जगह उसे जेब में ही रख लेते हैं। सबूत ही जमींदोज कर देते हैं। आपके पट्टे को ही उखाड़ देते हैं। तब हक की लड़ाई काफी मात्रा में ऊंचाइयों की ओर चली जाती है। कई बार दूसरी सवारियां इस मालिकाना हक की लड़ाई के बीच पिस जाती हैं। बस लेट होती जाती है। तब हमेशा की तरह कोई भलामानुष अपनी सीट देकर सीज फायर करवाता है। लेकिन तब भी दोनों एक दूसरे को घूरते रहते हैं। पहला इसलिए कि साले अब तो बैठने की जगह मिल गई है, हमारा रूमाल तो लौटा दे। तो दूसरा इसलिए घूरता है कि साले कभी तो रूमाल धो लिया कर इतना गंदा रूमाल लेकर घूम रहा है। कह कोई कुछ नहीं पाता है। बस चल देती है। पर्याप्त मशक्कत के बाद मिली सीट भी सुकून इसलिए नहीं दे पाती है कि लड़ाई-झगड़े की इस कवायद के बीच मंजिल आ जाती है या कई बार तो कब निकल जाती है पता ही नहीं चलता ... ! आम &lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;लोग तो फिर भी मंजिल आने पर रूमाल कथा भूल जाते हैं। अपनी राह चल देते हैं। लेकिन उनका क्या जो दशकों से देश की किस्मत पर अपना &lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;रूमाल डालकर ठसके से बैठे हैं। इनमें से कई की देश को खोखला करने के अलावा कोई मंजिल भी नहीं है। इनने तो फिर भी कभी रूमाल डालने की मेहनत तो की थी, कई तो बिना रूमाल डाले भी कुर्सियों पर कब्जा जमाए बैठे हैं। वो आखिर कब खाली करेंगे सीटें !&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-0mv_KE8jyBo/TdOoP76J2gI/AAAAAAAAAGM/MF0ckpj7ROg/s1600/busads19.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-6520184268990561746?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/6520184268990561746/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=6520184268990561746' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/6520184268990561746'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/6520184268990561746'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/05/blog-post_18.html' title='ये रूमाल फेंककर सीट छेंकने वाले'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-0mv_KE8jyBo/TdOoP76J2gI/AAAAAAAAAGM/MF0ckpj7ROg/s72-c/busads19.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-2315032768666401023</id><published>2011-05-14T18:13:00.000+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.604+05:30</updated><title type='text'>नागिन डांस पर झूमती ठसकेदार बारात</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test; font-size: 16px; line-height: 19px;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-T8PxE5z55LQ/Tc546ngaFoI/AAAAAAAAAGI/AKpFcWCGuk8/s1600/shaadi11_f.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" src="http://4.bp.blogspot.com/-T8PxE5z55LQ/Tc546ngaFoI/AAAAAAAAAGI/AKpFcWCGuk8/s200/shaadi11_f.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;&lt;b&gt;एक ठसकेदार&lt;/b&gt;&amp;nbsp;बारात कैसी होती है, मेरे इस आंखों देखे हाल से जान लीजिए.. हमारे एक मित्र के बड़े भाई की शादी थी।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;महीनों पहले उन लोगों को छांटा जाने लगा था, जो भयंकर रूप से बरातिया नंगाई मचा सकें, ताकि बारात के किस्से किंवदंतियों के रूप से स्थानीय समाज में सुनाए जा सकें। विशेषताओं से युक्त बारात भी एक बार जनवासे में पहुंचने के साथ ही दायित्वों के अंतर्गत ‘कला’ का प्रदर्शन शुरू कर देती है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;कोई एक साफ चादर से जूते पोंछकर उन्हें पॉलिश करवाने जाएगा। दूसरा कोई जो नऊए की कुर्सी पर बैठता है तो दाढ़ी-चंपी-बाल सेट करवाने के बाद फिर बदन की मालिश, फिर अंगुलियां चटकवाएगा। इससे भी जी न भरा तो उसका पाउडर उठाकर शरीर के वृहत हिस्सों में छिड़केगा।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;तत्पश्चात अपने परमप्रिय मित्र के आने के बाद ही सीट छोड़ेगा। सीट छोड़ते ही प्रेस वाले की छाती पर पांच सूट लेकर सवार हो जाएगा, क्रीजें बनवाएगा, बनियान तक पे प्रेस करवा मारेगा। चड्डी चूंकि एक ही है इसलिए उसे छोड़ दिया जाता है, अन्यथा तो तौलिए और मोजे तक प्रेस करवा लिए जाते हैं।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;‘अरे भाई बाराती हैं’ इस भावना को सदैव मन में धारण रखते हैं। इसी बीच कोई दो वरिष्ठ वहां जाते ही पसर जाएंगे, नींद निकालना शुरू कर देंगे, जो फिर बारात के लगने के बाद घरातियों के उठाने पर ही तैयार होने जाएंगे। उनके कारण अगर बारात लेट नहीं हुई तो मानेंगे कि अब उनमें पहले वाली बात नहीं रही।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;इस बीच नीचे भी कम उत्पात नहीं चल रहा होता है, वहां आधे तो बैंडबाजे वालों से, कुछ आसपास के लोगों से लड़ने का एक राउंड पूरा कर चुके होते हैं। बचे हुए आपस में ही भिड़कर ये शौक पूरा कर लेते हैं।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;डांस आदि तक में इतने हाथ-पांव फटकारे जाते हैं कि तीसरी मंजिल से देख रहा आम आदमी तक बता देता है कि बारात किसी ठसकेदार की ही है। नाग-नागिन डांस पर इतनी देर तक कोई दो फड़फड़ाते हैं कि उन्हें घायलावस्था में छोड़कर बारात आगे बढ़ जाती है। बाद में किसी नाली आदि में गिरने से बाद ही इस डांस का समापन होता है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;इतने में कोई दूसरा उनकी जगह नाग-नागिन डांस का अखंड क्रम जारी रखता है। इसी बीच भयंकर आवाजों के साथ ये देश है वीर जवानों का वाली स्पेशल भांगड़ा पार्टी कूदी मारती है। इस डांस में रिश्तेदारों में से बुजुर्गो को जरूर ही घसीटा जाता है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;उन्हीं में से फिर कोई एक बैंडबाजे वालों का वाद्य छीनकर ऐसी औकात पर उतरता है कि चारों ओर त्राहि-त्राहि मच जाती है। अक्सर इस शख्स का एपिसोड जेब के सारे रुपए खुद और दूसरों पर न्यौछावर कर देने के पश्चात पत्नी द्वारा सार्वजनिक बेइज्जती के क्रम में ही समाप्त होता है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;अत्यंत विचार-विमर्श के बाद इस शख्स को सारे मामले की जड़ में लड़कीवाले ही दिखाई देते हैं। अत: वो हर घराती को हड़काता है, हर बात में टांग अड़ाता है। उसे रोकने के लिए घराती सबसे बहरे बुजुर्ग को लगा देते हैं, जो निरंतर भाई साब-भाई साब करके उनकी बात सुनता रहता है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;इस तरह बारात विदा होने तक लड़कीवालों की छाती पर इतना मूंग दल दिया जाता है कि उसे गरीबों में बांट दिया जाए तो एक महीने तक उन्हें खाने में कम से कम दाल की चिंता नहीं करनी पड़े।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;"&gt;हालांकि यदि कभी ऐसा हो भी गया तो उस मूंग को भी गरीबों में नहीं बांटने दिया जाएगा, बल्कि उसमें गाजर मिलाकर हलुआ बनाने की फरमाइश रख दी जाएगी। काए.? भिया, ठसकेदार बाराती जो हैं, ऐसे ही थोड़ी मान जाएंगे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-2315032768666401023?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/2315032768666401023/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=2315032768666401023' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/2315032768666401023'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/2315032768666401023'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='नागिन डांस पर झूमती ठसकेदार बारात'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-T8PxE5z55LQ/Tc546ngaFoI/AAAAAAAAAGI/AKpFcWCGuk8/s72-c/shaadi11_f.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-8131283012751891731</id><published>2011-04-29T16:11:00.000+05:30</published><updated>2011-04-29T16:11:12.483+05:30</updated><title type='text'>सियासी बरनी में रखा शब्दावली का भ्रष्ट अचार...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-mDWK5VmqY1c/TbqVsbwn_DI/AAAAAAAAAGE/Q_eqqLeJ_P4/s1600/%25E0%25A4%25AD%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%25B7%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%259F%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%259A%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B0.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320px" j8="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-mDWK5VmqY1c/TbqVsbwn_DI/AAAAAAAAAGE/Q_eqqLeJ_P4/s320/%25E0%25A4%25AD%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%25B7%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%259F%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%259A%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B0.jpg" width="219px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;भ्रष्टाचार, घोटाला, घपला, गबन.... ऊंचाइयों को जाते इसी तरह के कई शब्दों को नमन करने के पश्चात्। इन शब्दों को आजकल जैसा सम्मान मिल रहा है उसे देखते हुए मुझे लग रहा है कि इनकी पुरानी परिभाषा से अब काम नहीं चलेगा, इनकी नए सिरे से व्याख्या होनी चाहिए। मैंने तो कर भी दी है। आप भी देखिए। उचित लगे तो राजभाषा आयोग वगैरहा को सिफारिश कीजिए ताकी वे इसे किसी शब्दावली पुस्तिका में उचित स्थान दिलाएं। तो पहले मेरी मेहनत पर नजर डालिए, फिर मुझे पता है सिफारिश तो आप कर ही देंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1.लालफीताशाही-- अध्यात्म को समर्पित एक सरकारी अभियान, जिसमें निष्काम भक्ति जोर होता है। मनुष्य कर्म कर अपनी फाइल विभागरूपी बैकुंठ को समर्पित कर अधिकारियों की भक्ति में लग जाए। भक्ति करने की दीर्घकालिक शक्ति रही तो फल जरूर मिलेगा। अन्य़था इस भाग-दौड़ के बीच जब पाप करने का समय ही नहीं मिलेगा तब मोक्ष तो निश्चित है ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2.भ्रष्टाचार- (भ्रष्ट+अचार) ज्यादातर सरकारी बरनी में पनपने वाला खास अचार। जनता से निकाले तेल से ही अचार को फफूंदी से बचाया जाता है। सत्ता तंत्र के लिए आरक्षित इस आचार का स्वाद जनता को नहीं लगने दिया जाता है। इसी दृढ़ संकल्प के रहते अचार की दीर्घायु सुनिश्चित हुई है। हालांकि देश का खुशफहमी है कि जब कभी रामराज्य आएगा तो आचरण में भ्रष्टता के अभाव में अचार खुद अपने ही तेल में कूदकर आत्महत्या कर लेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3.हड़ताल- विभागों में पसरी रूटीन बोरियत मिटाने और एक्साइटमेंट ढूंढने के लिए कर्मियों द्वारा किया जाने वाला सामूहिक प्रयास। इंकलाब जिंदाबाद..., तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं..., हर जोर जुलम की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है..., आदि की सहायता से किए जाने वाले इस प्रयास में कई बार सफलता हाथ लगने पर जिम्मेदारी औऱ काम बढ़ जाता है। जिससे निजात पाने के लिए एक बार फिर उपरोक्त सामूहिक प्रयास दोहराया जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4.गबन --सरकार का बोझ हल्का करना। जब किसी विभाग के पास पैसे या सामान रखने को जगह न बचे तो उसे विनम्रतापूर्वक आपने पास रख लेना अर्थात् घर को ही सरकारी स्टोररूम बना देना। ऊपर से बड़प्पन की भावना दिखाते हुए किसी से इसका जिक्र भी न करना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5.रिश्वत- रुपए की रस्सी से जुड़ने वाला निष्पाप रिश्ता। जिसमें संबंधों की इतनी ऊंचाई या गहराई वगैरह-वगैरह होती है जिससे वशीभूत होकर इससे जुड़ा हर कर्मचारी हर कीमत पर संबंध निभाने पर उतारू हो जाते हैं। बरसों के अटके काम बेखटके करवाने का लोकतांत्रिक देशों में प्रचलित सबसे व्यापक तरीका। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6.घपला--दिमाग के अटाले से निकला ऐसा घोटाला जिससे सरकारी धन का सुप्रयोग किया जा सके। इस आर्थिक प्रबंधन से भारी मात्रा में पारिवारिक कल्याण कार्य किए जा सकते हैं। फंस जाने की स्थिति में इसी सुप्रबंधन के माध्यम से बचाव का रास्ता भी निकाला जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;7.लापरवाही-- विभागों में फाइल समझते-समझते आने वाली रूटीन थकान। इस थकान के चलते काम को अगले दिन के लिए टाल दिया जाता है। फिर अगले दिन नए सिरे से काम समझने की कवायद में ज्यादा थकान आ जाती है। जब यह समस्या असाध्य हो जाती है तब मजबूर कर्मचारी इस बीमारी के कारण अपने रूटीन काम पर ज्यादा ध्यान नहीं लगा पाता है बस। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;8.अवकाश- कर्मचारियों द्वारा आगे की छुट्टियों प्लानिंग करने के लिए ली जाने वाली एक दिन की छुट्टी। राष्ट्रीय अवकाश अर्थात् सरकार की राष्ट्रीय दयालुता यानी घरेलू पेंडिंग कार्यों को निपटाने के लिए सरकार की ओर से पहले से नियत किया गया दिन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;9. ट्रांसफर - सरकार का भारी उद्योग। बिना कच्चा माल लगाए भारी पैमाने पर लाभ प्राप्त करने का प्रयास। &lt;br /&gt;वितरण से प्राप्त पूरा लाभ बीच की छीजत में खप जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-8131283012751891731?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/8131283012751891731/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=8131283012751891731' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/8131283012751891731'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/8131283012751891731'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/04/blog-post_29.html' title='सियासी बरनी में रखा शब्दावली का भ्रष्ट अचार...'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-mDWK5VmqY1c/TbqVsbwn_DI/AAAAAAAAAGE/Q_eqqLeJ_P4/s72-c/%25E0%25A4%25AD%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%25B7%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%259F%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%259A%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B0.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-7685993918315310877</id><published>2011-04-25T12:45:00.000+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.605+05:30</updated><title type='text'>गाड़ी में पेट्रोल तो लांग ड्राइव पर प्यार</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-Gd5Q-S-kXFU/TbUfZb495_I/AAAAAAAAAGA/3afyVbUQeeg/s1600/couple.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="266px" i8="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-Gd5Q-S-kXFU/TbUfZb495_I/AAAAAAAAAGA/3afyVbUQeeg/s400/couple.jpg" width="400px" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;जटिल शिक्षण व्यवस्था को सरल करने में प्यार की ताकत का अद्भुत इस्तेमाल किया जा सकता है। देखिए तो कैसे..!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने अथक प्रयास किया तो प्यार हो गया। जेब भरी रही तो प्यार कुलांचे मारता रहा। गाड़ी में पेट्रोल रहा तो प्यार लांग ड्राइव पर भी जाता रहा। रेस्तरां में फ्रेंड सर्किल से भी इंट्रोडच्यूस करवाया जाता रहा। आजकल वे कुछ उदास हैं। घर से मनीऑर्डर नहीं आया है। प्यार में जरूरतें कुछ बढ़ जाती हैं। घरवालों को फीस-किताबों के आगे दुनियादारी का ज्ञान नहीं है। उन्हें घातक रूप से यह बात स्पष्ट हो गई। तो वे फिलहाल चिंतातुर हैं। प्यार की आर्थिकी से पुराने जमाने के लोग इतने अपरिचित क्यों हैं? शायद यही जेनरेशन गैप है। चलो, एक तथ्य तो स्पष्ट हुआ। पहले तो इसे सिर्फ पढ़ और बोल ही रहे थे। शिक्षा प्रणाली में इतनी अव्यावहारिकता क्यों है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर, जरा-सा अनुभव आंखें खोल देता है। उधर, बड़ी-बड़ी किताबें पढ़कर भी अज्ञानता जाती नहीं है। किताबें लिखने वाले प्रेमिल नहीं होते क्या? या जब तक पुस्तकें लिखते हैं प्रेम-व्रेम से दूर रहते हैं! हां, यही कारण होगा तभी तो शिक्षा की किताबें इतनी शुष्क भाषा में लिखी जाती हैं। ओ.हो.. कितनी-कितनी महान थ्योरी का प्रतिपादन कर दिया है उन्होंने। टेक्स्ट बुक इतनी ऊबाऊ इसलिए हैं कि उनमें निजी अनुभव की मात्रा बेहद कम होती है, कोरा कागजी ज्ञान होता है, जीवन के लिए अनुपयोगी। लो जी, हम समझ गए। ये इतने विद्वान क्यों नहीं समझते? जब ‘वे’ संग होती हैं तो कितनी आसानी से दुनियादारी की बातें सिखा देती हैं। उनके भेजे में भी कितनी सरलता से सब घुस जाता है। वे एकाएक खुद को कितना जिम्मेदार समझने लगते हैं। ‘वे’ कितनी सहज भाषा-शैली और आमफहम शब्दों में कॅरियर, जिम्मेदारी, फिजूलखर्ची जैसे विषयों को समझ में आने लायक बना देती हैं। क्लास में तो वे आज तक बैलेंसशीट बनाना तक नहीं सीख पाए। जिम्मेदार बनाने के लिए पिताजी बचपन से सिखा रहे हैं, आज तक समझ नहीं पाए कि बचत किस चिड़िया का नाम है। अहा.. प्यार कितना संवेदनशील होता है। इस संवेदना की ताकत का इस्तेमाल कोर्स की किताबें लिखने में क्यों नहीं किया जा सकता है? यूं भी देख लो, प्यार में धन का अभाव समाजवाद के सिद्धांतों को समझाने में कितना उपयोगी है। उनके नाराज होते ही व्यक्ति कैसे एक क्षण में ‘सर्वहारा’ हो जाता है। दोस्तों के सहयोग से उन दिनों में ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ कैसे फलती-फूलती है, बड़ी आसानी से यह बात स्पष्ट की जा सकती है। गिफ्ट आदि देने के दिनों में वे मजबूरियां समझ आ जाती हैं, जिनमें कोई ‘राष्ट्र’ वर्ल्ड बैंक या किसी भी अन्य आर्थिक संस्था से उसकी शर्तो पर कर्जा ले लेता है? उनकी निकटतम सहेली का ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ क्यों प्यार की फसल को लहलहाए रखने के लिए जिम्मेदार होता है? प्यार के रास्ते की पास-पड़ोस की बाधाएं दूर रखने के लिए दोस्तरूपी ‘समर्थकों’ की क्यों जरूरत होती है? वे क्या परिस्थितियां होती हैं, जिनमें कोई कल्याणकारी योजना अपने लक्ष्य उर्फ शादी तक नहीं पहुंच पाती है? किस तरह की व्यवस्था में एक बुरी मुद्रा एक अच्छे लड़के को चलन से बाहर कर देती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरा विचार चल ही रहा था कि एकाएक उनकी विचार श्रंखला घंटी की आवाज से टूटी। पोस्टमैन मनीआर्डर दे गया। उन्होंने भी तत्काल मोबाइल लगाकर फिर रेस्टोरेंट में मिलने का प्लान फिक्स किया। पैसे के अभाव में चिंतनशील जिम्मेदार दिखती सरकार, पैसा मिलते ही गैरजिम्मेदार क्यों नजर आने लगती है, इस उदाहरण से भाई साब, एक और जटिल तथ्य क्लास में स्पष्ट किया जा सकता है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-7685993918315310877?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/7685993918315310877/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=7685993918315310877' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/7685993918315310877'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/7685993918315310877'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='गाड़ी में पेट्रोल तो लांग ड्राइव पर प्यार'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-Gd5Q-S-kXFU/TbUfZb495_I/AAAAAAAAAGA/3afyVbUQeeg/s72-c/couple.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-4271193174537956568</id><published>2011-03-31T14:47:00.001+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.607+05:30</updated><title type='text'>किस्सा पुराना सही पर सबक नया है</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-d5DUPOOIzMY/TZRG2MqLdkI/AAAAAAAAAF4/1q3DB-pAB5o/s1600/tor.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="202" r6="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-d5DUPOOIzMY/TZRG2MqLdkI/AAAAAAAAAF4/1q3DB-pAB5o/s320/tor.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;देखिए तो जरा, पुरानी नैतिक कथाएं मॉडर्न जीवन को कैसे प्रेरित कर रही हैं। &lt;br /&gt;कथा - एक : एक महात्मा निरंतर एक नदी पर नहाने जाते थे। एक दिन जैसे ही वे नदी में उतरने लगे, तभी उन्होंने देखा कि एक बिच्छू नदी में डूब रहा है। वे उसे उठाकर किनारे रखने की कोशिश करने लगे। बिच्छू ने उन्हें डंक मार दिया। हाथ कांपा तो बिच्छू पानी में गिर पड़ा। उन्होंने फिर उसे उठाकर किनारे रखने की कोशिश की, फिर बिच्छू ने डंक मारा और पानी में गिर पड़ा। ऐसा तीन बार हुआ। तभी पास में ही पानी भर रही एक सुंदरी, जो यह सब देख रही थी, ने पूछा - वो बिच्छू बार-बार आपको डंक मार रहा है और आप उसे पानी में से निकालने में लगे हैं? महात्मा ने कहा, जब वो बिच्छू होकर अपनी आदत नहीं छोड़ रहा तो मैं भलाई का स्वभाव कैसे छोड़ दूं? इस पर सुंदरी ने रीझकर महात्मा से शादी कर ली थी। महात्माजी ने घर में ही बाल्टी भरकर नहाना शुरू कर दिया।बिच्छू को स्वर्ग मिला हो या न मिला हो, महात्माजी को जीते-जागते स्वर्ग जरूर मिल गया। &lt;br /&gt;सबक : हर वरदान के लिए घोर तपस्या जरूरी नहीं, कई फल केवल व्यावहारिकता के दम पर ही मिल सकते हैं। &lt;br /&gt;कथा - दो : आधुनिक काल में गुरु के आदेश पर शिष्य खेत की ओर चला। वहां जाकर देखता है कि खेत में पानी देने वाली नहर टूटी पड़ी है। खेत में पानी भर रहा है। उसने आसपास देखा। टूटे हिस्से को भरने के लिए उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया। इस पर तीक्ष्ण बुद्धि वाले शिष्य ने नहर को दूसरी ओर से भी तोड़ दिया। पानी पड़ोसियों के खेत में भरने लगा। फिर अपने खेतों में जाकर टूटे हिस्से में खुद लेट गया। जब ऋषि बाकी शिष्य मंडली सहित वहां पहुंचे तो इतना मार्मिक दृश्य देखकर उन्होंने गुरुभक्त शिष्य को स्वर्ग का अधिपति बनने का वरदान दे दिया। जिन पड़ोसियों के खेतों में पानी भरा था, बाद में उन्हें शिष्य ने स्वर्ग के गेट पर चौकीदार रख लिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबक : किसी भी तरह के आदेश का पालन केवल आंखें मूंदकर करेंगे तो कभी परम पद प्राप्त नहीं कर पाएंगे। &lt;br /&gt;कथा - तीन : सड़क के बीचों-बीच एक नुकीला पत्थर पड़ा हुआ था। लोग निकलते। ठोकर खाते। गाली देते हुए आगे निकल जाते। पास ही चबूतरे पर एक साधक बैठे हुए थे। ठोकर खाकर आगे जाते आदमी को वे रोकते। गालियां देने के लिए धिक्कारते। क्रोध करने के लिए फटकारते। पत्थर को दूसरों के लिए उखाड़कर नहीं फेंकने के स्वार्थीपने पर प्रताड़ते। कुल मिलाकर उसे पास बैठाकर काफी देर तक समझाते। व्यक्ति नई अनुभूति के साथ वहां से जाता। कुछ बरस इसी में बीते। पत्थर आज भी वहीं हैं। साधक ख्यातिप्राप्त महात्मा हो चुके हैं। कई बार अपने स्वर्ग जैसे तीन मंजिला भवन की खिड़की से उस पत्थर को गौर से देखते हैं। इन पलों में उनके शिष्य गुरु के चेहरे के आध्यात्मिक भाव देख निहाल हो जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबक : यदि लोग ठोकर नहीं खाएंगे तो गुरु की शरण में कैसे आएंगे? रास्ते में पत्थर बिछाते रहें, चेलों की संख्या बढ़ती जाएगी। &lt;br /&gt;अंतिम कथा : इस बार भी कछुआ रफ्तार के मुकाबले में खरगोश को पछाड़ फिनिशिंग लाइन तक पहले पहुंचा। खरगोश बिना घबराए वहां पहुंचा। ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन कर तेज दौड़ने के आरोप में कछुए का चालान करा दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबक: ऊंची सेटिंग और संपर्क हों तो किसी भी तरह की परीक्षा से पहले निश्चिंत होकर सोया जा सकता है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-4271193174537956568?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/4271193174537956568/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=4271193174537956568' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/4271193174537956568'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/4271193174537956568'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/03/blog-post_31.html' title='किस्सा पुराना सही पर सबक नया है'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-d5DUPOOIzMY/TZRG2MqLdkI/AAAAAAAAAF4/1q3DB-pAB5o/s72-c/tor.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-9053446953007158519</id><published>2011-03-22T18:46:00.002+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.608+05:30</updated><title type='text'>परमार्थ के लिए हारते हैं हम, समझे!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh5.googleusercontent.com/-cfelaJ2k4NI/TYiivv7WsnI/AAAAAAAAAFw/tmm1xFx-7zk/s1600/dhoni1_f.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" r6="true" src="https://lh5.googleusercontent.com/-cfelaJ2k4NI/TYiivv7WsnI/AAAAAAAAAFw/tmm1xFx-7zk/s200/dhoni1_f.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;h1 class="fs140"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;लो साहब, अगर-मगर के साथ हम दक्षिण अफ्रीका से हार गए। इससे पहले इंग्लैंड से भी बमुश्किल टाई करवा पाए थे। हमारे वल्र्डकप अभियान की ऐसी दशा देख देश हाय-हाय कर रहा है। दिनभर टीम को जिताने के लिए टीवी के सामने जुटे रहने का ये सिला। देशवासी गम के समंदर में डूब-उतरा रहे हैं। खिलाड़ी तो फिर भी नए एड, कुछ रियलिटी शो, एकाधा फैशन शो में रैंप पर चलने जैसा कुछ करके अपने गम भुलाएंगे। लेकिन देशवासी फालतू के चिंतन में लगातार जुटे रहेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम खिलाड़ियों से सीख नहीं लेंगे, जो हारने के कुछ देर बाद ही भूल जाते हैं। हार की पीड़ा को सीने से चिपकाए गली-चौराहे, पान की दुकानों पर चर्चान्वित नहीं रहते। लेकिन भिया मेरा तो मानना है कि हमें हार से इतर खेल भावना पर विचार करना चाहिए। हमारे खिलाड़ी परमार्थ की कैसी जबर्दस्त भावना दिखाते हैं। बैटिंग करते समय सोचते हैं, ले भाई, तेरी खुशी मेरे जल्दी आउट होने में है तो कर ले मुझे आउट। खुश? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गेंद भी तो पता नहीं सामने वाले कितनी तेज फेंकते हैं। हाथ की हड्डियां जाने कहां से ऑर्डर देकर बनवाते हैं। हम तो पता नहीं इतनी तेज गेंदें फेंक दें, तो चौथे ओवर के बाद ठीक से स्ट्रेचर पर भी लेट पाएंगे कि नहीं। उधर, मैदान में खिलाड़ी प्रायोजकों की अपेक्षाओं की चिंता करता रहता है। इसके बावजूद भावना देखिए हमारे वालों की, सारा जोर सामने वाले को खुश रखने में लगाए रहते हैं। खिलाड़ियों की विनम्रता भी देखिए आप, मजाल है कि कभी इस बात का एहसान जताएं। आपके ज्यादा जोर देने पर ही पिच पर दोष लगाना शुरू करते हैं कि नहीं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्यादा पूछने पर ही तो कोच पर आरोप मढ़ते हैं कि नहीं? बहुत ज्यादा ही सवाल किए जाते हैं तभी न सही बताते हैं कि क्या करें वो शॉर्ट पिच डाल रहा था, उसकी मेहनत का सम्मान तो करना ही था। फील्डर भी कुछ ज्यादा ही जुझारू दिख रहा था। मैदान पर लोट-लोटकर बॉल रोक रहा था। कई बार समझाया भी कि क्यों भाई ऐसा क्या कि जान देते पड़े हो, पैंट भी नया बनवाया दिखता है, लेकिन इतने समझाने का असर भी नहीं, तो क्या करें, मजबूरी में उसका भी सम्मान रखना पड़ा। ऐसे शॉट लगाने पड़े कि उसे गेंदों के लिए मैदान पर भूलुंठित होने की जरूरत ही ना पड़े, सारे शॉट सीधे उसके हाथ में जाएं। उसका सम्मान न करें, रन बनाएं, ऐसा हमसे न हो पाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही सामनेवालों की बल्लेबाजी के दौरान हम नितांत दार्शनिक हो जाते हैं। शत्रुपक्ष का समझकर भी तेरी तरफ मित्रवत् गेंद फेंकी है, जैसा भाव रखते हैं। (हालांकि जोर तो पूरा लगाया था, इससे ज्यादा तेज गई ही नहीं) फिर गेंद फेंक दी है, तू कर ले मनमानी, जैसी उदारता भी रखते हैं। अब सामने वाला निर्ममता से प्रहार करता रहता है, तो क्या करें। कई बार धीरे से उसके पास जाकर समझाते भी हैं, अब बस कर रे, हमारी आईपीएल की टीम में आने के लिए इतना ही काफी है। लेकिन कई बार हमारी अंग्रेजी या उसकी श्रवण शक्ति कमजोर होने के कारण यह बात वो ठीक-ठाक तरीके से शायद समझ नहीं पाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh5.googleusercontent.com/-jrneQIy4JVA/TYig1ArUTOI/AAAAAAAAAFs/h7AF2MHsXv4/s1600/dhoni1_f.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;हम तो पूरे प्रयास करते हैं, अब हमारी किस्मत से वो बहरा निकल आया, क्या करें जी। इतने महंगे पैंट क्या बॉल घिसने या जमीन पर लोटने के लिए बनवाए हैं? अब क्या वर्ल्डकप के लेवल पर आकर भी गंवारों जैसे जमीन पर कूदते रहें? नईं, आप ही बताओ? अरे, वो बात अलग थी, जब देश की टीम में आना था। पैंट सस्ता था, इच्छाशक्ति मजबूत थी। अब क्या यहां आकर भी गंवारूपना करते दिखें? टीवी पर ये सब करते अच्छा नहीं लगता भिया। तो इस तरह से इतने गहन दर्शन के तहत हमारे वाले उन्हें जिता देते हैं। आप फिजूल में टीम की हार के गम में गलते रहते हो। &lt;/span&gt;&lt;/h1&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-9053446953007158519?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/9053446953007158519/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=9053446953007158519' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/9053446953007158519'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/9053446953007158519'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='परमार्थ के लिए हारते हैं हम, समझे!'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='https://lh5.googleusercontent.com/-cfelaJ2k4NI/TYiivv7WsnI/AAAAAAAAAFw/tmm1xFx-7zk/s72-c/dhoni1_f.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-9045258916474092691</id><published>2011-02-14T17:55:00.001+05:30</published><updated>2011-02-19T17:03:26.896+05:30</updated><title type='text'>पैसेंजर दुखहरण पुस्तिका के कुछ सूत्र</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-9iWi1e4wUzg/TV-qaH4zGPI/AAAAAAAAAFo/j-3WgeRH4mI/s1600/train.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" j6="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-9iWi1e4wUzg/TV-qaH4zGPI/AAAAAAAAAFo/j-3WgeRH4mI/s320/train.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;आपने रेलवे स्टेशन पर टीसी से बर्थ की जुगाड़ लगाने वाले दृश्य जरूर देखे होंगे। हममें से अधिकांश का इससे वास्ता भी पड़ा होगा। हम तो अपने दोस्तों के साथ इस सीन के नियमित पात्र रहे हैं। सो, टीसी से निपटने के लिए हम बड़े रोचक प्लान बनाते थे। आज गाहे-बगाहे सब याद आ ही जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम सभी इस पर एकमत थे कि संसार भर के टीसी और उससे बर्थ की व्यवस्था में लगे लोगों की भाषा एक ही होती है। टीसी इस दौरान ‘ट्रेन फुल है, सिर पर बिठाकर ले जाऊं’ टाइप की घुड़कियां देता है। हम सोचते थे, क्यों न हमारी तरह के यात्रियों के लिए एकाध ‘पैसेंजर दुखहरण पुस्तिका’ ही छपवा ली जाए, जो बिके भी रेलवे स्टेशनों पर। जिसमें इस दृश्य के बाद कुछ इस तरह का हौसला दिया जाए कि इन हालात से न डरें, न शरमाएं। हर किस्म का टीसी आपके दम पर ही अपना रोज का कोटा पूरा करता है। सो देर-सवेर आपको बर्थ देगा ही। उसे लगातार घेरे रहें। मिन्नतें करते रहें। कभी भी टीसी को डराने की कोशिश न करें। उसे किसी की धौंसपट्टी न दें। आप वीआईपी भी हों तो ऐसी स्थिति में उससे इन बातों का जिक्र न करें। फिजूल में ही आपको देने वाली सीट किसी और के पल्ले बांध देगा। ज्यादा धमकाएंगे तो वो आपसे नियम-कायदों की बात करने लगेगा। ध्यान रखें कि आपका उद्देश्य बर्थ पर पसरकर सोना है। हालांकि इस विचार मात्र से विनम्रता स्वत: आ जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे पुस्तिका में कुछ बारीक मुद्दों पर विचार होता। जैसे आइए ठंडा पीते हैं, चाय लेंगे क्या? जरा हटकर बातें करते हैं! एक बार सुनिए तो भाई साब! जैसी बातें नहीं की जानी चाहिए। अन्यथा वो ‘ऑनेस्ट मैन ऑफ द ईयर’ टाइप की कोई चीज हो जाएगा। सो इन बातों में टाइम खोटी न करें। लगातार उसे ताड़ते रहें। घातक वार करने के लिए धैर्य रखें। इस दौरान लानत वाला मुंह बनाना आता है, तो अतिरिक्त उपयोगी। भाई साब, सिस्टर की एंगेजमेंट है। चाचा भर्ती हैं, एमर्जेसी है सर, टाइप की बातों के बाद लगातार उसके आसपास मंडराएं। उसे निरंतर दिखाएं कि आप उस पर नजर रखे हैं। ट्रेन में उसके साथ दाखिल हो जाएं। यदि वह कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखा रहा तो डरें नहीं, आपको सीट जरूर देगा। अन्यथा पहले ही आपको ट्रेन में बिना रिजर्वेशन चढ़ने पर भाषण सुना देता। ऐसे सिग्नलों पर भी चिंतन होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर उसमें कुछ फॉमरूले भी होते। जैसे ट्रेन में चढ़ने से पहले नोट चिल्लर करवाकर रखें। अन्यथा जब मोल-तोल चलेगी तो छुट्टा नहीं होगा और बड़े नोट अनावश्यक शहीद हो जाएंगे। और हां, यदि कोई टीसी आपको बचे पैसे लौटा रहा है तो तत्काल समझ जाइए कि या तो नौकरी में नया आया है या कच्च खिलाड़ी है। आगे कुछ घपला जरूर होगा। तो जाते ही अपनी सीट पर पसरकर सो जाइए। किसी के भी चिल्लाने पर उठिए मत। कोई कुछ ज्यादा कहे तो बताइए कि बीमार हूं, नींद की गोलियां लेकर सोता हूं। बार-बार सीट पर लुढ़किए। नींद में होने का नाटक कीजिए। कई यात्री बड़े मानवीय होते हैं। दया करसीट बख्श देते हैं। कभी ऐसे हालात आ जाएं तो परिवार के लड़कों से बात न करें। हमेशा बुजुर्गो की ओर देखकर जवाब दीजिए। दवा निकाल-निकालकर आंखों के सामने लहराते रहिए। बीमारी की धमकी दीजिए। अपना टिकट सही होने की बात कीजिए। इस बात के दौरान आपका आत्मविश्वास जबर्दस्त होना चाहिए। कई बार कॉन्फिडेंस के भरोसे ही काम चल जाता है। हमारा चला है। आपका चले तो हमें एक बार पुस्तिका छपवाने का हौसला जरूर दीजिए। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-9045258916474092691?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/9045258916474092691/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=9045258916474092691' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/9045258916474092691'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/9045258916474092691'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='पैसेंजर दुखहरण पुस्तिका के कुछ सूत्र'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-9iWi1e4wUzg/TV-qaH4zGPI/AAAAAAAAAFo/j-3WgeRH4mI/s72-c/train.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-3245390185105806632</id><published>2010-12-29T13:13:00.000+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.609+05:30</updated><title type='text'>एक कस्बाई का फिल्म प्रेम</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2buA3x5aEzA/TRrmcRxiSkI/AAAAAAAAAFY/nTD2Tu-ET1A/s1600/Sholay.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" n4="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_2buA3x5aEzA/TRrmcRxiSkI/AAAAAAAAAFY/nTD2Tu-ET1A/s320/Sholay.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;अपने फिल्म प्रेम की कहानी पूरी फिल्मी अंदाजे की ही है। पिताजी का सरकारी नौकरी में होने के कारण निरंतर ट्रांसफर होता रहता था। बाद में खुद भी ट्रांसफर को प्राप्त होते रहे सो, पूरा फिल्म प्रेम बुंदेलखंड से लेकर जयपुर, भोपाल और ना जाने कितने शहरों की विस्तृत लोकेशनों पर शूट हुआ है। कई बार तो मुझे ऐसा लगता था कि एक साथ दो फिल्में चल रही हैं। एक मेरे जीवन की रीयल लाइफ फिल्म। जिसमें मुख्य पात्रों में मैं खुद हूं, सपोर्टिग एक्टर देशकाल के हिसाब से दोस्तों, सहकर्मियों सेलेकर श्रीमती जी तक रहे हैं। जबकि दूसरी रील लाइफ में चलती फिल्म है जिसमें मुख्य पात्रों में अधिकतर अमिताभ बच्चन और उनके सहयोगी कलाकार ही रहे। कभी कभार धर्मेद्र से लेकर जीतेंद्र तक, सहूलियत से जिनकी भी फिल्में हमारे शहर में उपलब्ध हो गईं वे मुख्य पात्र बन जाते थे। बचपन में देखी गईं इन फिल्मों का मेरे जीवन पर जबर्दस्त प्रभाव पड़ा। चूंकि सेल्यूलाइड हमेशा आपको आकर्षित करता रहता है। हमेशा आपको चमत्कृत करता है। सो बहुत आश्चर्य नहीं कि फिल्में किसी भी भारतीय के अंतस में गहरे धंसी रहती हैं। गाहेबगाहे वे उसे प्रेरणा देती हैं। तो अपने अंतर्मन में खास तौर पर फिट कर दी गईं इन फिल्मों ने बाद में मेरी बड़ी मदद की। खूब जमकर इन फिल्मों पर लिखा।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;खैर मेरी कहानी की शुरूआत बुंदेलखंड के एक छोटे से शहर छतरपुर से होती है। जहां कि मेरा बचपन बीता, कुछ नाले -नालियों के बैकग्राउंड में कुछ दोस्त थे। सारे के सारे फिल्मों के विकट प्रेमी। इन्हीं नाले-नालियों पर रखे बड़े-बड़े सीमेंट के पाइपों पर बैठकर सभी का फिल्म प्रेम एक साथ परवान चढ़ा। इन्हीं पर बैठकर सभी एक दूसरे को अपनी देखी गई फिल्मों की कहानियां एक खास ध्वनि ट्रेक ढेन॥र्ट्रेन ड्रैन..को बार-बार निकालते हुए सुनाते थे। मूलत: यह ध्वनि यह बताने के लिए निकाली जाती थी कि हीरो कहीं विलेनों में घिर गया है या उस पर कोई मुसीबत आ गई है। यानि कुल मिलाकर बताया जाता था कि मुकाम गंभीर है। इसी ध्वनि के माध्यम से पूरे मित्रों को सिनेमा हाल का मजा दिया जाता था। बुंदेलखंड में लगभग प्रत्येक शहर में तब मेरा मानना है कि फि ल्म देखकर आने के बाद मित्रों की उसका सस्वर बैकग्राउंड म्यूजिक सहित स्टोरी सुनाने की बड़ी विशिष्ट परंपरा पाई जाती थी। तब अमिताभ अद्भुत रूप से फेमस थे। उनकी हर फिल्म को तब जोरदार शुरूआत मिलती थी । मुझे उनकी एक फिल्म की याद है। मुकद्दर का सिकंदर। शायद अस्सी के दशक का कोई वर्ष रहा होगा। फिल्म लगी थी महेश टॉकीज में। क्या भीड़ थी। क्या लोग उमड़े थे। वो नजारा आज भी आंखों में जवां है। पहली-पहली बार टिकट ब्लैक कैसे होते हैं वहीं देखा था। कैसे रिक्शेवाले धीरे से टिकट निकाल कर साइड में ले जाकर धीरे से तौलमोल करके टिकट खिसकाते। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;एक बात भी अक्सर याद आती है। तब हम सुबह से ही टॉकीज में फिल्म की पब्लिसिटी देखने पहुंच जाया करते थे। फिर धीरे से माहौल बनाया जाता था कि फिल्म कैसे देखें। हालांकि फिल्म देखने पर कोई ज्यादा प्रतिबंध नहीं था। फिर भी फिल्म बड़ों के साथ ही देखी जाती थी। वे ही तय करते थे कि किसफिल्म को देखा जाना है। फिल्म देखने के सामूहिक आयोजन अकसर ही होते थे। फिल्म देखने तब एक उत्सव बन जाता था। अड़ोस-पड़ोस के कई परिवार से कुछ दीदीयां, हम लोग। जिस दिन फिल्म जाना होता था। दोस्तों को पूरे जोर-शोर से बताया जाता था कि हम आज फिल्म देखने जा रहे हैं। सुबह से ही नए कपड़े पहनकर घूमना शुरू कर दिया जाता था। कुल मिलाकर मोहल्ले में शायद ही कोई बचता हो जिसे पता न चल जाता हो कि हम फिल्म देखने जा रहे हैं। फिल्म देखने के दौरान तब अमिताभ के आने पर कैसे चीख-पुकार मचती थी वो अपने आप में अलग ही अनुभूति थी। आज सोचते हैं तो लगता है कि इस कलाकार में क्या रहा होगा जिसने पूरा एक जमाना प्रभावित रहा। फिरअमिताभ का अभिनय, अत्यंत अतार्किक पात्र भी कितनी गंभीरता और शिद्दत से निभाते थे वे कि महसूस ही नहीं होता था। हालांकि एक बात है हिरोइनें तब हमारी श्रृद्धा का उतना पात्र नहीं होती थीं। रेखा की बात की जाती थी, जया बच्चन की मजबूरी पर कई बार कोई ज्ञानी मित्र प्रकाश डाल देता था बस। हिरोइनों से ज्यादा चर्चा खलनायकों की होती थी। अमजद खान को जितना कोसा जा सकता था कोसा जाता था। सारी मित्र मंडली इस बात पर सहमत थी कि अमिताभ की सारी मुसीबतों की जड़ यही दुष्ट है। बरसात की एक रात, सत्ते पे सत्ता और शोले की नफरत का विस्तार तब याराना की दोस्ती देखकर कम हुआ था। जिस पर इतना चिंतन जरूर किया गया था कि यार, अमिताभ को इसका दोस्त नहीं बनना था। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;एक्टिंग से ज्यादा चर्चा का केंद्र फाइटिंग होती थी। चूंकि उसी से हम अपने लड़ने के तरीकों में नवाचार करते थे, तो अमिताभ या धर्मेंद्र ने किस तरह से बदमाशों को कूटा, कैसी गाली दी या कैसे बदमाशों को ललकारा कि जिसके बाप में दम हो चाबी मुझसे छीनकर दरवाजा खोल लो। हमारी आपसी लड़ाइयों में भी तेरे बाप में दम हो तो छूकर दिखाओ जैसे डॉयलाग सहजता से निकलते थे। जिस पर तटस्थ दोस्त दूसरे दोस्त को भी बढ़ावा देते थे कि तू भी कुछ बोल कि बेटा डर गया। जिस पर उसे भी कोई मौलिक किस्म का डॉयलाग लाना पड़ता था। यानी फिल्मों का कुछ यूं भी होता था वास्तविक जीवन में भरपूर इस्तेमाल। जितनी उत्सुकता से फिल्म देखी जाती थी उसी उत्साह से फिर फिल्म देखकर लौटने पर दोस्तों से कहानी शेयर की जाती थी। दोस्त भी पट्ठे नाली वाली जगह पर जमे मिलते थे। कोई औपचारिकता नहीं सीधे कहानी सुनाओ। बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं निकाला तो नाराजगी जताई जाती थी कि -क्यों बे जल्दी भगना चाहता है, पूरी सुना, ढंग से सुना। अबे, अमिताभ ने डांस किया था कि नहीं। वोई पुराना वाला डांस किया होगा। फिर एक हाथ कमर पर रखकर दूसरा हाथ हवा में लहराते हुए अमिताभ का ट्रेडमार्का डांस भी थोड़ बहुत करके दिखाना होता था। अमिताभ तब की पीढ़ी के सबकुछ होते थे। स्टाइल उन्हीं से सीखी जाती थी। अमिताभ की देखा-देखी कुछ दोस्त तो बाएं हाथ से लिखने या खेलने तक लगे थे। कुली के दौरान तो पुनीत इस्सर हम सबके गुस्से के एकमात्र पात्र थे। रोज कोई न कोई अमिताभ की दुर्घटना की किसी अलग ही एंगल से कहानी ले आता था। सब रस लेकर उसे सुनते। तब उसमें बहुत कुछ हमारी कल्पना का मिश्रण भी होता था लेकिन सुनाने का ढंग इतना जोरदार होता था कि उसे सही माना जाता था। फिर किसी भी तथ्य को सही माने जाने का तब एक ही पैमाना होता था कि उसे दो -तीन दोस्तों का समर्थन प्राप्त हो जाए। तो कहानियां ऐसे गढ़ी जाती थीं कि बहुमत उस पर विश्वास कर ले। तब मनोरंजन के ज्यादा साधन नहीं थे मुझे लगता है कि तब शायद ऐसे ही स्टोरी टेलिंग से लोगों की रचनात्मकता बढ़ती होगी। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;तब शहर में तीन टॉकीजें थीं। महेश, गोवर्धन, छत्रसाल। इनमें से छत्रसाल टॉकीज तालाब के किनारे थी। उसकी छत नहीं थी। एकदम ओपनएयर थियेटर था वो। फिल्म चलती तो हवाएं भी साथ चलतीं। कभी तालाब भर जाता तो टॉकीज बंद हो जाती। फिल्में वहां हमेशा अच्छी ही लगती थी। गोवर्धन और महेश टॉकीज वैसी थीं जब कि किसी कस्बे में तब टॉकीजों को होना चाहिए था। लाल-पीली पतंगी कागजों वाली टिकटें। गेटकीपरनुमा कुछ लोग। कुछ चौथी-पांचवीं बार फिल्म देखने वाले भयंकर फिल्म प्रेमी, जो पूरी फिल्म की कहानी लगातार अपने दोस्तों को सुनाते रहने का पुनीत कत्र्तव्य भी निरंतर निभाते थे। पटिये वाली कुर्सियां। टॉर्च लेकर पूरी फिल्म के दौरान लोगों को बैठाने वाले गेटकीपर। गाने के दौरान बाहर निकलने वाले कुछ व्यक्तित्व। छोटे बच्चों को लगातार बाहर खिलाने वाले कुछ पति। ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ दर्शक। जबर्दस्त सीटियां। फिल्म की रील कटने पर भारी पैमाने पर होने वाला गाली-गलौज से भरपूर आग्रह। इंटरवल में समोसे-मूंगफली। फिल्म खत्म होने पर रिक्शे के लिए की जाने वाली भागदौड़। ये वो यादें हैं जिन्हें आज ढूंढ़ों तो कहीं नहीं दिखेंगी। मल्टी प्लेक्स के शानदार संसार में इनकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। एक फिल्म की याद है मुझे तब गोवर्धन टॉकीज में लगी थी सरगम। ऋषि कपूर और जयाप्रदा। शायद जयाप्रदा की पहली हिन्दी फिल्म थी। गोवर्धन टॉकीज बाजार और मंडी के पास थी। लाइनें इतनी लंबी लगीं थी कि बाजार तक पहुंच रही थीं। आज इस दृश्य की कल्पना कठिन है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;फिल्मों से जुड़ा मेरा एक बड़ा रोचक अनुभव है। फिल्म थी काला पत्थर। तब मुझे फिल्म जाना था और घर से अनुमति नहीं मिल रही थी। मेरी मां तब आकाशवाणी में सिंगर थीं। एक बार वे गईं गाना गाने के लिए , पिताजी तब शहर से बाहर पोस्टेड थे,सो अपनी निकल पड़ी। धीरे से दोपहर घर से ऊपर छत से कूदे, फिर कुछ दोस्तों के साथ निकल लिए महेश टॉकीज। फिल्म देखी। बीच-बीच में घर पर पड़ने वाली डांट के डर से कुछ मजा भी खराब हुआ। फिल्म खत्म हुई बाद में डरते-डरते घर पहुंचा। दोस्त तो बाहर से ही खिसक लिए कि बेटा झेलो तुम क्यों गए थे बिना बताए फिल्म। अंदर पहुंचा तो मां ने कुछ नहीं कहा। फिर पूछा कुछ खालो। मैं भूखा तो था ही फटाफट खाने लगा। धीरे से मां ने बात शुरू की केैसी थी फिल्म। इधर मैेने स्टोरी बताना चालू कर दी। उन्होंने धीरे-धीरे समझाना शुरू कर दिया। अपन ने भी उस दिन के बाद हाथ जोड़े कि कोई कितना भी कहे अकेले तो नहीं ही जाएंगे। फिल्मों के साथ तब फिल्मी गाने बेहद प्रभावित करते थे। दोस्तों में से तब अधिकतर लोग किशोर कुमार के फैन थे। उनकी क मेडी और गायन पर अकसर चर्चा छिड़ती थी। पड़ोसन एक ऐसी फिल्म थी जिसे कई बार देखने के बाद भी उसका जादू कम नहीं हुआ। अमिताभ और राजेश खन्ना के लिए किशोर कुमार ने जो गाने गाए हैं उन्हें हम अकसर ही लाइट जाने या गमियों की दोपहर खेली जाने वाली में अंत्यक्षरी चीख-चीख कर गाते थे। चू्ंकि मम्मी सिंगर थीं तो बाद में कुछ गाने की तमीज भी आ गई तब गाने के मौके नहीं रहे। इस तरह आज सोचता हूं तो लगता है कि वे भी क्या दिन रहे होंगे। एकदम निश्चिंत-बेपरवाही से भरपूर। हालांकि अकसर इस बात पर सोचता हूं कैसे अभी तक देश में लोगों के जीवन को इतना प्रभावित करने वाली फिल्मों के अध्ययन का कोई पाठ्यक्रम शुरू नहीं किया जा सका है। खैर, बचपन की गलियों से गुजरकर अपना फिल्म प्रेम बड़े शहरों में भी उसी शिद्दत से बना रहा। लेकिन एक बात जो हमेशा लगती रही कि फिल्मों ने भले ही तकनीकी तौर पर बेहद तरक्की कर ली हो लेकिन लोगों का वैसा जुड़ाव कम हुआ है जैसा हमारे बचपन में पाया जाता था।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-3245390185105806632?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/3245390185105806632/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=3245390185105806632' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/3245390185105806632'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/3245390185105806632'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='एक कस्बाई का फिल्म प्रेम'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_2buA3x5aEzA/TRrmcRxiSkI/AAAAAAAAAFY/nTD2Tu-ET1A/s72-c/Sholay.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-7264725326315219697</id><published>2010-11-28T16:03:00.004+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.610+05:30</updated><title type='text'>प्रश्न यक्ष! चिंतन विकट!!</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2buA3x5aEzA/TPpIHAZVL_I/AAAAAAAAADk/iu_-lRl6fGQ/s1600/mahabharata.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="238" ox="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_2buA3x5aEzA/TPpIHAZVL_I/AAAAAAAAADk/iu_-lRl6fGQ/s400/mahabharata.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;जब पांडव अज्ञातवास में जंगल-जंगल घूम रहे थे, किस्सा तब का है। छोटा सा है। चिंता घोर है। चिंतन विकट है। तो जब चलते-चलते सभी थक गए तो एक जगह बैठ गए। सभी को बड़ी घनघोर प्यास लगी थी। युधिष्ठिर के कहने पर छुटके सहदेव एक पेड़ पर चढ़कर पानी की तलाश करने लगे। थोड़ा आगे देखकर उन्हें लगा कि वहां पानी का जुगाड़ हो सकता है। बड़े भाइयों से आज्ञा वगैरहा की फॉमिलिटी पूरी कर पानी लाने निकल पड़े। तालाब के पास पहुंचे। पानी भरने के लिए जैसे ही लोटा जल में डूबोया, एकाएक हाहाकारी किस्म का बैकग्राउंड म्यूजिक शुरू हो गया। लहरें हिलोरें लेने लगीं। पानी दो भागों में बंटना शुरू हो गया। एक दिव्य पुरुष पानी से निकलने लगा। सहदेव ने लोटा मजबूती से थाम लिया। ठोस सोने का है। महंगा है। ऊपर से पुश्तैनी है। इस हाहाकारी किस्म सीन के बीच कोई छीन-छानकर ले गया तो ज्येष्ठ भ्राता को हिसाब देते नहीं बनेगा। इसी बीच पानी के बीचों बीच दिव्य किस्म का सिर लिए परम प्रवृति का व्यक्ति आकर खड़ा हो गया। पहले तीन मिनट तक हंसा। फिर उसने सहदेव की तरफ देखा। फिर हंसा। फिर बिना कोई इंट्रोडक्शन दिए शुरू हो गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये मेरा जलाशय है, कोई इसमें से तभी पानी भर सकता है जब मेरे तीन प्रश्नों का जवाब दे देता है। सहदेव ने गौर से उन महानुभाव की तरफ देखा। मन ही मन सोचा-हमें जानता नहीं है। चलो जाने दो। फिर प्रकट्त: बोले, प्रश्न-वृश्न तो गुरु हमसे न पूछो। इसी चक्कर में अपन क्लास में सबसे पीछे बैठते थे। पढ़ने-पढ़ाने जैसे परंपरागत कार्यो के सख्त विरोधी हैं। हमें तो जबर्दस्ती धनुर्विद्या सिखाई जा रही थी। अपन तो गुलेल मारकर किसी का टकला फोड़ने के एक्सपर्ट हैं। गदाधारी भीम और गांडीवधारी अजरुन &amp;nbsp;की तरह अपन भी गुलेलधारी सहदेव कहलाते। लेकिन गुरु तुम तो जानते ही हो लोक कलाओं को किसी भी देशकाल में कोई प्रश्रय नहीं मिलता है। कैसी बुरी स्थिति है। किसी तरह का शासकीय संरक्षण भी नहीं दिया जाता है। इस दिशा में सरकार योजनाएं बनती हैं तो नकली कलाकार प्रसिद्धी पा जाते हैं। विदेश घूम आते हैं। असली कलाकार तो गुरु एकलव्य टाइप गुमनामी में ही खो जाते हैं। हमीं को लो, बस्ते में बंटे-कंचे भरकर लाते थे कि मौका मिले तो गुलेल चला लें। षड्यंत्र देखो द्रोण का, एकलव्य टाइप का मामला हमसे नहीं बैठा पाए तो बस्ते का बोझ बताकर एक कमेटी बना डाली कि बस्ते का बोझ घटाओ। अरे मैं कहता हूं बस्ते का बोझा घटाने से क्या होगा दिमाग से टेंशन घटाओ-असली प्रतिभाओं की सामने लाओ। तो बस्ते का बोझ कम होते ही हमारे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। हमने कंचे-बंटे फेंक दिए। रट्टामार व्यवस्था में मन लगाने लगे, तो देख लो फिसड्डी रह गए कि नहीं। हर व्यवस्था में एकलव्यों से ऐसे ही रबड़ी छीनकर अजरुनों को खुरचन खिलाई जाती है। खैर, छोड़ो गुरु ये तो हमारी पर्सनल प्राब्लम है, जहां मौका मिलता है लेके बैठ जाते हैं। तुम कुछ प्रश्न-वृश्न की बात कर रहे थे! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहदेव के इतने प्रवचन के बाद दिव्य महानुभाव जागे। बोले- आप भी सभी आम इंसानों की तरह सरकार और शिक्षा व्यवस्था से फ्रास्ट्रेटेड किस्म के व्यक्ति जान पड़ रहे हैं। आपकी बातचीत से आपके पढ़ाई-लिखाई के स्तर का भी अंदाजा हो रहा है। लेकिन बंधुवर मेरे प्रश्न अत्यंत व्यावहारिक हैं, उत्तर भी बड़ा अनुभव मांगते हैं। सहदेव ने इतना सुना कि उनके अंदर का राजपुरुष जागृत हो गया। वे गरजे-ना जी उत्तर कोई न देंगे, पानी अलग पीएंगे, बीच में आओगे तो माथा भी खोल देंगे। दिव्य पुरुष कुछ कहता इससे पहले ही उन्होंने गटागट करके दो-चार लीटर पानी अलग से पी लिया। पीने की देर थी कि वे धड़ाम से जमीन पर गिर पड़े। यक्ष वापस पानी में समा गया। वातावरण फिर से नॉर्मल हो गया। दृश्य में धुआं आदि निकलने की बारीकियों के बारे में इसलिए नहीं बताया जा रहा है कि सभी ने टीवी आदि पर देखा ही है तो विवरण व्यर्थ है। इन दृश्यों के बारे में लोग डायरेक्टरों से भी ज्यादा जानकारी रखते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर, पांडव खेमें में चिंता की लहर दौड़ रही थी। इतनी देर हो चुकी है, लघु भ्राता अभी तक नहीं लौटे हैं। भीम तो गरजे कि वहीं पीकर पसर गए होंगे। युधिष्ठिर ने अपनी भूमिका का निर्वहन करते हुए उन्हें यथोचित बातों के थप्पड़ लगाए।&amp;nbsp;माता कुंती&amp;nbsp;&amp;nbsp;ने भी ज्ञान की कुछ नोचिंया भी अतिरिक्त तौर पर लीं। भीम बड़े भ्राता से इसी कारण भयाकंपित होते हैं कि ज्ञान देने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देते हैं। इसी चक्कर में उनका व्यक्तित्व भी ठीक से विकसित नहीं हो पा रहा है। जाने क्यों थोड़ा पढ़-लिख जाने पर आदमी दूसरे को जाहिल समझकर समझाइश देने लगता है। फिर रुकने की अपेक्षा खोजने दिशा को अपने लिए ज्यादा सुरक्षित मानकर गदा कंधे पर रखकर सहदेव की दिशा में तुरंत निकल रवाना हो गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद की कहानी तो सबको पता ही है। मैं जबर्दस्ती बताऊंगा तो भी आप शुरू कर देंगे कि इसके बाद बारी-बारी से भीम-अजरुन-नकुल भी सहदेव का पता लगाने जाते हैं। सभी यक्ष के प्रश्नों के जवाब में यथोचित बद्तमीजी का प्रदर्शन कर पानी पीते हैं। मैं यहां आपको टोकने का साहस करूंगा कि बड़े लोगों के प्रयास को बद्तमीजी आदि न कहें, आप मांनेंगे थोड़ी ना। मेरे ज्यादा टोकने पर हो सकता है आप इस शब्द का व्यावहारिक प्रयोग या भौतिक सत्यापन मेरे ऊपर ही शुरू कर दें। चलिए जाने दीजिए, तो आपका कहना है कि तीनों का हाल सहदेव जैसा ही होता है। उधर, चिंता में बैठे युधिष्ठिर&amp;nbsp;माता कुंती&amp;nbsp;&amp;nbsp;के साथ वहां से निकल लेने के चक्कर में हैं, यहां मैं पुन: आपको टोकने का श्रम करूंगा श्रीमान्, धर्म-सत्य आदि की याद दिलाऊंगा। तब आप बताएंगे कि हां भई, चक्कर में जरूर थे लेकिन अंत में&amp;nbsp;माता&amp;nbsp;&amp;nbsp;के डर से ही युधिष्ठिर स्वयं उनकी तलाश में जाने का फैसला करते हैं। जलाशय के पास जाने पर उन्हें धरा पर पड़े अपने भाई मिलते हैं जिस पर वे साढ़े तीन मिनट तक मेरे भाई.., मेरे भाई..तुम कहां गए, हमको छोड़ के तुम कहां गए .. मुंह मोड़के तुम कहां गए..टाइप की संस्कृतमय हिन्दी में परंपरागत किस्म का एक लघुगान गाते हैं, जिसमें इतना दर्दीला बेसुरापन होता है कि धरा पर यदि भाई अधमरे भी पड़े हो तो इस अंतिम प्रहार से सीधे ही उनके प्राण निकलने की व्यौवस्था जम जाए। मैं आपको फिर टोकूंगा तो आप कहेंगे रोक मत, आगे सुन..यहां आप बता रहे हैं कि फिर युधिष्ठिर को भी उन्हीं प्रश्नों के साथ वही यक्ष मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आगे..&lt;br /&gt;यक्ष- सावधान श्रीमान् तुम्हारे भाइयों ने अड़ी डालकर पानी पीने की कोशिश की थी। अपन भी पुराने चावल हैं। हमने उनकी हांडी फोड़ दी। चावल लूट लिए। यानी सरल भाषा में उनकी दाल न गलने दी उन्हें आड़ा कर दिया। तुम भी बिना प्रश्नों का जवाब दिए पानी पीओगे तो इन्हीं के समान निपट जाओगे। इसके पश्चात यक्ष ने एक से दो मिनट तक हू.हा.हा. वगैरहा भी किया। युधिष्ठिर ने सोचा जहां बलशाली भीम, गांडीवधारी अजरुन की नहीं चली वहां धैर्य रखना उचित है। बाद में राजपाट मिलने पर फुर्सत से इसकी अकड़ निकाल देंगे। फिलहाल तो इसकी बात मानने में ही भलाई है। विद्या भी कहती है जहां बलशाली कैंडीडेट हो वहां विनम्रता ही सही रास्ता है। संपूर्ण गुंतारे लगाने के पश्चात् बोले- ओके, आप पूछिए में यथासंभव उत्तर देने का प्रयास करूंगा। इतना सुनकर यक्ष ने कहा तो ठीक है, मेरा पहला प्रश्न ये रहा। &lt;br /&gt;इस बरस वेलेंटाइंस डे संडे के दिन पड़ा था, तो ऐसी स्थिति में देश के युवा नर-नारियों ने किस बहाने से घरोंे से निकलने की जुगाड़ की होगी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युधिष्ठिर ने दाएं देखा फिर बाएं देखा। फिर नीचे देखा। फिर यक्ष की तरफ देखा। फिर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोले-कोई लाइफ लाइन?&lt;br /&gt;फोनआ फ्रैंड?&lt;br /&gt;फिफ्टी-फिफ्टी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यक्ष ने कहा- जाने क्यों लोग जीवन में हर समस्या पर क्यों इधर-उधर ताकना शुरू करते हैं। खुद क्यों नहीं उस समस्या से निपटने का प्रयास करते। फिर प्रकटय: कहा-ओके.. ओके मैं समझ गया। आपके भाइयों ने तो प्रश्न तक सुनने की जहमत नहीं उठाई थी। आप कुछ विनम्रता की मूर्तिटाइप के व्यक्ति दिखाई रहे हैं। मैं आपसे कुछ परंपरागत प्रश्न पूछता हू्ं उनके उत्तर जरा दिमाग लगाकर बताइए। तो प्रश्न है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनुष्य का सच्च साथी कौन है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युधिष्ठिर -धैर्य!&lt;br /&gt;यक्ष-गलत, मनुष्य का सबसे सच्च साथी है पैसा। वर्तमान में यदि आपके पास पैसा है तो सबकुछ है। सारी खुशियां हैं। खैर, तुम कुछ सचरित्र किस्म के व्यक्ति जान पड़ रहो हो, तुमसे एक प्रश्न और पूछता हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बताओ-आज सबसे बलशाली कौन है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युधिष्ठिर--मनुष्य का संकल्प, जिसके बूते वो हर चीज हासिल कर सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यक्ष- रांग आंसर, आजकल सबसे बलशाली होती है सिफारिश यानी सेंिटंग। किसी पावरफुल आदमी से पहचान हो तो जानो सारे काम मिनटों में हो जाते हैं। संकल्प क्या करेगा, जब सेटिंग नहीं होती। संकल्प की जरूरत तो सिफारिश के बाद की भागदौड़ के लिए चाहिए। अत: वर्तमान युग में सबसे बलशाली है सिफारिश। इतने संजीदा प्रश्नों के बाद युधिष्ठिर की समझ में आने लगा कि रट्टामार पढ़ाई से कुछ नहीं होने का, व्यावहारिक अनुभव की भी यथोचित मात्रा में जरूरत होती है। उधर, यक्ष भी मजे लेने पर उतारू दिखाई दे रहा था। बोला- चलो एक प्रश्न और पूछता हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बताओ- वर्तमान में आदमी कैसे सुखी हो सकता है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युधिष्ठिर- संतोषी जीव बनकर??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यक्ष- गलत. वर्तमान में सुखी रहने का सरल उपाय है सरकारी नौकरी.और उसमें भी मालदार विभाग की मिल जाए तो सोने पे सुहागा। उस पर भी पुलिस विभाग की मिल जाए तो सोने पे पीतल-तांबा-जास्ता आदि भी। संतोषी जीव बनकर क्या परिजनों की गालियां खाना है? इतने के बाद यक्ष ने कहा यानी की तुम मेरे किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाए, दीखता है तुम लोगों में व्यावहारिक ज्ञान की भारी कमी है। अच्छा राजन् आप तो बुद्धिमान हैं, राजनीति के भी ज्ञाता है अब चलिए बताइए..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौन सा व्यवसाय सबसे तेजी से अमीर बना सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युधिष्ठिर- एंपोर्ट-एक्सपोर्ट का बिजनेस।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यक्ष- गलत, नेतागिरी का बिजनेस सबसे तेजी से अमीर बना सकता है। आपने इससे तेजी से किसी तो पांच साल के भीतर करोड़पति-अरबपति बनते देखा है। अच्छा अब आपसे अंतिम प्रश्न पूछता हूं..&lt;br /&gt;बताओ, इतने भ्रष्टाचारी हर बरस पकड़े जाते हैं, किसी एक को भी आर्थिक अपराध के मामले में सजा क्यों नहीं होती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युधिष्ठिर-!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यक्ष- बताओ.., आप तो न्याय की मूर्ति हैं, नीति-नियमों के ज्ञाता हैं। ना जाने क्या-क्या हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युधिष्ठिर- हें! हें! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यक्ष- बताओ? बताओ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युधिष्ठिर- श्रीमान् मैं आपसे हार मानता हूं, स्वीकार करता हूं कि इतने ज्ञान होने के बाद भी मेरे पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है। लेकिन मैं भी आपसे यह जानने को अत्यंत उत्सुक हूं कि हर बरस देश में इतने भ्रष्टाचारी पकड़े जाते हैं, किसी एक को भी आर्थिक अपराध के मामले में सजा क्यों नहीं होती है?&lt;br /&gt;यक्ष- हें!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युधिष्ठिर- कृपया बताइए धर्मप्राण?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यक्ष- हें! हें! हें! ऐसा है, मतलब कि कुछ यूं है कि. .यानी मतलब. . जब मतलब कोई ..?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युधिष्ठिर-अतलब-मतलब की अठखेलियां न कीजिए महराज, बताइए..!, बताइए. . ! !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यक्ष- अबे! क्या बताइए..बताइए लगा रखी है, हमें पता होता तो यक्ष बने यहां पड़े होते क्या? हम तो यक्ष हैं हमारा तो काम ही है यक्ष प्रश्न खड़े करना, जवाब तो तुम तलाशो। और सुनो, गुरु ज्यादा भेजा मत खाओ, प्यासे हो तो सीधे पानी पीओ। तुम्हारे इन भाइयों को भी जिला देता हूं, उन्हें उठाओ और फूट लो यहां से फुर्ती से..,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो ऐतिहासिक संवाद खत्म हुआ। फिर अब बचा क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहानी का सबक!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पूरे किस्से का मतलब!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यक्ष प्रश्नों की समस्या पर यक्ष चिंतन!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो भइया, कुल मिलाकर विकट निष्कर्ष ये है कि आधुनिक काल के वास्तविक यक्ष प्रश्नों का जवाब तो खुद यक्ष के पास भी नहीं है। हां साधारण यक्ष प्रश्नों के जवाब में तो सब ही ज्ञान देने को तत्पर हैं। हैं की नहीं?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-7264725326315219697?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/7264725326315219697/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=7264725326315219697' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/7264725326315219697'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/7264725326315219697'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2010/11/blog-post_28.html' title='प्रश्न यक्ष! चिंतन विकट!!'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2buA3x5aEzA/TPpIHAZVL_I/AAAAAAAAADk/iu_-lRl6fGQ/s72-c/mahabharata.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-663367819814804359</id><published>2010-11-14T13:15:00.002+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.611+05:30</updated><title type='text'>एक बार सेवा का मौका अवश्य दें...</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2buA3x5aEzA/TPpJXCqG9uI/AAAAAAAAADo/Rx1sfIA_uwY/s1600/social.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="199" ox="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_2buA3x5aEzA/TPpJXCqG9uI/AAAAAAAAADo/Rx1sfIA_uwY/s320/social.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/ss"&gt;&lt;/a&gt;हमारे एक मित्र हैं ‘महान’ समाजसेवी। समाज सेवा उनमें अपनी पूरी महानता के साथ प्राप्त होती है, ऐसा वे ही कई बार गाहे-बगाहे विवरण देते रहते हैं। उन्होंने समाजसेवा के अपने क्षेत्राधिकार का भी निर्धारण कर रखा है ताकि बाकी समाजसेवियों के लिए अन्य क्षेत्र खुले रहे और वे लोग भी पर्याप्त महानता आदि प्राप्त कर सकें। विषय के क्षेत्राधिकार के साथ उन्होंने विशेष संदर्भ में एक ‘खास’ अस्पताल का भी चयन कर रखा है, ताकि अन्य कोई भी इस क्षेत्र में समाजसेवा को आतुर हो तो उसके लिए अन्य अस्पतालों के विकल्प ओपन रहें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अस्पताल-वार्ड आदि में उन्होंने अपना सूचना तंत्र फिट कर रखा है, इधर कोई समाजसेवा को इच्छुक श्रेणी का नया-नवेला मरीज पहुंचा नहीं कि उधर वे 30 मिनट के शार्ट नोटिस पर हाजिर। 30 मिनट भी इसलिए के उनके घर से अस्पताल पहुंचने तथा इसी बीच में फलवाले से उधारी फल लेने में लगने वाली 15 मिनट की झिकझिक, पुराना हिसाब, चुका देने का आश्वासन, खा के थोड़ी ना भग जाएंगे टाइप के उलाहने, बाबूजी ज्यादा पैसे हो गए हैं टाइप की मिन्नतें, तत्पश्चात कुछ पुराने, कच्चे, सड़े फलों पर जमने वाली सहमति आदि की प्रक्रिया इतना समय तो ले ही लेती है, अन्यथा तो घर से अस्पताल का रास्ता 5 मिनट का है, 10 मिनट अस्पताल के चौकीदार से लेकर अंदर वार्ड तक पहुंचने के दौरान प्रत्येक को यथायोग्य दो से 4 मिनट देने के लिए अलग से रखे गए हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सबके बाद वे वार्ड में पहुंचते हैं, जहां वे नए आए मरीज की तरफ किसी सिपाही की मुस्तैदी से झपटते हैं। यहां उनका फिक्स रूटीन है, फल वाली थैली सीधे मरीज को थमाने की व्यवस्था करते है। चूंकि इस संबंध में उनका स्पष्ट विवेचन है कि मरीज जिस हाल में होता है उसमें फल की क्वालिटी की तरफ उनका ध्यान जा ही नहीं सकता, लेकिन परिजनों के बारे में उनका मानना है कि वे तो अस्पताल, में घुसते ही अतिरिक्त सतर्कता बरतने लगते हैं। खैर, थैली थमाऊ कार्यक्रम के पश्चात वे मरीज से ही, न संभव हुआ तो परिजनों से, वहां भी संभव न हुआ तो डाक्टर से ही उसकी बीमारी का विवरण लेने लगते हैं, इस मामले में खुद ही इतने ज्ञानी हो चुके हैं कि डॉक्टर के आधा ही बताने के पश्चात स्वयं ही परिजनों को बाकी हिस्से की जानकारी प्रदान करने लगते हैं। इस संपूर्ण प्रक्रिया के पश्चात वे गंभीर मुंह बनाकर मरीज के परिजनों को इस बीमारी के पूर्व मरीजों के किस्से सुनाते हैं। फिर उसे अस्पतालों की अव्यवस्था, कमीशनखोरी, नकली दवाइयों के बारे में विशेषज्ञ की हैसियत से बताते हैं। फिर प्रयास करते हैं कि मरीज के साथ वाला कोई दवाई लाने जाए तो उन्हें तो साथ में जरूर ले ले। अन्यथा तो उनका प्रयास दहशत में बैठे हुए परिवार से दवाई के पैसे और प्रिस्क्रिप्शन लेने की दिशा में ही होता है। एक बार प्रिस्क्रिप्शन और पैसे मिल जाने पर वे सीधे बाहर की तरफ दौड़ने से पहले आसपड़ोस की किसी नर्स की तरफ झपटते हैं, जिसे भी वे अत्यंत गंभीरता के साथ मरीज की हालत बीमारी का विशाद विवरण सुनाते हैं। विवरण में इतनी छोटी-छोटी बातें तक विस्तार से बताई जाती है कि यदि मरीज सुन ले, तो अपनी इतनी गंभीर हालात के बारे में जानकर तत्काल की कोमा में चला जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि उनके विवरण का विस्तार नर्स की आयु के आधार पर तय होता है, बुजुर्ग नर्सो को केवल मरीज की वर्तमान हालत के बारे में ही बताया जाता है। इस गतिविधि के दौरान भी वे मरीज के परिजन पर पूरी नजर रखते हैं किसी ने मुंह बिचकाया या कोई जोशीला जीव आता दिखाई दिया कि बीमारी का विवरण अधूरा छोड़कर वे निकल लेंगे दवाई लाने। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान उनके पुराने समाज सेविकोच्छुक मरीज अत्यंत ही ‘इग्नोर’ किए जाएंगे। दवाई की दुकान पर वे फिक्स कमीशन के आधार पर पूरा बिल बनवाते हैं। वहां भी दुकानदार से दवाइयों की कंपनियों की बढ़ती मुनाफाखोरी, अब तो कुछ धंधा ही नहीं रह गया है भाई, आदि टाइप बातों के लिए भी समय निकालते हैं। फिर लौटते समय भी वे दोबारा किसी नर्स के पास जाकर दवाई लेने का तरीका समझते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी दृश्य के साथ उनका मार्मिक फ्लैशबैक भी जुड़ा हुआ है, जिसे वे कई बार कमीशन के पैसे से दोस्तों को दारू पिलाते समय सुना चुके हैं कि यहीं किसी खास नर्स से उन्हें प्रेम हो गया था, तब वे समाजसेवा के क्षेत्र मे उतरे नहीं थे। बाद में उसके चक्कर में शुरू हुई समाजसेवा तो चलती रही लेकिन वो नर्स किसी दूसरे अस्पताल के कंपाउंडर के साथ भाग गई थी। इस बात पर वे इतने व्यथित हुए थे कि एक बारगी तो शरीर से ‘दिल’ के ट्रांसप्लांट के बारे में मेडिकल सेवाओं की जानकारी लेने में लग गए थे, ताकि दोबारा न रहेगा दिल न बजेगी घंटी। फिर किसी मानसिक रोगी ने उन्हें बताया था कि सोचने-भावनाओं का प्रेम आदि की अनुभूति तो दिमाग की देन है, दिल तो बेचारा यूं ही बदनाम है। जिसकी सलाह के संबंध में उन्होंने सायक्रेटिस्ट महिला डॉक्टर से बात की भी, उस डॉक्टर ने भी उन्हें ऐसा ही कुछ समझया था, जिस पर वे मान गए थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि पूरे परामर्शी सत्र के दौरान उन्हें उस महिला डॉक्टर से भी प्रेम हो गया था। महिला डॉक्टर तो खैर, अपने प्रेमी से शादी करके विदेश चली गई, लेकिन उन्होंने इन प्रकरणों के माध्यम से मेडिकल क्षेत्र की अत्यंत ही मौलिक थ्योरी प्रतिपादित कर ली थी कि महिला डॉक्टर और खूबसूरत नर्सो के कारण ही गंभीर रोगियों के ठीक होने की दर दोगुनी-चार गुनी हो सकती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि उनकी ये थ्योरी किसी मेडिकल जर्नल में तो प्रकाशित नहीं हो पाई लेकिन वे दारू पीकर इस थ्योरी के बारे में सारे दोस्तों को तीन-चार हजार बार बता चुके हैं। बल्कि अब तो एक पैग के बाद ही कई बार वे इस थ्योरी तथा इसके मार्मिक फ्लैशबेक पर व्याख्यान शुरू ही करते हैं कि दूसरा-तीसरा-चौथा दोस्त उसके आगे की लाइनें बोलने लगता है, जिस पर वे अगला जाम लेकर आत्म संतोषित होते हैं कि कम से कम उनके सिद्धांत पर्याप्त रूप से चहुंओर फैल ही रहे हैं। इस तरह उनके प्रत्येक दिन की समाजसेवा का अंत रात की ऐसी ही दारू पार्टी के बाद होता है। दूसरे दिन वे नियत समय पर मरीज को अटेंड करने पहुंच जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही एक बार तो उन्होंने समाज सेवा के अपने इतिहास में मील का पत्थर छू लिया था, हुआ यो कि उनके एक परिचित के पिता बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हुए थे। जिस पर वे तत्काल ही वहां पहुंचे। हालांकि इस दौरान फलवाले हिस्से में उन्होंने कुछ उधारी चुकाकर बेहतर फल लिए थे। तो जब वे वहां पहुंचे तो अस्पताल में सब परिजन गंभीर मुद्रा में बैठे थे, उन्होंने ही इस बीमारी की प्राचीन केस हिस्ट्री से निकालकर कुछ सकारात्मक किस्से आदि सुना-सुनाकर सभी को इस घातक स्थिति से उबरने का साहस दिया था। बाद में एक-एक कर परिचित खिसक लिए थे, देर रात तक वे और बीमार के दो भाई ही बचे थे। उनमें से भी एक देर रात गोल हो लिया था, दूसरा पिताजी के साथ वार्ड में सो गया। वे ठंडी-बर्फीली रात बाहर लॉन में बैठे-बैठे दांत किट-किटाते रहे, मुंह सुबह अंधेरे भी जब चाय पीने जा रहे थे तो गश्ती वालों ने पकड़ कर लपका दिया था कि सालो, रातभर नींद नहीं आती क्या यूं ही घूमते रहते हो। खैर, जैसे-तैसे वे वापस अस्पताल पहुंच थे तो दूसरा भाई भी घर से आ रहा हूं बोलकर निकल लिया था, वे उस मरीज के पास भूखे-प्यासे बैठे रहे थे। शाम को ही कोई आया था जिस पर उनसे किसी ने खाने तक का नहीं पूछा था तब वे खुद ही मार्केट जाकर खाना खाकर आए थे। वापस अंदर पहुंचने पर देखा तो सभी उन्हीं के लाए फल खाते मिले थे। दूसरे दिन भी वे बिना नहाए वहीं डेरा डाले रहे। एक-दो दिन बाद वे जब नहाने के लिए घर गए थे तो इसी बीच वो मरीज वहां से डिस्चार्ज होकर घर ले जाया जा चुका था। उन्हें तो वहां बैठी नर्स ने ही बताया कि वे तो गए, हां एक थैली छूट गई है जिसमें कुछ फल हैं, वे अपने बचे फलों के साथ विदा हुए थे। इतने भीषण री-इंट्री सीने के माध्यम से उन्होंने समाज सेवा में पुनर्वापसी की थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में हालत से सबक लेते हुए उन्होंने मूल समाज सेवा की निस्वार्थ भावना के साथ साइड की दुकान भी खोल ली थी, जिसके अंतर्गत वे मरीज और उसके परिजनों की समाज सेवा के साथ ही उन्हें अपनी कपड़े के दुकान की विशेषताओं, थान की क्वालिटी, सिलाई के धागे से लेकर सामने के चाय वाले कल्लू तक के बारे में इतना बताते हैं कि यदि लोग अस्पताल में ने हो तो चार पांच मीटर कपड़े या पार्टी अमीर है तो एकाध थान का आर्डर तो हाथों-हाथ दे देते हैं। इसके बाद वे अन्य दुकानों के बारे में विस्तार से बताते हैं जहां उनका कमीशन फिक्स है। उनके विजिटिंग कार्ड भी तत्काल ही सभी को थमाए जाते हैं। इसी बीच अतिरिक्त विनय भी कर ली जाती है कि यदि वहां जाएं तो उनका नाम जरूर लें, ताकि पर्याप्त रिस्पांस मिले जाएं। हो सके तो वहीं से मोबाइल जरूर कर दें, ताकि वे दुकानदार को ‘समझा’ सकें। इतने कॉमर्शियल विवरण के बाद वे समाज सेवा के विशिष्ट इतिहास के विस्तार में जाते हैं जिसमें प्रेम प्रकरणों के हिस्से त्याग-बलिदान की किसी और कहानी से रिप्लेस करते हुए सुनाए जाते हैं। धीरे-धीरे उनका ये साइड बिजनेस विस्तार पाता जा रहा है। जिसका कारण है कि इसी क्षेत्र में निरंतर सेवारत रहने के फलस्वरूप उनकी जान पहचान मेडिकल स्टोर और अन्य लोगों से भयंकर रूप से हो चुकी है। जिनके प्रतिनिधि के तौर पर भी वो मरीजों, परिजनों को किसी विशेष दुकान से ही समान आदि खरीदने के लिए कन्विस कराने लगे हैं। अब तो हालत ये है कि निरंतर समाजसेवा के कारण दायरा इतना बढ़ गया है कि उन्होंने इसकी एक छोटी-मोटी इकाई की भी स्थापना कर डाली है। कुछ सहायक एक्जीक्यूटिव भी रख लिए हैं। दुकान का नाम भी रख छोड़ा है ‘‘गेटवेल पब्लिक रिलेशन एंड इमेज बिल्डिंग उपभोक्ता भंडार।’’ विक्रय प्रतिनिधि, कमीशन एजेंट, माउथ पब्लिसिटी ऑफिस आदि रूपों में उनका यह निजी बिजनेस भी चोखा चल रहा है। अब टारगेट बढ़ने लगा है तो वे दूसरे अस्पतालों के भी चक्कर लगाने लगे हैं। प्रोफेशनल टाइप से काम करने लगे हैं। आप भी कभी किसी अस्पताल के आसपास से गुजरें तो आपको भी विजटिंग कार्ड थमाया जा सकता है कि यहां पधारें तो एक बार सेवा का मौका अवश्य दें। कार्ड के पीछे सेवाओं की सूची भी है, हां, ‘समाजसेवा’ अभी भी निशुल्क है..।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-663367819814804359?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/663367819814804359/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=663367819814804359' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/663367819814804359'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/663367819814804359'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2010/11/blog-post_14.html' title='एक बार सेवा का मौका अवश्य दें...'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2buA3x5aEzA/TPpJXCqG9uI/AAAAAAAAADo/Rx1sfIA_uwY/s72-c/social.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-2565433807065159165</id><published>2010-11-13T16:41:00.002+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.612+05:30</updated><title type='text'>कक्का! मोए तो चमचा बननें</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2buA3x5aEzA/TPucKmxJ-PI/AAAAAAAAADs/vyWH9lXtKGU/s1600/cartoon.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="232" ox="true" src="http://2.bp.blogspot.com/_2buA3x5aEzA/TPucKmxJ-PI/AAAAAAAAADs/vyWH9lXtKGU/s320/cartoon.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सियासत में पद पा लेना एक उत्सव है चाहे पार्टी में मिले या सरकार में व्यवस्था जमे। ऐसे समय में चमचों के जलवे देखते ही बनते हैं। ऐसे ही एक ईष्यालु कहानी के साथ मुखातिब हूं, सुनिए। पूरी कहानी में पात्र और नाम आप खुद ही डालते रहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहर रैलियों में डूब-उतरा रहा है। जयकारों से वातावरण गुंजायमान है। कोई नया बड़ा पद पा गया है। आलाकमान की निगाहों को भा गया है। परसाद पाकर दिल्ली से चला है। ट्रेन लेट है फिर भी स्टेशन पर भीड़ जमा है। बैनर हैं। झंडियां हैं। नेता हैं। कार्यकर्ता हैं। बड़े चमचे हैं। छोटे चमचे हैं। छोटे चमचे स्टेशन के बाहर चम्मचों में भर-भरकर पोहे खा रहे हैं। दोने में चटनी भी धरी है लेकिन जलेबी पर निगाहें जमाए हैं। जलेबी प्र्रेरणा है बंधु, अब तो शीरा चोंखने के दिन आए हैं। घनघोर नारे लगाने वाले झाड़-पोंछकर घरों से उठाए गए हैं। कार्यकताओं को लादने के लिए कुछ पुरानी जीपोंवाले भी पटाए गए हैं। व्यवस्थाएं जमकर करनी हैं सो चमचे बौराए हैं। छाती पर चिपकाकर प्रतिबद्धता दिखानी है, सो चमचों का नेता भी अचकाचाया है। चमचों का नेता यानी बड़े नेता का छोटा स्थानीय नेता। नेता फिक्र में डूबा है। तो उसका चमचा प्रतिबधता और नेता की चिंता दोनों को लेकर फिक्रमंद है। नेता की हर चिंता से चिंतित होता है चमचा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूं तो चमचा जोरदार कलपुर्जा होता है। 21 नंबर का पाना या मास्टर की भी होता है। चमक चांदनी चटाचट भी होता है चमचा। जब जैसी जरूरत पड़ जाए सो चमन बहार, किमाम, चटनी और चूरन तक होता है चमचा। दरी-कालीन-फर्श-झाडू़ और माइक जैसा असाहित्यिक भी होता है चमचा। सादर-आदर-दादर-गागर जैसा साहित्यिक भी होता है चमचा। चमचा अपने नेता के लिए वो-वो कर सकता है जिसे रजनीकांत ने भी अभी तक अपनी फिल्मों में नहीं किया होगा। चमचा होना अवर्णनिय है। अनिर्वचनीय है। चमचा होना आनंदनीय है। अरे! मैं तो कहता हूं चमचा होना अभिनंदनीय है। चमचा होना करो तो जानो किस्म की चीज है। चमचा होना, चमचा होना है यार और क्या बस! अब रुक भी जाओ गुरु हांफ जाओगे, फिर दमा उभर आएगा तो तुम तो ठहरे लेखक तुम्हारी देखरेख को कोई चमचा नहीं आएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि चमचत्व परंपरा में अनूठा चिंतन भी पाया जाता है। चमचे को अपने होते नेता चिंता का चिंता में डूबना व्यर्थ लगता है। चमचा परंपरा का अनादर सरीखा दिखता है। कई चमचे तो अपने पुरखों तक को बीच में ले आते हैं। विचारते भी हैं कि किस मुंह से पुरखों को मुंह दिखाएंगे। हालांकि चमचों में जो घुटियल चमचे होते हैं उन्हें पुरखों की ज्यादा चिंता नहीं होती है। उनके बारे में तो चमचों की इस श्रेणी के मौलिक विचार है कि ढंग से चमचागिरी की होती तो इतनी जल्दी ही मरते क्या? और आगे जाकर वे तो अपने पुरखों के बारे में इतना तक विचार रखते हैं कि फिलहाल जहां भी होंगे(कई निश्चिंत हैं कि नरक में ही होंगे) वहां अपनी प्रवृति के अंतर्गत कहीं चमचागिरी में बिजी ही होंगे सो उनके बारे में ज्यादा सोचकर समय न खराब किया जाए। अब तो पुरखे अतीत हो गए वे ऊपर से तो हम पर फूल बरसाने से रहे, हमें तो वर्तमान की चिंता है। हर चमचे का वर्तमान तो नेता ही है। नेता चिंतित होता है तो चमचों को वर्तमान की फिकर और भविष्य की चिंता सताने लगती है। तो इस नजरिये से भी चमचा होना कोई मजाक नहीं है। कोई बच्चों का खेल नहीं है। वर्तमान हालत में तो चमचा होना ही काफी बड़ा निवेश मांगता है। अकसर सुट्टे और पोहे का पैसा तक जेब से जाता है। कई बार बैनर बनवाने की दच्च भी लग जाती है। गाड़ी में डलवाए पेट्रोल का तक पैसा बकाया रहता है। नेताजी का ऊपर वाले भाई साब से मामला नहीं बैठा तो जेब से भरना पड़ता है पैसा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार कम कार्यकर्ता आएं तो नेता जी की किरकिरी हो जाती है। भाईसाब मुंह फेरकर चले जाते हैं। इस बात पर नेताजी भी अपने चमचों से मुंह फेर लेते हैं। ऐसे घनघोर हालातों में बैनर-पेट्रोल के पइसे तक जेब से लग जाते हैं। अब ऐसे में जब नेताजी ही चिंतित हों कौन साला पैसे मांगता। जमकर दच्च लगती है तो चमचा दर्शन पर उतर आता है- कि इससे तो अच्छा साला गांव में खेती ही करते। शस्य-श्यामला धरती को हरियाली से ही भरते। फसल बेचकर पैसा कमाते, ठाठ से फॉर्महाउस बनवाते। इस बात की याद आते ही चमचा अपने नेता के दिव्य फॉर्महाउस और भव्य कृत्यों की याद में डूब जाता है। वैसे भी चमचों के लिए अपने नेता के कु और सु दोनों ही तरह के कृत्य एक ही बात है। सो वो अपने लिए एक पद, दो घर, तीन गाड़ियों का सेजा बिठाने लगता है। बस, इसी फेरफार में फिर राजनीति खींच लेती है। हालांकि सभी चमचों का दावा होता है कि वे पदलोलुप नहीं हैं वे लेकिन कहीं मेंबरी-फेंबरी का जुगाड़ जम ही जाए तो क्या बुरा है। गाड़ी में लिखवाने के लिए एकाधा वजनदार पद मिल जाए तो सेवा सुफल हो जावे। घर के बाहर तख्ती में लिखवाने, लेटरपैड पर छपवाने के लाने कोनऊ पद मिल जावे तो क्या चोखा हौवे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो इतने विराट समाजसेवा के सपनों के साथ नेता से जुड़ता है चमचा। फिर जब वो एक बार ठान लेता है तो फिर अकंठ सेवा में डूब जाता है। सेवा करेंगे साला, हम तो सेवा ही करेंगे। नेता जी सेवा करेंगे। देश की सेवा करेंगे। समाज की सेवा करेंगे। हमें तो कोई दो, जिसकी सेवा करना है नहीं तो छीन के हक ले लेंगे। जोर-जुलम की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है.. वगैरहा। चमचों में इतने विकट स्तर तक सेवा की भावना प्रवाहित होती है कि जो रास्ते में आए इस भीषण सेवा की बाढ़ में बह जाए। वैसे चमचों का ध्येय वाक्य ही इंकलाब जिंदाबाद है, नेताजी की जय है, नेताजी तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं..तो बात-बात पर बांहें चढ़ा लेना प्रमुख एवं पुनीत कर्तव्य। नेताजी की हर बात में हां में हां मिलाना कर्तव्य की परम अवस्था है। साधुओं और अफीमचियों के अलावा इस अवस्था के बारे में कोई नहीं जानता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई जानेगा भी कैसे, इस अवस्था की प्राप्ति के लिए सामने वाले में अस्तित्व समाहित कर देना पड़ता है। खुद को भुला देना पड़ता है। बस एक लौ लगानी पड़ती है, फुर्र.. फुर्र..। एक लगन सी जगानी पड़ती है, लागी तुमसे मन की लगन जैसी..। संन्यासी साधना में और नशेड़ी धुएं की भावना में इस अवस्था का अनुभव करता है। आम आदमी केवल दूसरों बुराई के दौरान ही इस अवस्था की कुछ-कुछ औसत झलक पाता है, लेकिन कभी न गहराई से साधना कर पाता है न ही सुट्टा खींचने में परम अवस्था में उतर पाता है। इसलिए कोई आम आदमी कभी चमचा नहीं बन सकता है। चमचा होना खास है, हर चमचे को इस बात का हार्ट के हर इनर तंतु की ओर घोर आश्वासन रहता है। इसलिए एक बार तय कर लेता है तो कोई साला माई का लाल उसे सेवाभावना से डिगा नहीं कर पाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जब सेवा के परम क्षेत्र में उतर ही गए हैं तो कैसी शरम. . जी ने की शरम उकै फूटे करम। तो शरम को समेट कर और कई बार तो गहरे में दफन कर सेवा के इस क्षेत्र में उतरते हैं चमचे और जुट जाते हैं। देर नहीं लगाते हैं चमचे, जानते हैं देर लगाई और ताक में बैठे दूसरे सेवाभावी ने जुगाड़ बिठाई। तो शरम का क्रियाकर्म करने के बाद हर संभावित सेवा अर्थात् नेता की ओर नजरें घुमाता है चमचा। फिर घुसपैठ बनाता है। इस दौरान चमचों का चमचा बनने में भी उसे कोई एतराज नहीं होता है। यही त्याग की भावना चमचत्व की मूल भावना है। ईगो वगैरहा तो चमचों में होता ही नहीं है। इसी कारण मुनियों जैसा तेज चेहरे पर हर समय दमकता रहता है। चमचत्व की प्राचीनकाल से ही सुदीर्घ परंपरा की जानकारी मिलती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर देशकाल में बड़े-बड़े चमचे पैदा हुए, जिन्होंने इस परंपरा को और पुष्ट किया। उनके अनुभवों से सीखकर अगली पीढ़ी ने चमचत्व में नई ऊंचाइयां छुईं। परंपरा में अपनी तरफ से चार नई बातें डालीं। चमचत्व के सिद्धांतों को और व्यवस्थित किया। इस तरह जब से राजनीति का वृक्ष फलफूल रहा है तब से चममागिरी अमरबेल की तरह उसे संबल दे रही है। ये पहला क्षेत्र है जहां अमरबेल की जगह खुद पेड़ ही इस बेल पर टिका है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/730868022304092491-2565433807065159165?l=shabd-yog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shabd-yog.blogspot.com/feeds/2565433807065159165/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=730868022304092491&amp;postID=2565433807065159165' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/2565433807065159165'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/730868022304092491/posts/default/2565433807065159165'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shabd-yog.blogspot.com/2010/11/blog-post_13.html' title='कक्का! मोए तो चमचा बननें'/><author><name>अनुज खरे</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11478561016901833077</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-0BFOskF9UY8/T1dasT9S6rI/AAAAAAAAAUc/Q92D2j088wU/s220/anuj.png'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_2buA3x5aEzA/TPucKmxJ-PI/AAAAAAAAADs/vyWH9lXtKGU/s72-c/cartoon.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-730868022304092491.post-2464971280360052956</id><published>2010-11-07T23:02:00.002+05:30</published><updated>2012-02-29T17:17:04.612+05:30</updated><title type='text'>स्टेशन का भाईचारा उर्फ कसम से, दोस्ती बचपन की</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2buA3x5aEzA/TPue9rGbqjI/AAAAAAAAAD0/q9cC4EAkz6c/s1600/fri.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" ox="true" src="http://2.bp.blogspot.com/_2buA3x5aEzA/TPue9rGbqjI/AAAAAAAAAD0/q9cC4EAkz6c/s320/fri.jpg" width="225" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;दिसंबर की रात थी। ओस से भीगी-भीगी गीली सी रात। झींगुरों की सीटियां ठंड को और आब दे रही थीं। हाड़कंपाने वाली इस सर्दी में सर्दी में स्टेशन पर दो जने बैठे थे। पूरे प्लेटफॉर्म पर लाशों जैसे लोग पसरे थे। जिसे जहां जगह मिली वहीं गुड़ी-मुड़ी बनकर लेटा हुआ था। ठंड में अंग्रेजी का आठ बनकर सोना बड़ा मददगार है। हाथ-पांव सब सिकोड़कर शरीर के कवच में भर लिए, मुंह चादर के अंदर डाला, दांत किटकिटाते सो रहे। ऐसा पूरे प्लेटफॉर्म का दृश्य था। मांएं बच्चों को सीने से चिपटाए पड़ी थीं। ग्रामीणों की टोली एक ओर लेटी थी। पटरियों पर भयंकर गंदगी। मक्खियां उड़ रही थीं। हालांकि सुविधा यह कि मच्छर ठंड में ज्यादा निकलते नहीं हैं, सो फिलहाल उस दिशा में फुर्सत थी। अभी सलकनपुर पैसेंजर गई है। मालवा एक्सप्रेस फिर लेट है। बैठे हुए दोनों जनों में से एक चादर से खुद को ढंकने की कोशिश कर रहा था। कभी पैर निकल रहे थे, कभी सिर। बाजूवाला भी कुछ ऐसी ही हरकत कर रहा है। गरीब की चादर पता नहीं क्यों हमेशा पैर से कम ही होती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, परदेस और मजबूरी अक्सर दो अजनबियों के करीब लाने का काम करती है। एक-दूसरे का सहारा बना देती है। आज फिर वैसा ही हो रहा है। दोनों ही एक-दूसरे को कुछ इन्हीं नजरों से देख रहे हैं। पहल नहीं हो रही है। पहल करने से जो कद घटने का अहसास होता है उसके चलते ठसक के कारण कोई पहल करता नहीं है। कई बार सीधे-सीधे बातों की अपेक्षा अनर्गल प्रलाप बातचीत की शुरूआत करने में बड़ा मददगार साबित होता है। फिर निरपेक्ष भाव से किसी को कोसो तो जल्दी ही सामनेवाला(यदि भारतीय है तो जरूर ही) सहयोग देने मे जुट जाता है। सौहार्दता पनपने लगती है। भारत में सरकार बनी ही इसलिए है कि हर मामले में उसे गालियां दो, आपस में नजदीकियां पैदा करो। दो लोगों के संबंध बनाने या मजबूत करने में सरकार के इस योगदान की जानकारी खुद सरकार को भी नहीं होगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘ जै साली रेलगाड़ी तो ससुरी भुंसरा तक आहै! ’’&lt;br /&gt;‘‘ठीक कई ’’ पहले ने चौंककर देखा। अपने उधर की भाषा। घर की भाषा परदेस में तत्काल नजदीकियां बढ़ाने के काम आती है। कई लोग इस बात को जानते हैं, जो नहीं जानते उनके लिए पहली बार इस रहस्य को खुलासा किया जा रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके पहले जरा इस सीन के बैकग्राउंड पर भी कुछ प्रकाश डाला जाए। सो सुनिए। &lt;br /&gt;इस जंक्शननुमा स्टेशन पर लोग गाड़ियां बदलते हैं। दूर दक्षिण से कमाकर अपने-अपने गांव लौट रहे थे। कोई मद्रास कोई हैदराबाद से आ रहा था। बीच में कहीं नागपुर जैसा स्टेशन इसी काम आता है। ऐसे ही ठियों पर अजनबियों की मुलाकात होती है। बातचीत शुरू हो जाती है। फिर घनिष्ठ संबंध बन जाता हैं। गांवों में छोटी जगहों पर तो मेले-ढेलों, बस-ट्रेनों में बने ऐसे रिश्तों तक की कदर की जाती है। बच्चों तक को कहा जाता है -फलां गांव में तुम्हारे मुंहबोले चचा रहते हैं। मुंहबोले चचा भी अपने बच्चों को ऐसा ही कुछ बताते हैं। रिश्ते पीढ़ियों तक खींचने लगते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो खैर सब बदलते जमाने की भेंट चढ़ रहा है। तब पहले लोग तीर्थ यात्रा पर निकलते थे तो गांव से केवल एक लोटा कुछ आटा लेकर जाते थे। किसी भी गांव में जाएं स्वागत होता था। किसी भी घर में ठहर जाओ। कहीं से भी थोड़ा सा आटा मांगा। पकाया-खाया किसी भी दालान में सो रहे। फिर वो अजनबी परिवार तक सगों जैसा विदा करता था। आगे फिर आना-जाना मुंहबोली रिश्तेदारियां शुरू हो जाती थीं। कितने सहज भोले-भाले लोग होते थे। हालांकि सब खत्म नहीं हुआ है। अभी भी ऐसे लोग पाए जाते हैं जो सबकुछ सहेज कर रखे हैं। उनकी कद्र जानते हैं। लेकिन.. आगे कि कहानी फिर इस दिशा में ज्यादा आशा क्यों नहीं जगा रही है। चलिए कहानी पर ही चले चलते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर, स्टेशन पर ठंड गहरा रही है। दोनों सम्मिलित रूप से भारतीय रेलवे को कोसने में लगे हैं। सुनिए..&lt;br /&gt;‘‘जै साली सरकार बस टिकट के पइसा बढ़ती है, सुविधाओं से इसे कोनऊ मतलब नहीं है विसे।’’पहले ने अपना मुंह खोला। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘सई कई, जै साली सुविधाएं बड़े लोगन के लाने हैं, हमाए जैसे ते भइया बस निहारते रहते हैं। ’’ दूसरे ने फिर हां में हां मिलाई। &lt;br /&gt;‘‘वैसे आप कहां कै हैं बमीठा के’’पहले ने फिर उवाचा। &lt;br /&gt;‘‘नई भैया हजरतगंज के ’’&lt;br /&gt;‘‘हजरतगंज में कां के?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘बनियौ का बड़ा मोहल्ला के’’ दूसरा पूरी तरह जाग गया है। अधलेटा सा होकर ठंड को इस प्रश्नोत्तरी के बीच भुलाना चाहता है। पांव के पास रखे जूतों को भी थोड़ा सा सामने वाले की तरफ खिसका दिया है। क्या करें साले बसा रहे हैं। सामने वाले को हो सकता है ठंड के कारण बदबू का पता ही नहीं चले। &lt;br /&gt;उधर, दूसरा अब तम्बाखू मलने लगा है। गांव कस्बों में तम्बाखू भाईचारा बढ़ाने के काम आती है। झट से मली, पट से हथेली पर रगड़ी, टप्प से सामने वाले की तरफ बढ़ा दी। उसने भी ली। फिर मिलकर थूक्कम-थांकी की जुगलबंदियां शुरू कर दी। दोनों सतर्क हैं। नींद भाग चुकी है। तम्बाखू दिमाग में जाते ही वहां भी चैतन्यावास्था आ गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘ बनियों का बड़ा मोहल्ला में कां कै? ’’&lt;br /&gt;‘‘ रामकिशोर..’’पहला अपनी बात भी पूरी नहीं कर पाया है।&lt;br /&gt;‘‘रामकिशोर कक्का रहली वाले के घर की तो बात नहीं कर रए ’’&lt;br /&gt;‘‘हऔ!! मनौ तुम??’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘ अबे सारे बंसी हम हैं रामनिहोर, तुमाए बचपन के दोस्त। पांच बरस बाद मद््रास से लौट रए हैं’’ रामनिहोर के ऐसा कहते ही, दोनों के दिल और दिमाग में बचपन की मस्तियों के ट्रेलर एकसाथ चलने लगे। दोनों गले लग गए। ऐसे जोश में गले मिले की रामनिहोर के जूते पटरियों में खिसक गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘अबे सारे तू तौ पूरा बदल गया है, पहले कितना सींकटा था, पेड़ों पै कैसा सर-सर करके चढ़ जाता था। सारे अमरइया के आम तैने ही तो तोड़े थे।’’ उतार-चढ़ाव से भरे डायलॉग शुरू हो चुके हैं। आसपास के लोग चौंककर जागकर देखने लगे हैं। लेकिन दोनों को कोई मतलब नहीं। ठंड भी अब उतनी नहीं सता रही है। दोस्त मिला है, बचपन का, भाई जैसा खेलते-कूदते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘ और तू भी तो सारे कित्ता कमीन था। श्मशान से मिठाई उठाकर लाता था और हमको खिलाता था। सारे तैने कमला को भी एकबार जैई मिठाई नहीं खिलाई थी सच्ची कइयो। हम सोचते थे तेरे बाप के पास खूब पइसा है। तुझे रोज मिठाई खावै के लाने देते हैं। तू कुछ सुधारा है कि वैसा ही हरामजादा है।’’ दोनों एक-दूसरे पर पिले पड़े हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर किसी को लगता है कि गलियों से केवल संबंध-रिश्ते खराब ही होते हैं तो इस सीन को देख लें। प्यार में गलियां और प्यारा पैदा करती हैं। दोनों दुनिया-जहान से दूर एक दूसरे की पोल.. मतलब बचपन की नोकझोंक और मस्तियों पर डूबकर जबर्दस्त बातचीत में लगे हैं। ठंड को बचपन के संबंधों की आंच कहीं आसपास भी फटकने नहीं दे रही है। रिश्तों की ऐसी तासीर नहीं जानने वाले के लिए एक दृश्य एक नई ही बात होगी। बाहरी ठंड को अंदर की भावनात्मक ऊष्मा कैसे भगाती है। अलग ही अहसास है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘हऔ बे, का दिन थे वै, पूरे इलाके में अपन कबड़्डी चैंपियन हते। कोनऊ टीम टिक न पाती थी अपरै सामने। एक बार तो लखनपुरा हो हरावै पै कैसो 500 रुपइया मिलो हतो। साइकल खरीद के कैसे दोनऊ शहर गए थे मुर्गा खावे। अबै का दिन हतै कसम से सच्ची कइओ।’’ दूसरा भी सच्ची ही कह रहा है।&lt;br /&gt;‘‘ हओ बे, बड़ी जिज्जी की सादी में कैसो अपन तीन
